गुरु हनुमान

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गुरु हनुमान (अंग्रेजी: Guru Hanuman, जन्म: १९०१, मृत्यु: १९९९) भारत के प्रख्यात कुश्ती प्रशिक्षक (कोच) तो थे ही, स्वयं बहुत अच्छे पहलवान भी थे। उन्‍होंने सम्‍पूर्ण विश्‍व में भारतीय कुश्‍ती को महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिलाया। कुश्‍ती के क्षेत्र में विशेष उपलब्धियों के लिये उन्हें १९८३ में पद्मश्री पुरस्कार.[1] तथा १९८७ में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

जन्म[संपादित करें]

गुरु हनुमान का जन्म राजस्थान के झुँझुनू जिले की चिड़ावा तहसील में १५ मार्च १९०१ को हुआ था। उनका असली नाम विजय पाल था। बचपन में कमजोर स्वास्थ्य के कारण हमउम्र लड़के उन्हें अक्सर तंग करते थे। इसलिये उन्होंने सेहत बनाने की ओर बचपन में ही ध्यान देना शुरू कर दिया और अखाड़े में जाने लगे। कुश्ती के प्रति अगाध प्रेम के चलते उन्होंने २० साल की उम्र में घर त्याग दिया और राजस्थान से दिल्ली आ गये। भारतीय मल्लयुद्ध के आदर्श देवता हनुमान जी से प्ररित होकर विजय पाल ने अपना नाम बदल कर हनुमान रखा और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया। उनके स्वयं के कथन के अनुसार उनकी शादी तो कुश्ती से ही हुई थी। इस बात में कोई अतिशयोक्ति भी नहीं थी क्योंकि जितने भी पहलवान उनके सानिध्य में आगे निकले उनमें शायद ही किसी को उतना सम्मान मिला हो, जितना गुरु हनुमान को मिला।

गुरु हनुमान अखाड़े की स्थापना[संपादित करें]

कुश्ती के प्रति उनकी लगन को देखकर भारत के मशहूर उद्योगपति कृष्णकुमार बिड़ला ने उन्हें दिल्ली में अखाड़े के लिये जमीन दान में दे दी।१९४० में वे स्वतन्त्रता संग्राम में भी शामिल हुए।१९४७ में भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से भगाये गये हिन्दू शरणार्थियों की उन्होंने सेवा और सहायता की।१९४७ के बाद गुरु हनुमान अखाड़ा दिल्ली में पहलवानों का मन्दिर हो गया। १९८३ में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इस प्रकार१९२० में दिल्ली की "बिड़ला व्यायामशाला" का विस्तार गुरु हनुमान अखाड़े के रूप में हुआ। उन्होंने मीडिया वालों से कुश्ती कवरेज के लिये भी प्रार्थना की। गुरु हनुमान एक गुरु ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के लिये पिता तुल्य थे। कुश्ती का जितना सूक्ष्म ज्ञान उन्हें था शायद ही किसी और को हो।.[2]

कुश्ती प्रेमियों के मसीहा[संपादित करें]

गुरु हनुमान ने जब यह देखा कि प्राय: सभी पहलवानों को बुढ़ापे में आर्थिक तंगी होती ही है तो उन्होंने सरकार से पहलवानों को रोजगार देने के लिये सिफारिश भी की। जिसके परिणामस्वरुप आज अनेकों राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतने वाले पहलवानों को भारतीय रेलवे में भर्ती कर लिया जाता है। इस तरह उन्होंने हमेशा ही अपने शिष्यों की सहायता अपने बच्चों के समान की। उनका रहन सहन बिलकुल गाँव वालों की तरह था। उन्होंने सम्पूर्ण जीवन में धोती कुरते के अतिरिक्त कुछ और पहना ही नहीं। भारतीय स्टाइल की कुश्ती के वे माहिर थे। उन्होंने भारतीय स्टाइल और अन्तराष्ट्रीय स्टाइल दोनों प्रकार की कुश्ती-शैलियों का आपस में योग कराकर अनेकों एशियाई चैम्पियन भारतवर्ष को दिये।[3] पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाने के लिये उनकी लाठी कुश्ती के अखाड़े में काफी मशहूर थी। इसी लाठी के चलते सतपाल, करतार सिंह, १९७२ के ओलम्पियन प्रेमनाथ, सैफ विजेता वीरेन्दर ठाकरान (धीरज पहलवान), सुभाष पहलवान, हंसराम पहलवान जैसे अनगिनत पहलवान कुश्ती की मिसाल बने।

ये उनकी लाठी का ही कमाल था जो अखाड़े के पहलवानों को ३ बजे ही कसरत करने के लिये जगा देती थी। उनके अखाड़े में रहकर खिलाडी केवल पहलवानी ही नहीं बल्कि ब्रह्मचर्य, आत्मनिर्भरता और शाकाहार की ताकत भी सीखते थे। अपने घर आने वालो को भी वे चाय के स्थान पर बादाम की लस्सी पिलाते थे।

उनके शिष्य महाबली सतपाल छत्रसाल स्टेडियम में पहलवानों को अत्याधुनिक तरीके से मैट पर प्रशिक्षण देते हैं। इसी का परिणाम है कि उनके शिष्य पहलवानों में सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त एवं नरसिंह यादव जैसे पहलवान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर चुके हैं। गुरु के रूप में उनका योगदान एक अद्भुत यादगार है। कुश्ती के प्रति अपने प्रेम के चलते वे प्रतिदिन प्रात:काल ३ बजे उठ जाते थे। कुश्ती में उनके सर्वांगीण योगदान के लिये भारत सरकार ने उन्हें सन १९८७ में "द्रोणाचार्य अवार्ड" से सम्मानित किया। उनके तीन चेलों- सुदेश कुमार, प्रेम नाथ व वेद प्रकाश ने १९७२ के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। सतपाल पहलवान और करतार सिंह ने १९८२ और १९८६ के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। यही नहीं, उनके ८ चेलों ने भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार भी जीता।

गुरु हनुमान कुँवारे थे, आजीवन शाकाहारी रहे और उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत का मृत्यु पर्यन्त पालन किया। ९८ वर्ष की आयु में २४ मई, १९९९ को एक कार दुर्घटना में हरिद्वार जाते हुए मेरठ के पास उनकी आकस्मिक मृत्यु हुई।[4] इस प्रकार वे अपने जीवन का शतक पूरा नहीं कर सके।

उनकी आदमकद प्रतिमा नई दिल्ली के कल्याण विहार स्टेडियम में स्थापित की गयी जिसका अनावरंण दिल्ली के पूर्व मुख्य मन्त्री मदनलाल खुराना ने ९ अगस्त, २००३ को किया था।[5]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Guru Hanuman no more Financial Express, May 25, 1999.
  2. Obituary:Guru Hanuman The Guardian, June 21, 1999
  3. Guru Hanuman Martial arts of the world: an encyclopedia, by Thomas A. Green. Publisher: ABC-CLIO, 2001. ISBN 1-57607-150-2. Page 723
  4. City's who's who, disciples pay last respects to Guru Hanuman Indian Express, May 26, 1999.
  5. Guru Hanuman’s statue unveiled The Tribune, August 10, 2003

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]