गदर पार्टी

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25 मार्च 1913 को अमेरिका के सेंट जान शहर में एक विशाल सभा में गदर पार्टी की स्थापना हुई। तब सभा के विचार थे कि अंग्रेजी राज के विरूध्द हथियार उठान गद्दारी नहीं महायुध्द है। हम इस विदेशी राज के आज्ञाकारी नहीं घोर दुश्मन हैं। हमारी इसी दुश्मनी को अंग्रेज गद्दरी कहते हैं। इसीलिए वे हमारी 1857 की आजादी की जंग को गदर कहते आ रहे हैं।

गदरियों को कोलम्बिया नदी (अमेरिका) के किनारे के भारतीय मजदूरों में काम शुरू किया। गदर पार्टी ने 21 अप्रैल 1931 को असटेरिया की आरा मिलों में एक बुनियादी प्रस्ताव पास किया जिसके तहत कहा गया कि गदर पार्टी हथियार बंद इंकलाब की मदद से अंग्रेजी राज से भारत को आजाद कर कौमी जम्हूरियत (गणतंत्र) कायम करेंगी। गौरतलब है कि यह प्रस्ताव भारतीय कांग्रेस ने 16 साल बाद पंडित नेहरू के बहुत दबाव के बाद 1929 में लाहौर में पास किया था। सभा में हर वर्ष चुनाव करने का निर्णय लिया साथ ही यह भी तय किया गया कि इसमें कोई धार्मिक बहस नहीं होगी। धर्म को एक निजी मामला समझा गया था। हर समुदाय प्रत्येक माह एक डालर चंदा देगा, गदर का अखबार हिंदी, पंजाबी और उर्दू में निकाला जाएगा। पहले महायुध्द के छित्रडते ही जब भारत के अन्य दल अंग्रेजों को सहयोग दे रहे थे गदरियों ने अंग्रेजी राज के विरूध्द जंग घोषित कर दी। उनका मानना था-

सुरा सो पहचानिये, जो लडे दीन के हेत ।

पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कभूं न छाडे खेत॥


अधिकांश गदरी सिख मजदूर और सैनिक थे अतएव उन्होने अपनी लत्रडाई पंजाब से प्रारंभ की, पर बंगाल के क्रांतिकारियों (रास बिहारी बोस) को भी साथ में जोडा। विद्रोह लाहौर की मियांमीर छावनी और फिरोजपुर छावनी से प्रारंभ करना निश्चित हुआ। मियांमीर उस समय अंग्रेजो की 9 डिवीजन में से एक डिजाइन का केंद्र था और पंजाब की सभी छावनियां इसके आधीन थीं। फिरोजपुर की छावनी में इतना हथियार व गोलाबारूद था जिसके इस्तेमाल से अंग्रेज सेना को पराजित किया जा सकता था। उस समय तक गोरी सेना यूरोप भेजी आ चुकी थी और छावनियों में अधिकांश भारतीय मूल के सिपाही और अफसर ही मौजूद थे। थोत्रडे हथियार बंद लोगों और छावनी के सिख सिपाहियों की मदद से इस जंग को लत्रडा जाना था। करतार सिंह सराला व साथी मरेठ, इलाहबाद इत्यादि छावनियों में भारतीय सैनिकों से बात भी कर चुके थे। लेकिन अंग्रेजी खुफिया एजेंसी को गदर की योजना की जानकारी हो गई। बत्रडे पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई।


रौलट एक्ट के मुताबिक फरवरी 1915 तक 3125 गदरी पंजाब में आये और इसके बाद 2576 (1917 तक) गदरी आये। एक अंदाज में 8000 से 10000 गदरी विदेश से भारत आयें। 145 गदरियों को फांसी 306 को काला पानी व 77 को कम सजा हुई। लगभग 5500 व्यक्तियों को गांवों में कैद किया गया। 1857 के बाद भारतीय इतिहास का यह सबसे बत्रडा गदर था।


आजादी के बाद जब गदरी 30-40 साल की कैद काट कर बाहर निकले तो उन्होंने क्रांतिकारी विरासत को जीवित रखने के लिए जालंधर में देशभक्त यादगार कमेटी वह हाल का गठन किया और 15 साल से इन क्रांतिकारी शहीदों की कुर्बानियों को आज भी जीवित रखे हुए हैं।

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