गृह विज्ञान

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'गृह अर्थशास्त्र' की एक कक्षा का दृष्य (टोरन्टो; सन् १९११)
एक गृहिणी (कोलम्बिया)

गृह विज्ञान (Home Sciences) शिक्षा की वह विधा है जिसके अन्तर्गत पाक शास्त्र, पोषण, गृह अर्थशास्त्र, उपभोक्ता विज्ञान, बच्चों की परवरिश, मानव विकास, आन्तरिक सज्जा, वस्त्र एवं परिधान, गृह-निर्माण आदि का अध्ययन किया जाता है।[1]

ऐतिहासिक रूप से जब बालकों को कृषि या 'शॉप' (लोहारी, बढ़ईगिरी, आटो की मरम्मत) आदि की शिक्षा दी जाने लगी तो बालिकाओं के लिये इस विषय के शिक्षण की आवश्यकता महसूस की गयी।

परिचय[संपादित करें]

जैसा कि नाम से ही पता चलता है, गृह विज्ञान का संबंध गृह यानी कि घर से हैं। आम तौर पर लोग समझते हैं कि गृह विज्ञान घर की देखभाल और घरेलू सामान की साज-संभाल का विषय है। लेकिन उनका ऐसा समझना केवल आंशिक रूप से सत्य है। गृह विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्त त और विविधता भरा है। इसका दायरा ‘घर’ की सीमा से कहीं आगे तक निकल जाता है और यह केवल खाना पकाने, कपडे़ धोने-संभालने, सिलाई-कढ़ाई करने या घर की सजावट आदि तक सीमित नहीं रह जाता। वास्तव में केवल यही एक ऐसा विषय है जो युवा विद्यार्थियों को उनके जीवन के दो महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों के लिए तैयार करता है - घर तथा परिवार की देखभाल और अपने जीवन में कैरिअर अथवा पेशे के लिए तैयारी। आजकल महिला तथा पुरुष दोनों ही घर तथा परिवार की जिम्मेदारियां समान रूप से निभाते हैं तथा अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग की तैयारी में भी बराबर की सहभागिता निभाते हैं।

गृह विज्ञान का अर्थ[संपादित करें]

गृह विज्ञान अथवा घर के विज्ञान का संबंध आप से, आपके घर से, आपके परिवार के सदस्यों से तथा आपके संसाधनों से जुड़ी सभी चीजों से है। इसका उद्देश्य है - आपके संसाधनों के प्रभावशाली तथा वैज्ञानिक उपयोग द्वारा आपको तथा आपके परिवार के सदस्यों को भरपूर संतुष्टि प्रदान करना।

गृह विज्ञान का अर्थ है, आपके संसाधनों के प्रभावशाली प्रबंधन की कला तथा एक ऐसा विज्ञान, जो एक घर को स्वस्थ तथा सानंद बनाए रखने और आवश्यकता पड़ने पर एक सफल पेशे के चुनाव में आपकी मदद करे।

गृह विज्ञान आपको चीजों को उपयोग करने की कला सिखाता है, जिससे कि चारों और एक संपूर्ण सुव्यवस्था, सुंदरता और आंदमयी वातावरण के निर्माण में सहायता मिलती है। इसके साथ ही यह घर की देखभाल से संबंधित वैज्ञानिक जानकारियां भी प्रदान करता है। इसे हम एक उदाहरण के द्वारा आसानी से समझ सकते हैं- गृह विज्ञान शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों के बारे में जानकारी प्रदान करता है तथा साथ ही उनके कार्यों के बारे में भी बताता है। यह एक ’विज्ञान’ है। और जब आप इन्हीं आवश्यक पोषक तत्त्वों से भरपूर भोजन को अपने परिवार को आर्कषक ढंग से परोसते हैं तो यह एक ’कला’ है।

विज्ञान और कला का यह समन्वय आपके जीवन के हर क्षेत्र में काम आता है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -

  • घर, जिसमें आप रहते हैं,
  • भोजन, जो आप खाते हैं,
  • वस्त्र, जो आप पहनते हैं,
  • परिवार, जिसकी आप देखभाल करते हैं,
  • संसाधन, जिनका आप इस्तेमाल करते हैं,
  • वातावरण, जो आपके आस-पास है,
  • दक्षता, जो एक सफल कैरिअर के लिए आवश्यक है।

गृह विज्ञान का महत्व[संपादित करें]

गृह विज्ञान के विविध क्षेत्रों की पढ़ाई करने के बाद आप अपने संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। यदि ऐसा करते हुए आपको किसी प्रकार की समस्या पेश आती है, तो गृह विज्ञान उसे हल करने के लिए आपको सही दिशा निर्देश देगा। ऐसा करके आप एक प्रभावशाली व्यक्ति बनते हैं। इस ज्ञान का उपयोग आप अपने घर और जीवन के विकास में कर सकते हैं। आप और आपके परिवार के सदस्य अपनी दक्षताओं के उपयोग से अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाकर ज्यादा संतुष्टि का अनुभव कर सकते हैं। जब आप अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होंगे तभी वे भी घर और बाहर दोनों तरफ की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पाने में सक्षम होंगे।

समय, ऊर्जा, दक्षता आदि कुछ अन्य संसाधन हैं, जो प्रबंधन में सहायक होते हैं और इसमें गृह विज्ञान आपकी बहुत मदद करता है।

आजकल ज्यादातर महिलाएं कामकाजी हैं, जो या तो काम करने के लिए घर से बाहर जाती हैं, या वे घर पर ही रह कर अपना स्वयं का कोई रोजगार चलाती हैं। इसके फलस्वरूप घर की जिम्मेदारियों में पुरूषों की सहभागिता भी बढ़ी है। चूंकि हमारे समाज में परंपरागत रूप से पुरूष धर के कार्यों में बहुत क्रियाशील नहीं होते, इसलिए उन्हें इस व्यवस्था में ढलने में काफी परेशानी का अनुभव होता है। ऐसे में उन्हें घर की विभिन्न पक्षों के बारे में जानने तथा घर को सुंदर बनाने तथा सही तरीके से चलाने का हुनर सीखने की आवश्यकता होती है। गृह विज्ञान ही एक मात्र ऐसा विषय है, जो युवाओं को एक सफल गृहस्थ बनने, एक जिम्मेदार नागरिक और एक अच्छे माता-पिता बनने में सहायक पूर्वाभ्यास और आवश्यक सूचनांए उपलब्ध कराता है।

गृह विज्ञान को लेकर लोगों के भ्रम की स्थिति[संपादित करें]

हालांकि गृह विज्ञान शिक्षा के काफी विस्त त क्षेत्र में कार्य कर रहा है, किंतु आज भी इस विषय को लेकर आम आदमी के मन में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। और यह भ्रम की स्थिति केवल इसलिए बनी हुई है कि लोग सोचते हैं कि वे जो सम्मान और दर्जा प्राप्त करना चाहते हैं वह सब दे पाने में गृह विज्ञान सक्षम नहीं है।

भ्रान्ति - गृह विज्ञान केवल खाना पकाने, कपड़े धोने और सिलाई-कढ़ाई के कामों तक सीमित है- आम लोगों की धारणा है कि इसमें सिर्फ यही सब बातें पढ़ाई-सिखाई जाती है। इसलिए युवा लड़कियों के माता-पिता बड़ी आसानी से उन्हें यह विषय पढ़ाने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि यह उन्हें बाद के जीवन में जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में सहायक सिद्ध होगा।

सच्चाई - खाना पकाना, कपड़े धोना और रखना तथा कढ़ाई-बुनाई तो गृह विज्ञान के अंतर्गत पढ़ाया जाने वाला एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा है। दरअसल इसके द्वारा हम अपने जीवन से जुड़ी सभी आधारभूत बातें सीखते हैं- कि हमारा शरीर कैसे कार्य करता है, कि हमें स्वस्थ रहने के लिए किस प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है, कि अपनी तथा वातावरण की स्वच्छता के लिए किन नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, कि हमें बीमारियों से बचने के लिए क्या करना चाहिए तथा जब हम तथा हमारे आत्मीय जन बीमार हों, तो किस प्रकार का प्रबंधन करना चाहिए आदि। इसमें हम घर के विविध कार्यों में उपयोग होने वाले कपड़ों के चुनाव के बारे में सीखते हैं। बच्चे हमारे जीवन का एक अभिन्न अंगृहैं। हम सभी चाहते हैं कि उनका सुरक्षित और समुचित विकास हो। इस पाठ्यक्रम में हम सीखते हैं कि जन्म के पूर्व और बाद बच्चों का विकास किस प्रकार होता है और एक अच्छे तथा जिम्मेदार नागरिक के रूप में उनके विकास में हम क्या भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा हम समय, ऊर्जा तथा पैसे जैसे अपने संसाधनों का प्रबंधन भी सीखते हैं, जिससे कि उनके अधिकाधिक उपयोग से अधिक संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

भ्रान्ति- गृह विज्ञान का संबंध केवल लड़कियों से है - बहुत से लोग यह समझते हैं कि गृह विज्ञान केवल घर से संबंधित कार्यों की शिक्षा देता है, इसलिए इसे केवल लड़कियों को ही पढ़ना चाहिए।

सच्चाई- आज महिलाएं तथा पुरुष दोनों घर की जिम्मेदारियों का बराबर साझा करते हैं, क्योंकि आज हमारे समाज की बनावट में काफी परिवर्तन आया है। आज संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवारों में बदलने लगे हैं। ऐसे में घर की जिम्मेदारियों को पति और पत्नी को खुद ही संभालना पड़ता है। अधिकांश महिलाएं घर से बाहर काम पर जाने लगी हैं, इसलिए पुरूषों को घर की जिम्मेदारियों के बारे में अधिक से अधिक शिक्षा की जरूरत बढ़ी है। और इन सारी बातों की तैयारी अथवा पूर्वाभ्यास केवल गृह विज्ञान में ही एक विषय के रूप में मिल सकती है। यही कारण है कि आज अनेक युवा पुरुष इस विषय को पढ़ने की तरफ उन्मुख हुए हैं।

भ्रान्ति- इसे तो अपनी मां/दादी मां से भी सीखा जा सकता है - लोग सोचते हैं कि गृह विज्ञान में पढ़ाई जाने वाली बातें तो इतनी आसान है कि उन्हें घर में अपनी मां/दादी मां से भी आसानी से सीखा जा सकता है। इसके लिए एक विषय के रूप में गृह विज्ञान की पढ़ाई करने की आवश्यकता नहीं है।

सच्चाई- यह सच है कि लड़कियां घर की बहुत सारी बातें अपनी मां या दादी को काम करते देख कर सीखती हैं, लेकिन इतना भर ही पर्याप्त नहीं होता। बहुत से काम ऐसे हैं, जो परंपरागत रूप में घरों में चलते चले आ रहे हैं, लेकिन लोगों को उनका वैज्ञानिक आधार नहीं पता है। उदाहरण के लिए अचार को ही लीजिए। सभी जानते हैं कि अचार को तेल की परत से ढकना पड़ता है, लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि ऐसा क्यों किया जाता है, तो आपकी मां इसे नहीं समझा पाएंगी। लेकिन जब आप गृह विज्ञान की पढ़ाई करेंगे, तो यह आपको बता देगा कि तेल अचार के तत्वों को हवा से खराब होने से बचाता है। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हर किसी के जीवन में मिल जाएंगे। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि जो काम हम करते हैं यदि हम उसके बारे में यह जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं तो वह काम आसान हो जाता है।

भ्रान्ति - गृह विज्ञान की पढ़ाई कैरिअर निमार्ण में सहायक नहीं है - ज्यादातर लोगों का यह भी सोचना है कि गृह विज्ञान चूंकि घर के भीतर किए जाने वाले कार्यों के बारे में शिक्षा देता है, इसलिए कैरिअर की द ष्टि से यह अनुपयोगी है। यदि कोई युवा रोजी-रोटी कमाना चाहता है तो उसे कोई ’गंभीर’ विषय पढ़ना चाहिए।

सच्चाई - गृह विज्ञान युवा लड़के तथा लड़कियों दोनों के लिए रोजगार के अनेक अवसर उलब्ध कराता है। विद्यालय में गृह विज्ञान के एक विषय के रूप में अध्ययन से बहुत सारे रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि अन्य विषयों की तरह ही इस विषय की भी आगे तक पढ़ाई जारी रखें और किसी एक विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करें। अस्पतालों में डाइटीशियन के रूप में, बुटीक में फैशन डिजाइनर के रूप में, होटलों में परिचारक/परिचारिका अथवा रिसेप्शनिस्ट के रूप में, स्कूलों/कॉलेजों में अध्यापक/अध्यापिका आदि के रूप में गृह विज्ञान की पढ़ाई करके प्राप्त होने वाले रोजगार के कुछ आम अवसर हैं। गृह विज्ञान की पढ़ाई के बाद आप काफी अच्छी आय वाली और संतोषजनक नौकरियां प्राप्त कर सकते हैं।

गृह विज्ञान के संघटक क्षेत्र[संपादित करें]

गृह विज्ञान के मुख्य रूप से पांच अंग हैं। ये निम्नलिखित हैं-

  1. आहार तथा पोषण
  2. संसाधन प्रबंधन
  3. वस्त्र तथा सूत विज्ञान
  4. मानव विकास
  5. शिक्षा तथा विस्तार

आज यह विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि इसके प्रत्येक अंग के अपने उप-विभाग भी विकसित हो चुके हैं। ये उप-विभाग निम्नलिखित हैं-

  • आहार तथा पोषण
  • पोषण विज्ञान
  • पोषण-औषधीय पोषण तथा सामुदायिक पोषण
  • संस्थागत खाद्य सेवा
  • वस्त्र तथा सूत विज्ञान
  • सूत विज्ञान
  • वस्त्र विज्ञान
  • टेक्सटाइल डिजाइनिंग
  • फेशन डिजाइनिंग
  • वस्त्रों का रखरखाव तथा देखभाल (लॉन्ड्री सेवा)
  • संसाधन प्रबंधन
  • संसाधन प्रबंधन
  • गृहस्थी तथा उपकरण
  • आंतरिक सजावट
  • उपभोक्ता शिक्षा
  • मानव विकास
  • शिशु कल्याण
  • किशोरावस्था, विवाह तथा परिवार शिक्षा
  • बुजुर्गों की देखभाल
  • शिक्षा तथा विस्तार
  • गृह विज्ञान शिक्षकों की तैयारी
  • सामुदायिक सेवा तथा कल्याण
  • अनौपचारिक शिक्षा

भारत में गृह विज्ञान की शिक्षा का इतिहास[संपादित करें]

भारतीय स्त्रियों को कुशल आधुनिक गृहिणी बनाने के लिए तैयार किये गये पाठ्यक्रम को गृह-विज्ञान की संज्ञा दी जाती है। इसे अमेरिका में प्रचलित घरेलू अर्थशास्त्र (होम इकॉनॉमिक्स) और ब्रिटेन में प्रचलित घरेलू विज्ञान (डोमेस्टिक साइंस) की शिक्षण सामग्री के मेल-जोल से तैयार किया गया है। इस पाठ्यक्रम में घरेलू अर्थशास्त्र, कढ़ायी-बिनायी-सिलायी, शिशुओं का लालन-पालन, नैतिक शिक्षा तथा गृह कार्यों में व्यवस्था एवं स्वच्छता जैसे विषय शामिल किये जाते हैं। गृह-विज्ञान के आलोचक इसे स्त्रियों को परिचित और सीमित घरेलू भूमिका में बाँधे रखने, पितृसत्ता कायम रखने और स्त्रियों को राजनीतिक रूप से निष्क्रिय बनाये रखने का षड़यंत्र मानते हैं। दूसरी तरफ़ गृह-विज्ञान को भारतीय घर के दायरे में एक शुरुआती सीमा तक आधुनिकता और राष्ट्रवाद का वाहक भी माना जाता है। अपने समय में अनेक नारीवादी संगठनों ने भारत में गृह-विज्ञान को स्त्री-अधिकारों के साथ जोड़ कर देखा है। इस विमर्श में घर को विशिष्ट रूप से एक नारीवादी इकाई माना गया है। यह विमर्श मानता है कि गृह-विज्ञान द्वारा स्त्रियों को नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिकतम जानकारी द्वारा परिवार-निर्माण का अधिकार मिलता है। इस तरह गृह-विज्ञान आधुनिकता के घरेलू पक्ष की परिभाषा के एक घटक के तौर पर उभरता है जिसके केंद्र में वह प्रशिक्षित स्त्री है जिसके हाथ में पूरे परिवार के शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास का दायित्व सौंपा गया है।

औपनिवेशिक काल में स्त्री-समानता और अधिकारों के लिए संघर्ष भी चल रहा था और उसके साथ ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था बनाये रखने के लिए धर्म, परम्परा और स्थापित सामाजिक व्यवस्था का हवाला देकर स्त्रिओं को हाशिये पर बनाये रखने की मुहिम भी जारी थी। इसी जद्दोजहद के बीच स्त्रियों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किये गये, लेकिन उन्हें पुरुषों के समान शिक्षित करने में भारी अड़चनें थीं। इसी दौरान भारतीय स्त्रियों को उनके परिवेश के अनुरूप ही शिक्षित करने के लिए गृह-विज्ञान का पृथक अध्ययन क्षेत्र बनाया गया। गृह-विज्ञान में स्त्रियों को बेहतर गृहिणी बनाने के साथ एक शिक्षित नागरिक के रूप में विकसित करने का आदर्श भी शामिल था। ब्रिटिश प्रशासन ने भी इस क्षेत्र में पहल ली। गृह-विज्ञान के अध्यापन के लिए स्त्री-अध्यापकों को प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम शुरू किया गया। प्रशासन ने भारतीय समाज- सुधारकों के साथ मिल कर सबसे पहले विधवा स्त्रियों को इस प्रशिक्षण के लिए चुना। प्रशिक्षण के उपरांत ये स्त्रियाँ आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बन सकती थीं। प्रशासन विधवाओं की स्थिति सुधारने के लिए आवश्यक समाज- सुधार (जैसे विधवा-पुनर्विवाह, बाल-विवाह का निषेध) जैसे कार्यक्रमों को पुरातनपंथी समाज के भारी विरोध के कारण स्थगित करने का इच्छुक भी था। स्त्री-अध्यापकों के प्रशिक्षण के आरम्भिक दौर में अधिकतर औरतें ईसाई समुदाय या ग़ैर-ब्राह्मण समाज से थीं। लेकिन उच्च वर्ण के कुछ प्रमुख भारतीय समाज सुधारकों ने अपने परिवार की स्त्रियों को भी इस प्रशिक्षण में भाग लेने के लिए उत्साहित किया। यूरोपियन माध्यमिक स्कूलों में गृह-विज्ञान के अध्यापन को लोकप्रिय बनाने के लिए अनेक नये शिक्षण व प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किये गये। गृह-विज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करने के लिए इसके प्रशिक्षण को प्रायोगिक एवं व्यावहारिक बनाते हुए शिक्षण-सामग्री में विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों का समावेश किया गया।

भारत में स्त्री-अधिकारों के लिए सार्वजनिक तौर पर अभियान चलाने का श्रेय ब्रह्म समाज के अग्रणी नेता देवेन्द्र नाथ ठाकुर की पुत्री और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बहन स्वर्ण कुमारी देवी को जाता है। उन्होंने 1882 में कलकत्ता में विधवाओं और ग़रीब स्त्रियों को आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनाने के लिए प्रशिक्षण देने की शुरुआत की थी। इसी प्रकार पण्डिता रमाबाई सरस्वती ने पुणे में आर्य स्त्री समाज और शारदा सदन के माध्यम से स्त्रियों को रोज़गार दिलाने के लिए प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम चलाया था। 1910 में स्वर्ण कुमारी देवी की पुत्री सरला देवी चौधरानी ने केवल स्त्रियों के लिए भारत स्त्री मण्डल की स्थापना करके स्त्रियों को उनके घर पर ही शिक्षित करने का अभियान चलाया था। बीसवीं सदी के आरम्भ में स्त्रियों को शिक्षा प्रदान करने में युरोपियन मिशनरी एवं भारतीय समाज-सुधारक सबसे आगे थे। लेकिन अधिकतर स्त्रियों की शिक्षा अनौपचारिक तौर पर उनके घर पर निजी शिक्षकों के द्वारा दी जाती थी। दरअसल ज़्यादातर सुधारक स्त्रियों की शिक्षा को उनके घरेलू दायित्वों से जोड़ना चाहते थे ताकि वे अपने परिवार-कुटुम्ब के लालन-पालन व जीवन शैली में गुणात्मक सुधार ला सकें। इस प्रकार की शिक्षा के लिए गृह-विज्ञान को सर्वोत्तम विषय माना गया। गृह-विज्ञान को भारतीय समाज में 'घर' की परिकल्पना के आदर्श स्वरूप को स्थापित करने और गृह-विज्ञान में प्रशिक्षित स्त्रियों को आदर्श पत्नी-माँ-गृह लक्ष्मी की भूमिका के वाहक की तरह पेश किया गया। गृह-विज्ञान ने भारतीय ‘घर’ को एक ऐसी प्रयोगशाला बना दिया जिसके दायरे में परिवार एवं समाज में व्यापक सुधारों के अभियान का आरम्भ हो सकता था। इसके साथ ही गृह-विज्ञान को प्रबुद्ध-सम्भ्रांत भारतीयों में स्वीकार्य बनाने के लिए इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया जो भारतीय स्त्रियों को उनके अपने घर में सम्माननीय स्थान दिलाने और व्यापक समाज-सुधार में स्त्रियों को केंद्रस्थ करने में कारगर भूमिका निभा सकता था।

गृह-विज्ञान का विचार उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन में प्रचारित की जा रही आदर्श स्त्री-छवि के अनुकूल भी बैठता था। गाँधी द्वारा आंदोलन का नेतृत्व सँभालने के बाद आम भारतीय स्त्रियों ने भी बड़ी संख्या में इसमें हिस्सा लेना शुरू किया। गाँधी ने स्त्रियों को जोड़ने के लिए माँ-पत्नी-बहन की आदर्श निःस्वार्थ छवि का दोहन किया। इसी तरह हिंदू राष्ट्रवादी व्याख्या में भी भारत भूमि को भारत माता के रूप में निरूपित किया गया। तमिलनाडु में भी तमिल भाषा के आंदोलन में तमिल भाषा व तमिल राष्ट्रीयता को माँ के रूप में दर्शाया गया। तमिल अस्मिता के पुनरुद्धार और तमिल गौरव के मातृ रूप में प्रदर्शन के प्रचारकों ने स्त्रियों को गृह स्वामिनी और मातृ शक्ति के रूप में बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप न केवल आत्मसम्मान आंदोलन में स्त्रियों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया, बल्कि तमिलनाडु के सामान्य लोगों में भी स्त्री-शिक्षा के प्रति जागरूकता विकसित हुई। तमिल आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व ने भी स्त्रियों के लिए ऐसे सुधारों की हिमायत की जिनके द्वारा पत्नी व माँ की भूमिका को प्रभावकारी बनाया जा सके।

गृह-विज्ञान के भारतीयकरण और इसके प्रसार में कुछ भारतीय स्त्रियों ने प्रमुख भूमिका निभायी। धोंडो केशव कर्वे के विधवा आश्रम से संबंधित पार्वती बाई आठवले 1918 में अमेरिका यात्रा पर गयीं जहाँ उन्होंने देखा कि घरेलू कार्य में वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग किस तरह भारत के लिए भी बेहद लाभप्रद हो सकता है। इसी प्रकार बड़ौदा के प्रधानमंत्री की पुत्री हंसा मेहता ने भी 1920-21 के दौरान अमेरिका में घरेलू अर्थशास्त्र के प्रशिक्षण का अध्ययन किया और वापस लौटकर महाराज सैयाजी राव विश्वविद्यालय में एक स्त्री महाविद्यालय की स्थापना की जिसमें गृह-विज्ञान पाठ्यक्रम का प्रारूप अमेरिकन विशेषज्ञ ऐन गिलक्रिस्ट स्ट्रांग ने तैयार किया। स्ट्रांग की 1931 में प्रकाशित पुस्तक 'डोमेस्टिक साइंस फ़ॉर हाई स्कूल इन इण्डिया' लम्बे समय तक भारतीय गृह-विज्ञान की सबसे मानक पाठ्य पुस्तक मानी जाती रही। भारतीय स्त्री संगठन ने भी गृह-विज्ञान के अनौपचारिक प्रशिक्षण का कार्यक्रम चलाया और इससे संबंधित जानकारी के प्रसार के लिए एक पत्रिका स्त्रीधर्म का प्रकाशन किया। इसमें अमेरिका से प्रकाशित जर्नल ऑफ़ होम इकॉनॉमिक्स के लेख प्रकशित किये जाते थे। तमिलनाडु के मद्रास शहर में अनेक देवदासियों को समाज में पुनर्वासित करने के उद्देश्य से गृह-विज्ञान का प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे घरेलू कर्मचारी की तरह काम में लगाई जा सकें। 1926 में भारतीय स्त्री संगठन की कुछ सदस्यों ने राजनीतिक स्वतंत्रता के स्थान पर स्त्रियों की शिक्षा को अपना प्राथमिक उद्देश्य माना और भारतीय स्त्री संगठन छोड़ कर अखिल भारतीय स्त्री सम्मलेन स्थापित किया। इस नये समूह ने स्त्रियों को गृह-विज्ञान में प्रशिक्षित करने के लिए 1932 में दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज की स्थापना की।

भारतीय स्त्री संगठन की एक संस्थापक सदस्य मालती पटवर्धन ने स्त्रीधर्म पत्रिका में गृह-विज्ञान के प्रचार के साथ ही स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं, जैसे रोज़गार, स्त्री-अधिकारों से संबंधित कानूनी-संवैधानिक परिवर्तन, पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार के विखंडन जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया।

गृह विज्ञान में रोजगार के अवसर[संपादित करें]

आप किसी बेकरी, बुटीक या डे केयर सेंटर में कार्य करके वेतन भोगी कर्मचारी बन सकते हैं। परंतु यदि आप स्वंय की बेकरी, बुटीक या डे केयर सेंटर चलाते हैं तब आप स्वरोज़गार व्यक्ति कहलाएंगे। जब आप लघु उद्यम के रूप में किसी आय के साधन को अपनाते हैं तब आप उद्यमी कहलाएंगे। स्कूल स्तर पर गृह विज्ञान विषय का अध्ययन करने के बाद आप वेतन भोगी कर्मी, स्वरोज़गार या उद्यमी बनने के कई अवसर प्राप्त कर सकते हैं।

उच्चतर माध्यमिक स्तर पूरा करने के बाद वेतन भोगी कर्मी, स्वरोज़गार और उद्यमी बनने के संभावित रोज़गार के अवसर नीचे दिये गये हैं-

वेतन रोज़गार के अवसर[संपादित करें]

  • उपभोक्ता संगठन/सभा के कर्मचारी के रूप में।
  • उपभोक्ताओं के अधिकारों के सलाहकार के रूप में।
  • उपभोक्ता सामग्री व सेवाओं के विक्रय प्रतिनिधियों के रूप में।
  • बचत व निवेश योजनाओं के प्रतिनिधि के रूप में।
  • बचत निवेश योजनाओं के कर्मचारी के रूप में।
  • फर्नीचर, उपकरणों व अन्य घरेलू सामान, सरकारी एम्पोरियम, हस्तकला केन्द्रों, घरेलू चीजों की उत्पादन इकाइयों के शोरूम के कर्मचारियों के रूप में।
  • नर्सरी स्कूल, डे केयर सेन्टर, क्रेच व बालवाड़ी के कर्मचारी के रूप में।
  • अतिथि गृह, होटल व दफ्तरों की देखरेख कर्मियों के रूप में।
  • गृह विज्ञान महाविद्यालयों व गृह विज्ञान विषय पढ़ाने वाले विद्यालयों के प्रयोगशाला सहायकों के रूप में।
  • ड्राइक्लीनिंग की दुकान के कर्मचारी के रूप में।
  • खानपान केंद्रों, अस्पताल के पथ्य विभाग, जलपान गृह, कैन्टीन व खाद्य सामग्री से संबधित स्टोर के कर्मचारी के रूप में।
  • वस्त्र/परिधान बनाने वाली इकाई में, वस्त्र उद्योग व डिजायनिंग इकाई के कर्मचारी के रूप में।

स्वरोजगार के अवसर[संपादित करें]

  • घरेलू हस्तकला, सजावटी सामग्री व रचनात्मक चीजों के उत्पादक के रूप में।
  • नर्सरी स्कूल, डे केयर सेन्टर, बालवाड़ी व क्रैच के मालिक के रूप में।
  • किसी अतिथि आवास गृह और पेइंग गेस्ट हाउस के मालिक के रूप में।
  • कपड़ों की सिलाई और सिले-सिलाए कपड़ों की फिनिशिंग करने वाले जैसे बटन, तुरपन व साड़ी पर फॉल लगाने वाले के रूप में।
  • बुटीक, बुने हुये कपड़ों की इकाई, वस्त्र बुनाई इकाई व वस्त्र सजावट इकाई के मालिक के रूप में।
  • ड्राइक्लीनिंग की दुकान के मालिक के रूप में।
  • कैंटीन मालिक के रूप में।
  • घर से पैक की गयी भोजन सामग्री व आहार सेवाओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में।
  • बेकरी, परिरक्षित व प्रसंस्करित (Processed) भोजन इकाई के मालिक के रूप में
  • पार्टियों की केटरिंग सेवा के प्रबंधक के रूप में।
  • कुकिंग, वस्त्र विज्ञान, वस्त्र सजावट, सॉफ्ट टॉय बनाने की व बुनाई इत्यादि की कक्षाएँ चलाने वाले के रूप में।
  • उपहारों की पैकिंग, ताजे व सूखे गुलदस्ते विक्रयकर्ता के रूप में व पार्टियों की सजावट के लिये सेवाएं देने वाले के रूप में।
  • बच्चों व महिलाओं की पत्रिकाओं के लेखक के रूप में।


संदर्भ[संपादित करें]

1. मैरी हेन्कॉक (2001), ‘होम साइंस ऐंड द नैशनलाइज़ेशन ऑफ़ डोमिस्टिसिटी इन कोलोनियल इण्डिया’, मॉडर्न एशियन स्टडीज़, खंड 35, भाग 4.

2. मालविका कार्लेकर (1994), ‘वुमंस नेचर ऐंड एक्सेस टू एजुकेशन’, सी. मुखोपाध्याय एवं एस. सेमोर (सम्पा.), वुमॅन, एजुकेशन ऐंड फैमिली स्ट्रक्चर इन इण्डिया, बोल्डर वेस्टव्यू, यूएसए.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. फजले गुफरान (५ जनवरी २०११). "गृह विज्ञान: आधुनिक महिला का आदर्श करियर". लाइव हिन्दुस्तान. http://www.livehindustan.com/news/edu/naidishaye/article1-story-269-276-152854.html. अभिगमन तिथि: १८ अप्रैल २०१४. 

वाह्य सूत्र[संपादित करें]