गोंड (जनजाति)

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गोंड
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कुल जनसंख्या

4 करोड़

खास आवास क्षेत्र
Flag of India.svg India
           मध्य प्रदेश, 4,357,718 [1]
           महाराष्ट्र
           छत्तीसगढ़
           आंध्र प्रदेश
           उड़ीसा
भाषाएं
गोंडी, हिन्दी
धर्म
हिन्दू, पारम्परिक मान्यताएं
अन्य सम्बंधित समूह
द्रविड़ लोग · ब्राहुई लोग · कन्नड़ लोग · खोंड · कोडव · मलयाली लोग · तमिल · तेलुगु · तुलुव

गोंड (जनजाति), भारत की एक प्रमुख जनजाति हैं । आदिवासी गोंड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना इस पृथ्वी -ग्रह पर मनुष्य, परन्तु लिखित इतिहास के प्रमाण के अभाव में खोज का विषय है। यहाँ गोंड जनजाति के प्राचीन निवास के क्षेत्र में आदि के शाक्ष्य उपलब्ध है। गोंड समुदाय द्रविढ़वर्ग के माने जाते है, जिनमे जाती व्यस्था नही थी। गहरे रंग के ये लोग इस देश में कोई ५-६ हजार वर्ष पूर्व से निवासरत है। एक प्रमाण के आधार पर कहा जा सकता है की गोंड जाती का सम्बन्ध सिन्धु घटी की सभ्यता से भी रहा है।

अनुक्रम

[संपादित करें] स्थापना

गोंडी धर्मं की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने शम्भूशेक के युग में की थी। गोंडी धर्मं कथाकारों के अनुसार शम्भूशेक अर्थात महादेवजी का युग देश में आर्यों के आगमन से पहले हुआ था। इस काल से ही कोया पुनेम धर्मं का प्रचार हुआ था। गोंडी बोली में कोया का अर्थ मानव तथा पुनेम का अर्थ धर्मं अर्थात मानव धर्मं। आज से हजारों वर्ष पूर्व से गोंड जनजातियों द्वारा मानव धर्मं का पालन किया जा रहा है। अर्थात गोंडी संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम।

[संपादित करें] गोंडी मान्याताएँ

भारतीय समाज के निर्माण में गोंड संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। गोंडी संस्कृति की नींव पर भारतीय संस्कृति खड़ी है। गोंडवाना भूभाग में निवासरत गोंड जनजाति की अदभुत चेतना उनकी सामाजिक प्रथाओं , मनोवृत्तियों, भावनाओं आचरणों तथा भौतिक पदार्थों को आत्मसात करने की कला का परिचायक है, जो विज्ञानं पर आधारित है। समस्त गोंड समुदाय को पहांदी कुपार लिंगो ने कोया पुनेम के मध्यम से एक सूत्र में बंधने का काम किया। धनिकसर (धन्वन्तरी ) नामक गोंड विद्वान् ने रसायन विज्ञान अवं वनस्पति विज्ञान का तथा हीरा सुका ने सात सुरों का परिचय कराया था।

[संपादित करें] इतिहास

प्राचीन गोंडवाना का नक्शा

गोंडवाना रानी दुर्गावती के शौर्य गाथाओं को आज भी गोंडी, हल्बी व भतरी लोकगीतों में बड़े गर्व के साथ गया जाता है। आज भी कई पारंपरिक उत्सवों में गोंडवाना राज्य के किस्से कहानियो को बड़े चाव से सुनकर उनके वैभवशाली इतिहास की परम्परा को याद किया जाता है। प्राचीन भूगोलशास्त्र के अनुससार प्राचीन विश्व के दो भूभाग को गोंडवाना लैंड व अंगारा लैंड के नाम से जन जाता है। गोंडवाना लैंड आदिकाल से निवासरत गोंड जनजाति के कारण जन जाता था, कालांतर में गोंड जनजातियों ने विश्व के विभिन्न हिस्सों में अपने-अपने राज्य विकसित किए, जिनमे से नर्मदा नदी बेसिन पर स्थित गढ़मंडला एक प्रमुख गोंडवाना राज्य रहा है। रजा संग्राम शाह इस साम्राज्य के पराक्रमी राजाओं में से एक थे, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर राज्य का विस्तार व नए-नए किलों का निर्माण किया। १५४१ में राजा संग्राम की मृत्यु पश्चात् कुंवर दल्पत्शाह ने पूर्वजों के अनुरूप राज्य की विशाल सेना में इजाफा करने के साथ-साथ राज्य का सुनियोजित रूप से विस्तार व विकास किया।

[संपादित करें] भाषा

गोंडी भाषा गोंडवाना साम्राज्य की मातृभाषा है। गोंडी भाषा अति पाचं भाषा होने के कारन अनेक देशी -विदशी भाषाओं की जननी रही है। गोंडी धर्मं दर्शन के अनुसार गोंडी भाषा का निर्माण आराध्य देव शम्भू शेक के डमरू से हुई है, जिसे गोएन्दाधि वाणी या गोंदवानी कहा जाता है। अति प्राचीन भाषा होने की वजह से गोंडी भाषा अपने आप में पूरी तरह से पूर्ण है। गोंडी भाषा की अपनी लिपि है, व्याकरण है जिसे समय-समय पर गोंडी साहित्यकारों ने पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया है। गोंडवाना साम्राज्य के वंशजो को अपनी भाषा लिपि का ज्ञान होना अति आवश्यक है। भाSha समाज की माँ होती है, इसलिए इसे "मातृभाषा" के रूप में आदर भी दिया जाता है। गोंदियाँ समाज की अपनी मातृभाषा गोंडी है, जिसे आदर और सम्मान से भविष्यनिधि के रूप में संचय करना चाहिए।

[संपादित करें] सन्दर्भ

  1. "Madhya Pradesh: Data Highlights the Scheduled Tribes". Census of India 2001. Census Commission of India. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_st_madhya_pradesh.pdf. अभिगमन तिथि: 2008-03-06. 
वैयक्तिक औज़ार
नामस्थान

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