केदारनाथ अग्रवाल
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केदारनाथ अग्रवाल (1 अप्रैल, 1911 - २०००) प्रमुख हिन्दी कवि थे।
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[संपादित करें] जीवनी
1 अप्रैल 1911 को उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के कमासिन गाँव में जन्मे केदारनाथ का इलाहाबाद से गहरा रिश्ता था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने लिखने की शुरुआत की। उनकी लेखनी में प्रयाग की प्रेरणा का बड़ा योगदान रहा है। प्रयाग के साहित्यिक परिवेश से उनके गहरे रिश्ते का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी सभी मुख्य कृतियाँ इलाहाबाद के परिमल प्रकाशन से ही प्रकाशित हुई।
प्रकाशक शिवकुमार सहाय उन्हें पितातुल्य मानते थे और 'बाबूजी' कहते थे। लेखक और प्रकाशक में ऐसा गहरा संबंध ज़ल्दी देखने को नहीं मिलता। यही कारण रहा कि केदारनाथ ने दिल्ली के प्रकाशकों का प्रलोभन ठुकरा कर परिमल से ही अपनी कृतियाँ प्रकाशित करवाईं। उनका पहला कविता संग्रह फूल नहीं रंग बोलते हैं परिमल से ही प्रकाशित हुआ था। जब तक शिवकुमार जीवित थे, वह प्रत्येक जयंती को उनके निवास स्थान पर गोष्ठी और सम्मान समारोह का आयोजन करते थे।
'मैंने उसको जब-जब देखा,
लोहा देखा, लोहे जैसा तपते देखा,
गलते देखा, ढलते देखा,
मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।'
एक विरांगना पर लिखी केदारनाथ की यह पंक्तियाँ उनके सहज और सरल व्यक्तित्व का परिचय देती हैं।
[संपादित करें] प्रमुख कृतियाँ
युग की गंगा, नींद के बादल, लोक और अलोक, आग का आइना, पंख और पतवार, अपूर्वा, बोले बोल अनमोल, आत्म गंध आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उनकी कई कृतियाँ अंग्रेजी, रूसी और जर्मन भाषा में अनुवाद भी हो चुकी हैं। केदार शोधपीठ की ओर हर साल एक साहित्यकार को लेखनी के लिए 'केदार सम्मान' से सम्मानित किया जाता है।
[संपादित करें] सम्मान
सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी सम्मान, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार आदि।
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
- केदारनाथ अग्रवाल की राजनीतिक दृष्टि
- केदारनाथ अग्रवाल की रचनाएँ कविता कोश में
- केदारनाथ अग्रवाल(हिंदीकुंज में )
- हिन्दी साहित्य
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