गीतांजलि

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गीताञ्जलि (बंगला उच्चारण - गीतांजोलि) रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओ का संग्रह है, जिनके लिए उन्हे सन् १९१३ में नोबेल पुरस्कार मिला था। 'गीताँजलि' शब्द गीत और अन्जलि को मिला कर बना है जिसका अर्थ है - गीतों का उपहार (भेंट) । यह अग्रेजी में लिखी १०३ कविताएँ हैं (ज्यादातर अनुवाद) ।

यह अनुवाद इंग्लैड के दौरे पर शुरु किये गये थे जहां इन कविताओं को बहुत ही प्रशंसा से ग्रहण किया गया था । एक पतली किताब १९१३ में प्रकाशित की गई थी जिसमें डब्ल्यू बी यीट्स (W. B. Yeats) नें बहुत ही उत्साह से प्राक्कथन (preface) लिखा था। और उसी साल में रबिन्द्र नाथ टैगोर जी नें तीन पुस्तिकाओं के संग्रह लिखा जिसे नोबल पुरस्कार मिला । इस से रबिन्द्रनाथ टैगोर पहले एसे व्यक्ति थे जिन्हें यौरपवासी न होते हुये भी नोबल पुरस्कार मिला । गीतांजलि पश्चिमीजगत में बहुत ही प्रसिद्ध हुई हैं और इनके बहुत से अनुवाद किये गये हैं ।

इस रचना का मूल संस्करण बंगला मे था जिसमें ज्यादातर भक्तिमय गाने थे ।

बंगला गीतांजलि और अंग्रेजी गीतांजलि[संपादित करें]

'गीतांजलि' नामक अँग्रेजी की कविता-संग्रह बंगाली में लिखे गानों के संग्रह (जिसका नाम भी 'गीतांजलि' ही है) का अनुवाद नहीं है । गीतांजलि के सिलसिले में भी कई सवाल हैं; चर्चाएं हैं। जैसे अंग्रेजी गीतांजलि बिल्कुल वही नहीं है। जो बांग्ला है। विश्वभारती की बांग्ला गीतांजलि में साफ है कि अंग्रेजी गीतांजलि में इसकी मात्र 53 कविताएं ली गई है। अंग्रेजी में बांग्ला की सर्वाधिक चर्चित कविता ‘ह्वेयर द माइंड इज विदाउट फीयर’ है ही नहीं।

जबकि १०३ में से ५२ कवितायें उसी बंगाली संग्रह से ली गईं थी, दूसरी अन्य स्थानों (काव्यों) से ली गईं हैं - इन के नाम हैं: Gitimallo (1914,17), Noibeddo (1901,15), Khea (1906,11) and कुछ और काव्य । अनुवाद अकसर बहुत महत्वपूर्ण ठंग से बदलाव लाते हैं, कभी-कभी काफी हिस्से छोडे हुये हैं, और कई बार बीच में अन्य कवितायें भरी हैं ।

गीतांजलि की विषय-वस्तु[संपादित करें]

वैसे रवीन्द्रनाथ सूफी रहस्यवाद और वैष्णव काव्य से प्रभावित थे। फिर भी संवेदना चित्रण में वे इन कवियों को अनुकृति नहीं लगते। जैसे मनुष्य के प्रति प्रेम अनजाने ही परमात्मा के प्रति प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। वे नहीं मानते कि भगवान किसी आदम बीज की तरह है। उनके लिए प्रेम है प्रारंभ और परमात्मा है अंत !

सिर्फ इतना कहना नाकाफी है कि गीतांजलि के स्वर में सिर्फ रहस्यवाद है। इसमें मध्ययुगीन कवियों का निपटारा भी है। धारदार तरीके से उनके मूल्यबोधों के खिलाफ। हालांकि पूरी गीतांजलि का स्वर यह नहीं है। उसमें समर्पण की भावना प्रमुख विषयवस्तु है। यह रवीन्द्रनाथ का सम्पूर्ण जिज्ञासा से उपजी रहस्योन्मुखकृति है।

बाहरी_कड़ियाँ[संपादित करें]

श्रेणीङोबेल पुरस्कार