कामताप्रसाद गुरु

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कामताप्रसाद गुरु (१८७५ - १६ नवंबर, १९४७ ई.) हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वैयाकरण तथा साहित्यकार

परिचय[संपादित करें]

कामताप्रसाद गुरु का जन्म सागर में सन्‌ १८७५ ई. (सं. १९३२ वि.) में हुआ। १७ वर्ष की आयु में ये इंट्रेंस की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। १९२० ई. में लगभग एक वर्ष तक इन्होंने इंडियन प्रेस, प्रयाग से प्रकाशित 'बालसखा' तथा "सरस्वती' पत्रिकाओं का संपादन किया। ये बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे और अनेक भाषाओं का इन्हें अच्छा ज्ञान था। 'सत्य', 'प्रेम', 'पार्वती और यशोदा' (उपन्यास), 'भौमासुर वध', "विनय पचासा' (ब्रजभाषा काव्य), 'पद्य पुष्पावली', 'सुदर्शन' (पौराणिक नाटक) तथा 'हिंदुस्तानी शिष्टाचार' इनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

किंतु गुरु जी की असाधारण ख्याति उनकी उपर्युक्त साहित्यिक कृतियों से नहीं, बल्कि उनके "हिंदी व्याकरण" के कारण है जिसका प्रकाशन सर्वप्रथम नागरीप्रचारिणी सभा, काशी में अपनी लेखमाला में सं. १९७४ से सं. १९७६ वि. के बीच किया और जो सं. १९७७ (१९२० ई.) में पहली बार सभा से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुआ। यह हिंदी भाषा का सबसे बड़ा और प्रामाणिक व्याकरण माना जाता है। कतिपय विदेशी भाषाओं में इसके अनुवाद भी हुए हैं। 'संक्षिप्त हिंदी व्याकरण', 'मध्य हिंदी व्याकरण' और 'प्रथम हिंदी व्याकरण' इसी के संक्षिप्ताकृत संस्करण हैं। गुरु जी ने अपने जीवनकाल में कई बार इसमें कुछ विशेष महत्वपूर्ण परिष्कार किए।

गुरु जी का निधन १६ नवंबर, १९४७ ई. को जबलपुर में हुआ।

गुरू का हिन्दी व्याकरण[संपादित करें]

हिन्दी भाषा के हिन्दी में लिखे गये व्याकरणों में कामता प्रसाद गुरू का हिन्दी व्याकरण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह हिंदी व्याकरण काशी नागरीप्रचारिणी सभा के अनुरोध और उत्तेजन से लिखा गया है। किसी भी भाषा का ‘सर्वांगपूर्ण’ व्याकरण वही है, जिससे उस भाषा के सब शिष्ट रूपों और प्रयोगों का पूर्ण विवेचन किया जाय और उनमें यथासंभव स्थिरता लाई जाय। एक बात यहाँ स्पष्ट कर लेनी चाहिए कि गुरू का व्याकरण शिष्ट भाषा रूपों का नियमित करने का प्रयत्न है। कामता प्रसाद गुरू का यह स्वप्न था कि “हिंदी भाषा के लिए वह दिन सचमुच बड़े गौरव का होगा, जब इसका व्याकरण ‘अष्टाध्यायी’ और ‘महाभाष्य’ के मिश्रित रूप में लिखा जायगा।” गुरु ने इस पुस्तक के बारे में लिखा था,- “इस पुस्तक में सभी जगह अँगरेजी व्याकरण का अनुकरण नहीं किया गया है। इसमें यथासंभव संस्कृत प्रणाली का भी अनुसरण किया गया है और यथास्थान अँगरेजी व्याकरण के कुछ दोष भी दिखाए गए हैं।”

गुरु कहते हैं कि “जिस प्रकार किसी संस्था के संतोषपूर्वक चलने के लिए सर्वसम्मत नियमों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार भाषा की चंचलता दूर करने और उसे व्यवस्थित रूप में रखने के लिए व्याकरण ही प्रधान और सर्वोत्तम साधन है। हिंदी भाषा के लिए वह नियंत्रण और भी आवश्यक है, क्योंकि इसका स्वरूप उपभाषाओं की खींचातानी में अनिश्चित सा हो रहा है।”

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]