कृष्णा सोबती
| कृष्णा सोबती | |
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| जन्म | 18 फरवरी 1925 गुजरात گجرات, पाकिस्तान, ब्रिटिश भारत |
| व्यवसाय | आख्यायिका लेखक, रचनाकार |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| उल्लेखनीय कार्य | मित्रो मरजानी, डार से बिछुरी, सूरजमुखी अंधेरे के आदि |
| उल्लेखनीय सम्मान | 1999: कछा चुडामणी पुरस्कार 1981: शिरोमणी पुरस्कार 1982: हिन्दी अकादमी अवार्ड 2000-2001: शलाका पुरस्कार 1980: साहित्य अकाडमी अवार्ड 1996: साहित्य अकादमी फेलोशिप |
कृष्णा सोबती (१८ फरवरी १९२५, गुजरात (अब पाकिस्तान)) अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताज़गी़ दी है। उनके भाषा संस्कार के घनत्व, जीवंत प्रांजलता और संप्रेषण ने हमारे वक्त के कई पेचीदा सत्य उजागर किए हैं।
डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार तिन पहाड़, बादलों के घेरे, सूरजमुखी अंधेरे के, ज़िन्दगी़नामा, ऐ लड़की, दिलोदानिश, हम हशमत, और समय सरगम तक उनकी कलम ने उत्तेजना, आलोचना विमर्श, सामाजिक और नैतिक बहसों की जो फिज़ा साहित्य में पैदा की है उसका स्पर्श पाठक लगातार महसूस करता रहा है।
[संपादित करें] पुरस्कार
साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता समेत कई राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती ने पाठक को निज के प्रति सचेत और समाज के प्रति चैतन्य किया है।
[संपादित करें] सम्मान
आपको हिंदी अकादमी दिल्ली की ओर से वर्ष २०००-२००१ के शलाका सम्मान से सम्मानित किया गया है।
[संपादित करें] बाहरी कड़ियां
- - शब्दों के आलोक मे कृष्णा सोबती का भाषा चिंतन (शोध पत्र)
- कृष्णा सोबती(हिंदीकुंज में )
- अविभाजित पंजाब के ग्रामीण परिदृश्य को उजागर करता कृष्णा सोबती का उपन्यास ज़िंदगीनामा
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