खंड-१०

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 4 From Hindi Literature Jump to: navigation, search लेखक: रामधारी सिंह "दिनकर"

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दिनमणि पश्चिम की ओर ढले देखते हुए संग्राम घोर , गरजा सहसा राधेय, न जाने, किस प्रचण्ड सुख में विभोर . सामने प्रकट हो प्रलय ! फाड़ तुझको मैं राह बनाऊंगा , जाना है तो तेरे भीतर संहार मचाता जाऊंगा .

क्या धमकाता है काल ? अरे, आ जा, मुट्ठी में बन्द करूं . छुट्टी पाऊं, तुझको समाप्त कर दूं, निज को स्वच्छन्द करूं . ओ शल्य ! हयों को तेज करो, ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहां , गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों चुनकर सारे वीर जहां .

हो शास्त्रों का झन-झन-निनाद, दन्तावल हों चिंग्घार रहे , रण को कराल घोषित करके हों समरशूर हुङकार रहे , कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड, उठता होर आर्त्तनाद क्षण-क्षण , झनझना रही हों तलवारें; उडते हों तिग्म विशिख सन-सन .

संहार देह धर खड़ा जहां अपनी पैंजनी बजाता हो , भीषण गर्जन में जहां रोर ताण्डव का डूबा जाता हो . ले चलो, जहां फट रहा व्योम, मच रहा जहां पर घमासान , साकार ध्वंस के बीच पैठ छोड़ना मुझे है आज प्राण .

समझ में शल्य की कुछ भी न आया , हयों को जोर से उसने भगाया . निकट भगवान् के रथ आन पहुंचा , अगम, अज्ञात का पथ आन पहुंचा ?

अगम की राह, पर, सचमुच, अगम है , अनोखा ही नियति का कार्यक्रम है . न जानें न्याय भी पहचानती है , कुटिलता ही कि केवल जानती है ?

रहा दीपित सदा शुभ धर्म जिसका , चमकता सूर्य-सा था कर्म जिसका , अबाधित दान का आधार था जो , धरित्री का अतुल श्रृङगार था जो ,

क्षुधा जागी उसी की हाय, भू को , कहें क्या मेदिनी मानव-प्रसू को ? रुधिर के पङक में रथ को जकड़ क़र , गयी वह बैठ चक्के को पकड़ क़र .

लगाया जोर अश्वों ने न थोडा , नहीं लेकिन, मही ने चक्र छोडा . वृथा साधन हुए जब सारथी के , कहा लाचार हो उसने रथी से .

बडी राधेय ! अद्भुत बात है यह . किसी दु:शक्ति का ही घात है यह . जरा-सी कीच में स्यन्दन फंसा है , मगर, रथ-चक्र कुछ ऐसा धंसा है ;

निकाले से निकलता ही नहीं है , हमारा जोर चलता ही नहीं है , जरा तुम भी इसे झकझोर देखो , लगा अपनी भुजा का जोर देखो .

हँसा राधेय कर कुछ याद मन में , कहा, हां सत्य ही, सारे भुवन में , विलक्षण बात मेरे ही लिए है , नियति का घात मेरे ही लिए है .

मगर, है ठीक, किस्मत ही फंसे जब , धरा ही कर्ण का स्यन्दन ग्रसे जब , सिवा राधेय के पौरुष प्रबल से , निकाले कौन उसको बाहुबल से ?

उछलकर कर्ण स्यन्दन से उतर कर , फंसे रथ-चक्र को भुज-बीच भर कर , लगा ऊपर उठाने जोर करके , कभी सीधा, कभी झकझोर करके .

मही डोली, सलिल-आगार डोला , भुजा के जोर से संसार डोला न डोला, किन्तु, जो चक्का फंसा था , चला वह जा रहा नीचे धंसा था .

विपद में कर्ण को यों ग्रस्त पाकर , शरासनहीन, अस्त-व्यस्त पाकर , जगा कर पार्थ को भगवान् बोले _ खडा है देखता क्या मौन, भोले ?

रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 5 From Hindi Literature Jump to: navigation, search लेखक: रामधारी सिंह "दिनकर"

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शरासन तान, बस अवसर यही है , घड़ी फ़िर और मिलने की नहीं है . विशिख कोई गले के पार कर दे , अभी ही शत्रु का संहार कर दे .

श्रवण कर विश्वगुरु की देशना यह , विजय के हेतु आतुर एषणा यह , सहम उट्ठा जरा कुछ पार्थ का मन , विनय में ही, मगर, बोला अकिञ्चन .

नरोचित, किन्तु, क्या यह कर्म होगा ? मलिन इससे नहीं क्या धर्म होगा ? हंसे केशव, वृथा हठ ठानता है . अभी तू धर्म को क्या जानता है ?

कहूं जो, पाल उसको, धर्म है यह . हनन कर शत्रु का, सत्कर्म है यह . क्रिया को छोड़ चिन्तन में फंसेगा , उलट कर काल तुझको ही ग्रसेगा .

भला क्यों पार्थ कालाहार होता ? वृथा क्यों चिन्तना का भार ढोता ? सभी दायित्व हरि पर डाल करके , मिली जो शिष्टि उसको पाल करके ,

लगा राधेय को शर मारने वह , विपद् में शत्रु को संहारने वह , शरों से बेधने तन को, बदन को , दिखाने वीरता नि:शस्त्र जन को .

विशिख सन्धान में अर्जुन निरत था , खड़ा राधेय नि:सम्बल, विरथ था , खड़े निर्वाक सब जन देखते थे , अनोखे धर्म का रण देखते थे .

नहीं जब पार्थ को देखा सुधरते , हृदय में धर्म का टुक ध्यान धरते . समय के योग्य धीरज को संजोकर , कहा राधेय ने गम्भीर होकर .

नरोचित धर्म से कुछ काम तो लो ! बहुत खेले, जरा विश्राम तो लो . फंसे रथचक्र को जब तक निकालूं , धनुष धारण करूं, प्रहरण संभालूं ,

रुको तब तक, चलाना बाण फिर तुम ; हरण करना, सको तो, प्राण फिर तुम . नहीं अर्जुन ! शरण मैं मागंता हूं , समर्थित धर्म से रण मागंता हूं .

कलकिंत नाम मत अपना करो तुम , हृदय में ध्यान इसका भी धरो तुम . विजय तन की घडी भर की दमक है , इसी संसार तक उसकी चमक है .

भुवन की जीत मिटती है भुवन में , उसे क्या खोजना गिर कर पतन में ? शरण केवल उजागर धर्म होगा , सहारा अन्त में सत्कर्म होगा .

उपस्थित देख यों न्यायार्थ अरि को , निहारा पार्थ ने हो खिन्न हरि को . मगर, भगवान् किञ्चित भी न डोले , कुपित हो वज्र-सी यह वात बोले _

प्रलापी ! ओ उजागर धर्म वाले ! बड़ी निष्ठा, बड़े सत्कर्म वाले ! मरा, अन्याय से अभिमन्यु जिस दिन , कहां पर सो रहा था धर्म उस दिन ?

हलाहल भीम को जिस दिन पड़ा था , कहां पर धर्म यह उस दिन धरा था ? लगी थी आग जब लाक्षा-भवन में, हंसा था धर्म ही तब क्या भुवन में ?

सभा में द्रौपदी की खींच लाके , सुयोधन की उसे दासी बता के , सुवामा-जाति को आदर दिया जो , बहुत सत्कार तुम सबने किया जो ,

नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था , उजागर, शीलभूषित धर्म ही था . जुए में हारकर धन-धाम जिस दिन , हुए पाण्डव यती निष्काम जिस दिन ,

चले वनवास को तब धर्म था वह , शकुनियों का नहीं अपकर्म था वह . अवधि कर पूर्ण जब, लेकिन, फिरे वे , असल में, धर्म से ही थे गिरे वे .

रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 6 From Hindi Literature Jump to: navigation, search लेखक: रामधारी सिंह "दिनकर"

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बडे पापी हुए जो ताज मांगा , किया अन्याय; अपना राज मांगा . नहीं धर्मार्थ वे क्यों हारते हैं , अधी हैं, शत्रु को क्यों मारते हैं ?

हमीं धर्मार्थ क्या दहते रहेंगे ? सभी कुछ मौन हो सहते रहेंगे ? कि दगे धर्म को बल अन्य जन भी ? तजेंगे क्रूरता-छल अन्य जन भी ?

न दी क्या यातना इन कौरवों ने ? किया क्या-क्या न निर्घिन कौरवों ने ? मगर, तेरे लिए सब धर्म ही था , दुहित निज मित्र का, सत्कर्म ही था .

किये का जब उपस्थित फल हुआ है , ग्रसित अभिशाप से सम्बल हुआ है , चला है खोजने तू धर्म रण में , मृषा किल्विष बताने अन्य जन में .

शिथिल कर पार्थ ! किंचित् भी न मन तू . न धर्माधर्म में पड भीरु बन तू . कडा कर वक्ष को, शर मार इसको , चढा शायक तुरत संहार इसको .

हंसा राधेय, हां अब देर भी क्या ? सुशोभन कर्म में अवसेर भी क्या ? कृपा कुछ और दिखलाते नहीं क्यों ? सुदर्शन ही उठाते हैं नहीं क्यों ?

कहा जो आपने, सब कुछ सही है , मगर, अपनी मुझे चिन्ता नहीं है ? सुयोधन-हेतु ही पछता रहा हूं , बिना विजयी बनाये जा रहा हूं .

वृथा है पूछना किसने किया क्या , जगत् के धर्म को सम्बल दिया क्या ! सुयोधन था खडा कल तक जहां पर , न हैं क्या आज पाण्डव ही वहां पर ?

उन्होंने कौन-सा अपधर्म छोडा ? किये से कौन कुत्सित कर्म छोडा ? गिनाऊं क्या ? स्वयं सब जानते हैं , जगद्गुरु आपको हम मानते है .

शिखण्डी को बनाकर ढाल अर्जुन , हुआ गांगेय का जो काल अर्जुन , नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था . हरे ! कह दीजिये, वह धर्म ही था .

हुआ सात्यकि बली का त्राण जैसे , गये भूरिश्रवा के प्राण जैसे , नहीं वह कृत्य नरता से रहित था , पतन वह पाण्डवों का धर्म-हित था .

कथा अभिमन्यु की तो बोलते हैं , नहीं पर, भेद यह क्यों खोलते हैं ? कुटिल षडयन्त्र से रण से विरत कर , महाभट द्रोण को छल से निहत कर ,

पतन पर दूर पाण्डव जा चुके है , चतुर्गुण मोल बलि का पा चुके हैं . रहा क्या पुण्य अब भी तोलने को ? उठा मस्तक, गरज कर बोलने को ?

वृथा है पूछना, था दोष किसका ? खुला पहले गरल का कोष किसका ? जहर अब तो सभी का खुल रहा है , हलाहल से हलाहल धुल रहा है .