गुरू घासीदास

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गुरू घासीदास (1756 – अंतर्ध्यान अज्ञात) ग्राम गिरौदपुरी तहसिल बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ अवतरित हुये थे गुरूजी सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है, गुरूजी भंडारपुरी को अपना धार्मिक स्थल के रुप में संत समाज को प्रमाणित सत्य के शक्ति के साथ दिये वहाँ गुरूजी के पूर्वज आज भी निवासरत है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिये।

जीवनी[संपादित करें]

सन १६७२ में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सतनामी साध मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत को मानते थे। वे सम्मान करते थे लेकिन किसी के सामने झुक कर नहीं। एक बार एक किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी साध ने भी उस कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकडते गया और धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें शाही फौज मार निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात भी फैल गई कि सतनामी समूह कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फरक नहीं पडा था। लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आध्यात्मिक शक्ती के कारण यह स्थिति थी। चूंकि सतनामी साधों का तप का समय पूरा हो गया था और वे गुरू के समक्ष अपना समर्पण कर वीरगति को प्राप्त हुए। जिन लोगों का तप पूरा नहीं हुआ था वे अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार तथा प्रसार किया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। ये बात बिल्कुल गलत है कि वे किसी दलित परिवार में पैदा हुए थे। चूंकि उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था,इसलिये हिन्दुओं और ब्राम्हणो के एक वर्ग ने प्रचारित किया कि ये तो दलित है। क्यों कि ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने के कारण उन्हें समाज से दूर करने का यही मार्ग उन लोगों को सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाया जाता है.

गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।

सतनाम् धर्म की मुख्य विशेषतायें[संपादित करें]

सतनाम् धर्म का संक्षिप्त में मुख्य विशेषतायें निम्न हैं-

१. सतनाम धर्म प्रत्येक मानव को मानव का स्थान देता है ।

२. सतनाम धर्म में न कोई छोटा और न कोई बड़ा होता है, इसमें सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है ।

३. जो ब्यक्ति सतनाम् धर्म को ग्रहण कर लेता है, उसके साथ उसी दिन से समानता का ब्यवहार जैसे बेटी देना या बेटी लेना प्रारम्भ हो जाता है ।

४. सतनाम् धर्म किसी भी जाति या धर्म का अवहेलना नही करता ।

५. सतनाम् धर्म हमेशा सच्चाई के पथ पर चलने की शिक्षा देता है ।

६. सतनाम् धर्म का प्रतीक चिन्ह जैतखाम है ।

७. सतनाम् धर्म में ७ अंक को शुभ माना जाता है ।

८. सतनाम् धर्म के मानने वाले दिन सोमवार को शुभ मानते है, इसी दिन परम पूज्य बाबा गुरू घासीदास जी का अवतार हुआ था ।

९. सतनाम् धर्म में गुरू गद्दी, सर्व प्रथम पूज्यनीय है ।

१०. सतनाम् धर्म में निम्न बातों पर विशेष बल दिया जाता है :

(क) सतनाम् पर विश्वास रखना
(ख) जीव हत्या नही करना
(ग) मांसाहार नही करना
(घ) चोरी, जुआ से दुर रहना
(च) नशा सेवन नही करना
(छ) जाति-पाति के प्रपंच में नही पड़ना
(ज) ब्यभिचार नही करना।

११. सतनाम् धर्म के मानने वाले एक दुसरे से मिलने पर "जय सतनाम" कहकर अभिवादन करते हैं ।

१२. सतनाम् धर्म में सत्यपुरूष पिता सतनाम् को सृष्टि का रचनाकार मानते हैं ।

१३. सतनाम् धर्म निराकार को मानता है, इसमें मूर्ती पूजा करना मना है ।

१४. सतनाम् धर्म में प्रत्येक ब्यक्ति "स्त्री-पुरूष" जिसका विवाह हो गया हो, गुरू मंत्र लेना "कान फुकाना" अनिवार्य है ।

१५. सतनाम् धर्म में पुरूष को कंठी-जनेऊ और महिलाओ को कंठी पहनना अनिवार्य है ।

१६. सतनाम् धर्म में मृत ब्यक्ति को दफनाया जाता है ।

१७. सतनाम् धर्म में पुरूष वर्ग का दशगात्र दश दिन में और महिला वर्ग का नौवे दिन में किया जाता है ।

१८. सतनाम् धर्म में मृतक शरीर को दफनाने के लिये ले जाने से पहले पुरूष वर्ग को पूर्ण दुल्हा एवं महिला वर्ग को पूर्ण दुल्हन के रूप में शृंगार करके ले जाया जाता है ।

१९. परिवार के कुल गुरू जिससे कान फुकाया "नाम पान" लिया रहता है साथ ही मृतक के भांजा को दान पुण्य दिया जाता है ।

२०. माताओ को जब पुत्र या पुत्री की प्राप्ति होती है तो उसे छः दिन में पूर्ण पवित्र माना जाता है ।

२१. सतनाम् धर्म में महिलाओ को पुरूष के जैसा हि समानता का अधिकार प्राप्त है ।

२२. सतनाम् धर्म में लड़के वाले पहले लड़की देखने जाते हैं ।

२३. सतनाम् धर्म में दहेज लेना या दहेज देना पूर्ण रूप से वर्जित है ।

२४. लड़के वाले लड़की पक्ष के परिवार वालो को नये वस्त्र देता है साथ ही दुल्हन को उसके सारे सृंगार का समान दिया जाता है ।

२५. सतनाम धर्म में सात फेरे होते हैं जिसमें दुल्हन, दुल्हे के आगे आगे चलती है ।

२६. सतनाम् धर्म में शादी होने पर सफेद कपड़ा पहनाकर तेल चढ़ाया जाता है ।

२७. दुल्हे का पहनावा "जब बारात जाता है" सफेद रंग का होता है । पहले मुख्य रूप से सफेद धोती, सफेद बंगाली और सफेद पगड़ी का चलन था परन्तु आज कल लोग अपने इच्छानुसार वस्त्र का चुनाव कर रहे हैं परन्तु एक बात अवश्य होनी चाहिये कि जब फेरा "भांवर" हो तो सतनाम् धर्म के अनुसार सफेद वस्त्र जरुर पहनना चाहिये ताकि धर्म का पालन हो और शादी सतनाम् धर्म के अनुरूप हो । २८. दुल्हन के साड़ी व ब्लाउज हल्का पिले रंग का होता है ।

२९. सतनाम् धर्म में स्वगोत्र के साथ विवाह करना सक्त मना है ।


छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर गुरू घासीदास जी का अवतरण सचमुच जीव जगत के जीवन में जोत जलाने के लिए हुआ था। गुरू ने नूतन व्यवस्था और नवीनधारा को परखा। उन्होंने पूॅजीवाद, समाजवादी तथा जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ सत संदेश का प्रचार किया। गुरूजी ने सतनाम आंदोलन चलाकर सम्पूर्ण मानव को एक सूत्र में पिरोया और सतनाम आंदोलन से ही स्वाधीनता आंदोलन के स्वरूप का निर्धारण हुआ आगे चलकर स्वतंत्र भारत की कल्पना भी साकार हो सकी। सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिये गुरूजी सघन दौरा कर समाजवाद के सिध्दांत को जन्म दिया। सतनाम आंदोलन को तीव्र गति को देने के लिये केन्द्र बिन्दु चिन्हित किया गया। सतनाम आंदोलन का मुख्य कार्यालय भंडारपुरी, तेलासी, बोड़सरा, चटुआ, खपरी, खडु़वा आदि स्थान से आंदोलन संचालित था। इनके अलावा सतनाम आंदोलन के छोटे-छोटे कई बनाये गये थे जहाॅ से आंदोलन का संचालन किया जाता था। छत्तीसगढ़ में खासकर बिलासपुर, मुंगेली, रतनपुर, पंडारिया, कवर्धा, गंड़ई खैरागढ़, राजनांदगांव, पानाबरस, दुर्ग, रायपुर, तेलासी, बलोदाबाजार, सिरपुर, राजिम, रायगढ़, जगदलपुर, उड़ीसा, के कुछ भाग नागपुर, चन्द्रपुर, सारंगढ़ कुदुरमाल, नारायणपुर, बीजापुर, कोन्टा, सुकमा, तक संचालित थे। गुरू घासीदास जी के पश्चात् इस आंदोलन को और तेज गति प्रदान करने में किसी को अह्म भूमिका दिखता है तो छत्तीसगढ़ के राजा गुरू बालकदास जी हैं अंग्रेजों के समय ही छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन का प्रभाव बन गया था। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ गुरू के समतावादी व्यवस्था से प्रभावित थे। सतनाममय छत्तीसगढ़ में गुरू के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार भी अंचभित थे। इसलिए गुरू बालकदास को ब्रिटिश सरकार ने राजा की उपाधि से विभूषित कर अपने ओर मिलाने का भरसक प्रयास किया। पर गुरू बालकदास में आजादी के सपने कूट-कूटकर भरा था, उन्होंने भारत के आजादी के लियें अपनों के साथ मिलकर नारायण सिंह को साथ लेकर काम किया। गुरू बालकदास ने अपने पिता के द्वारा चलाये रावटी प्रथा को तीव्र गति से बढ़ाया। इस गति में सोनाखान के बिझवार जमींदार रामसाय के पुत्र वीरनारायण गुरू के अच्छे मित्र रहे। दोनों ने अंग्रेजों के खिलाफ जमीदारी प्रथा, अकाल, भुख एवं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, यहीं कारण था कि गुरू बालकदास एवं वीरनारायण सिंह अंग्रेजों के लिए आंख की किरकिरी साबित हुए। सामंतवाद, साम्राज्यवाद तथा संभ्रातवाद के खिलाफ दोनों ने जमकर अगुवाई भी की। अन्याय, अत्याचार, रूढ़िवाद, और अंधविश्वास को जड़ से समाप्ति करने का बीड़ा भी गुरू बालकदास ने उठाया। अंग्रेजों ने गुरू के खिलाफ माहौल तैयार करने मुहिम चलाई, जिसमें मालगुजारों सामंतो व अपने को संभ्रांत समझने वालों ने अंग्रेजों का साथ दिया। छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन मूल रूप से सामाजिक आंदोलन का सामाजिक ढ़ंाचा में पहुंचाया, अंग्रेजो के खिलाफ प्रचार-प्रसार किया, गुरू का प्रभाव छत्तीसगढ़ के अनेक घरों तक पहुंचा। वे छत्तीसगढ़ समाज के बहादुर गुरू थे। गुरू ने सुरक्षा के लिये सेना का गठन कर उनका सुदृढ़ ढ़ंग से प्रशिक्षण चलाया। ब्रिटिश हुकूमत हिलने लगी थी। अंग्रेजों ने नई चाल चला छत्तीसगढ़ के अन्य लोंगो को मिलाकर गुरू की छवि धूमिल करना शुरू किया तथा गुरू के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिये तरह-तरह का षड्यंत्र शुरू हुआ, गुरू बालकदास की ख्याति शक्तिशाली राजा के समान थी। गुरू ठाठ-बांट से रहते थे, हाथी पर सवार होकर सतनाम आंदोलन तथा सतनाम सेना का संचालन करते हुऐ रावटी प्रथा जारी की थी।

गुरू घासीदास की शिक्षा[संपादित करें]

गुरू घासीदास बाबाजी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा, और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।

गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।

सात शिक्षाएँ[संपादित करें]

सत्गुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं-

(१) सतनाम् पर विश्वास रखना ।

(२) जीव हत्या नही करना ।

(३) मांसाहार नही करना ।

(४) चोरी, जुआ से दुर रहना ।

(५) नशा सेवन नही करना ।

(६) जाति-पाति के प्रपंच में नही पड़ना ।

(७) ब्यभिचार नही करना ।


  1. सत्य एवं अहिंसा
  2. धैर्य
  3. लगन
  4. करूणा
  5. कर्म
  6. सरलता
  7. व्यवहार

सतनामी कभी शुद्र थे ही नही वरन ब्राम्हणवाादि सडयन्त्रकर्ताओं और अम्बेडकरजी द्वारा थोपने का परिणाम है :-

सतनामी पूर्व में साध सतनामी के रूप में जाने जाते थे जिसकी संरचना १६७२ में हरियाणा में हुई थी, औरंगजेब से विद्रोह उपरांत साध मत के मानने वालों को पराजय का सामना करना पडा फलस्वरूप हरियाणा छोडकर अन्यत्र राज्यो में भागकर निवास करना पडा, हम सब वही सतनामी परिवार है, चूंकि साध मत का स्थापना करने वाले वीरभान एवं जोगीदास कभी शुद्र थे ही नही, इसलिए सतनामी स्वयं को कभी शुद्र और नीच नही मान सकते थे/ साधमत चूंकि ब्राम्हणवाद का खण्डन करता था इसलिए सडयन्त्रपूर्वक ब्राम्हणवादीलोग जब देश में जाति का वर्ग विभाजन हुआ उस समय सतनामी को अनुसूचित जाति के अधीन रखा गया जिससे यह मान लियागया कि सतनामी भी शुद्र हैं, सतनामी को शुद्र कहने से अम्बेडकरजी को भी लाभ था क्यों कि वे जानते थे सतनामी शुद्र नही है इसलिए वे शुद्रताको स्वीकार नही करेंगे साथ ही शुद्रता को ही समाप्त कर देने की योग्यता रखेंगे/ दुसरी ओर उन्होने स्वयं बौद्धधर्म को अपनाकर शुद्रों को अपने जातिभाईयों के मुक्ति के लिए दो मार्ग खोल लिये/ अम्बेडकरजी द्वारा शुद्रों की मुक्ति के लिए उच्चस्तरीय नीतिगण निर्णय लेते हुए सडयन्त्रकारी ब्राम्हणवादियों का समर्थन कर सतनामीयों पर शुद्रता थोपते हुए अनुजाति वर्ग में शामिल करने में अपना समर्थन दिये/ सतनामियों के लिए यही दुर्भाग्यकी विषय हैकि सतनामीगण इसके बावजूद जो हमपर शुद्रता थोपगये ऐसे अम्बेडकरजी को पूज्यनीय मानते है ////

इसके बावजूद हम सतनामी संकल्पित होते हैं कि ऐसे थोपेगये शुद्रता से स्वयं एवं अपने अनुयायीगणोंको मुक्त कर देंगे //

आचार्य हुलेश्वर जोशी 9406003006

सतनामी कभी शुद्र थे ही नही वरन ब्राम्हणवाादि सडयन्त्रकर्ताओं और अम्बेडकरजी द्वारा थोपने का परिणाम है :-

सतनामी पूर्व में साध सतनामी के रूप में जाने जाते थे जिसकी संरचना १६७२ में हरियाणा में हुई थी, औरंगजेब से विद्रोह उपरांत साध मत के मानने वालों को पराजय का सामना करना पडा फलस्वरूप हरियाणा छोडकर अन्यत्र राज्यो में भागकर निवास करना पडा, हम सब वही सतनामी परिवार है, चूंकि साध मत का स्थापना करने वाले वीरभान एवं जोगीदास कभी शुद्र थे ही नही, इसलिए सतनामी स्वयं को कभी शुद्र और नीच नही मान सकते थे/ साधमत चूंकि ब्राम्हणवाद का खण्डन करता था इसलिए सडयन्त्रपूर्वक ब्राम्हणवादीलोग जब देश में जाति का वर्ग विभाजन हुआ उस समय सतनामी को अनुसूचित जाति के अधीन रखा गया जिससे यह मान लियागया कि सतनामी भी शुद्र हैं, सतनामी को शुद्र कहने से अम्बेडकरजी को भी लाभ था क्यों कि वे जानते थे सतनामी शुद्र नही है इसलिए वे शुद्रताको स्वीकार नही करेंगे साथ ही शुद्रता को ही समाप्त कर देने की योग्यता रखेंगे/ दुसरी ओर उन्होने स्वयं बौद्धधर्म को अपनाकर शुद्रों को अपने जातिभाईयों के मुक्ति के लिए दो मार्ग खोल लिये/ अम्बेडकरजी द्वारा शुद्रों की मुक्ति के लिए उच्चस्तरीय नीतिगण निर्णय लेते हुए सडयन्त्रकारी ब्राम्हणवादियों का समर्थन कर सतनामीयों पर शुद्रता थोपते हुए अनुजाति वर्ग में शामिल करने में अपना समर्थन दिये/ सतनामियों के लिए यही दुर्भाग्यकी विषय हैकि सतनामीगण इसके बावजूद जो हमपर शुद्रता थोपगये ऐसे अम्बेडकरजी को पूज्यनीय मानते है ////

इसके बावजूद हम सतनामी संकल्पित होते हैं कि ऐसे थोपेगये शुद्रता से स्वयं एवं अपने अनुयायीगणोंको मुक्त कर देंगे //

सतनामी एवं सतनाम धर्म के अनुयायीगण