कार्नो प्रमेय

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कर्नो प्रमेय (Carnot's theorem) किसी ऊष्मा इंजन की अधिकतम दक्षता की सीमा बताने वाला सिद्धान्त है। इसे सन् १८२४ में सादी कार्नो ने प्रतिपादित किया था। इसे 'कार्नो का नियम' भी कहते हैं।

कार्नो प्रमेय के अनुसार:

  • किन्हीं दो ऊष्माशयों (heat reservoirs) के बीच काम करने वाला कोई भी ऊष्मा इंजन उन्हीं ऊष्माशयों के बीच काम करने वाले कार्नो इंजन (Carnot engine) से कम दक्ष होगा।
  • दो ऊष्माशयों के बीच कार्य करने वाले सभी 'उत्क्रमणीय' ऊष्मा इंजन (reversible heat engines) उन्हीं ऊष्माशयों के बीच कार्य करने वाले कार्नो इंजन के बराबर ही दक्षता वाले होते हैं।

इस अधिकतम दक्षता का सूत्र है-

\eta_{\text{max}} = \eta_{\text{Carnot}} = 1 - \frac{T_C}{T_H}

जहाँ TC ठण्डे ऊष्माशय का परम ताप है और TH गरम ऊष्माशय का परम ताप है। यहाँ दक्षता की परिभाषा है -

\eta = इंजन द्वारा किया गया कार्य / गरम ऊष्माशय से ली गयी ऊर्जा

आधुनिक ऊष्मागतिकी के आधार पर कार्नो का प्रमेय ऊषमागतिकी के द्वितीय नियम का परिणम है।

कार्नो प्रमेय की सिद्धि (उपपत्ति)

सिद्धि[संपादित करें]

ईंधन सेल और बैटरियों पर कार्नो प्रमेय की अनुप्रयोज्यता (Applicability)[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]