गुलाब जल

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गुलाब जल गुलाब की पंखुड़ियों से निकाला गया द्रव है। इसका उपयोग भोजन में फ्लेवर देने, कुच्ह सौन्दर्य प्रसाधनों एवं दवाओं के निर्माण एवं धार्मिक कार्यों में किया जाता है। यह एशिया और यूरोप में प्रयुक्त होता है।

यूं बनता है गुलाब जल[संपादित करें]

डेरा में गुलाब जल देसी विधि से भट्ठियों पर तैयार किया जाता है। गुलाब जल बनाने वाले भानू प्रताप इंसां ने बताया कि गुलाब जल तैयार करने के लिए पांच भट्ठियां लगी हुई हैं। सूर्योदय से पूर्व गुलाब के फूलों को तोड़ा जाता है।

भट्ठियों पर रखे तांबे के देग में 40 किलो फूल व इतना ही पानी डालकर भट्ठी चालू कर दी जाती है। देग में जो भाप बनती है उसे बांस की नली से तांबे के मटके में एकत्रित कर ली जाती है। ठंडा होने पर यह गुलाब जल में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने बताया कि 40 किलो फूलों से लगभग 35 लीटर गुलाब जल बन जाता है।

गुलाब जल ‘ए’ ‘बी’ व ‘सी’ श्रेणी में निकाला जाता है। ‘ए’ व ‘बी’ श्रेणी का गुलाब जल काम में लिया जाता है जबकि सी श्रेणी को वापस देग में डाल दिया जाता है।

इस विधि में एक बार गुलाब जल तैयार करने में 6-7 घंटे लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि सीजन में 4000 लीटर गुलाब जल तैयार किया जाता है। इसके अलावा थोड़ी बहुत मात्रा में गुलाब का तेल भी बनाया जाता है जो करीब 40 क्विंटल में एक किलो ही बन पाता है। इसलिए इसका उत्पादन कम ही किया जाता है।

गुणकारी है गुलाब जल[संपादित करें]

गुलाब जल कई कार्र्यो में काम आता है। शर्बत व मिठाइयों में इसे प्रयुक्त किया जाता है। चेहरे की सुंदरता बढ़ाने, आंखों में डालने में काम लिया जाता है। विभिन्न दवाइयों में भी गुलाब जल का इस्तेमाल किया जाता है। डेरा के अस्पताल में भी गुलाब जल से दवाइयां बनाई जाती हैं। यही नहीं, गुलाब तेल सेंट बनाने व ऑफ सीजन में गुलाब जल बनाने में काम लिया जाता है। डेरा में गुलाब से गुलकंद भी बनाया जाता है।

देशी किस्म से बनता है गुलाबजल, तेल और गुलकंद

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के बागवानी विभाग के अध्यक्ष डॉ. वीपी अहलावत ने बताया कि गुलाब की जवाला, नूरजहां और रोजडंस्कीना देशी किस्म का सुधरा हुआ कलमी किस्म है। इस किस्म का प्रयोग आमतौर पर सजावट के लिए होता है और इससे गुलाबजल, तेल या गुलकंद नहीं बनाया जाता। उन्होंने कहा कि गुलाब जल देशी विधि से ही बनाया जाता है और यही इसकी प्रचलित विधि है। बुलगेरियन रोज (देशी गुलाब की एक किस्म) में वालेटाइल तत्व ज्यादा होते हैं, से ही देशी विधि से तेल भी बनाया जाता है। यह तेल एक एकड़ की फसल में दो से ढाई लीटर तक तैयार हो जाता है जो ढाई से तीन लाख रुपए प्रति लीटर बिकता है।

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