क्रम-विकास
जीवों में वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार या अनुकूल कार्य करने के लिए क्रमिक परिवर्तन तथा इसके फलस्वरूप नई जाति के जीवों की उत्पत्ति को क्रम-विकास या उद्विकास (Evolution) कहते हैं।[1] क्रम-विकास एक मन्द एवं गतिशील प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप आदि युग के सरल रचना वाले जीवों से अधिक विकसित जटिल रचना वाले नये जीवों की उत्पत्ति होती है।[2] जीव विज्ञान में क्रम-विकास किसी जीव की आबादी की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के दौरान जीन में आया परिवर्तन है। हालांकि किसी एक पीढ़ी में आये यह परिवर्तन बहुत छोटे होते हैं लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ यह परिवर्तन संचित हो सकते हैं और समय के साथ उस जीव की आबादी में काफी परिवर्तन ला सकते हैं। यह प्रक्रिया नई प्रजातियों के उद्भव [3] में परिणित हो सकती है। दरअसल, विभिन्न प्रजातियों के बीच समानता इस बात का द्योतक है कि सभी ज्ञात प्रजातियाँ एक ही आम पूर्वज (या पुश्तैनी जीन पूल) की वंशज हैं और क्रमिक विकास की प्रक्रिया ने इन्हें विभिन्न प्रजातियों मे विकसित किया है।[4]
संदर्भ [संपादित करें]
- ↑ सिंह, गौरीशंकर (मार्च १९९२). हाई-स्कूल जीव-विज्ञान. कोलकाता: नालन्दा साहित्य सदन. प॰ ८२.
- ↑ यादव, नारायण, रामनन्दन, विजय (मार्च २००३). अभिनव जीवन विज्ञान. कोलकाता: निर्मल प्रकाशन. प॰ २२१.
- ↑ (Gould 2002)
- ↑ Futuyma, Douglas J. (2005). Evolution. Sunderland, Massachusetts: Sinauer Associates, Inc. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-87893-187-2.
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
- जीवजाति का उद्भव (origin of Species)
- विकासवाद का इतिहास
- आण्विक क्रम-विकास
- चार्ल्स डार्विन
- लैमार्कवाद या लैमार्क का विकासवाद
- उत्परिवर्तन
बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]
- डार्विन के विकासवाद की प्रासंगिकता (डी डब्ल्यू वर्ड)
- विकसित होता विकासवाद
- कैसे थे पृथ्वी के प्रारंभिक जीवधारी? ललित किशोर पांडेय
