काच का इतिहास

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रंगीन काच की खिड़की (१६वीं शताब्दी)

प्रकृति में ऑब्सीडियन (Obsidian) पाषाण पाया जाता है जो एक प्रकार का काच है। यह ज्वालामुखी पहाड़ों से निकलता है और इसके टुकड़ों में तीव्र धार होती है। पाषाण युग में वाण के सिरे, भालों की नाकें एवं चाकू के फल इसी के बनाए जाते थे। धातु युग में इसी आब्सीडियन पाषाण से श्रृंगार की वस्तुएँ, जैसे दर्पण इत्यादि, बनाए गए।

किंवदंती के अनुसार, मुनष्य को काच का पता तब चला जब कुछ व्यापारियों ने सीरिया में फ़ीनीशिया के समुद्रतट पर शोरों के ढेलों पर भोजन के पात्र चढ़ाए। अग्नि के प्रज्वलित होने पर उन्हें द्रवित काच की धारा बहती हुई दिखाई दी। यह काच बालू और शोरे के संयोग से बन गया था।

ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वप्रथम बर्तनों पर काच के समान चमक उत्पन्न करने की रीति का आविष्कार मेसोपोटामिया (इराक) में ईसा से प्राय: 12,000 वर्ष पूर्व हुआ।

प्राचीनतम काच साँचे में ढले हुए ताबीज के रूप में मिस्र में पाया गया है, जिसका निर्माणकाल ईसा से 7,000 वर्ष पूर्व माना जाता था।

ईसा से लगभग 1,200 वर्ष पूर्व, मिस्रवासियों ने खुले साँचों में काच को दबाने का कार्य आरंभ किया और इस विधि से काच की तश्तरियाँ, कटोरे आदि बनाए गए। ईसा के 1,550 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा युग के आरंभ तक मिस्र काचनिर्माण का केंद्र बना रहा।

फुँकनी द्वारा तप्त काच को फूँकने की क्रिया मानव का एक महान्‌ आविष्कार था और इसका श्रेय भी फ़ीनीशियावासियों को ही है। इस आविष्कार की अवधि ईसा से 320-20 वर्ष पूर्व है। इस आविष्कार द्वारा काच के अनेक प्रकार के खोखले पात्र बनाए जाने लगे। वस्तुत: आजकल के काच निर्माण के आधुनिक यंत्रों में भी इसी क्रिया का उपयोग किया जाता है।

काच उद्योग का व्यापारिक विस्तार ईसा काल से आरंभ होता है। इटली के रोम तथा वेनिस प्रदेशों में इसका निर्माण चरम सीमा पर पहुँचा।

अपनी आवश्यकताओं और वैज्ञानिक उन्नति के साथ प्रत्येक देश में विभिन्न गुणों के काच के निर्माण में उन्नति होती गई। काच उद्योग की आधुनिक उन्नति का बहुत कुछ श्रेय इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमरीका को है। उदाहरणत:, सन्‌ 1557 ई. में सीसयुक्त स्फटिक का लंदन में आविष्कार हुआ; सन्‌ 1668 में पट्टिका काच ढालने की विधि का पेरिस में आविष्कार हुआ; सन्‌ 1880 में लेंस (लेंञ्ज़ा) आदि बनाने योग्य अनेक प्रकार के काचों का आविष्कार जर्मनी में शाट एवं एवी द्वारा हुआ; 1879 में काच बनाने के लिए पूर्ण स्वचालित यंत्र ओवेन का निर्माण हुआ; सन्‌ 1915 में ऊष्माप्रतिरोधक 'पाइरेक्स' काच का निर्माण हुआ, जो तप्त करके ठंडे पानी में डुबा देने पर भी नहीं तड़कता; सन्‌ 1928 में निरापद काच (सेफ़्टी ग्लास) का निर्माण हुआ जो चोट लगने पर चटख तो जाता है, परंतु उसके टुकड़े अलग होकर छटकते नहीं। यह मोटरकारों में लगाया जाता है; 1931 ई. में काच के धागों और वस्त्रों का निर्माण हुआ; सन्‌ 1902 में, संयुक्त राज्य अमरीका के पिट्सबर्ग नगर में और बेल्ज़ियम में 'लिबी ओवेंस' और 'फ़ूरकाल्ट' प्रणालियों द्वारा चद्दरी काचों का निर्माण होना आंरभ हुआ।

भारत में काच[संपादित करें]

प्राचीन भारत में भी महाभारत, यजुर्वेद संहिता, रामायण और योगवाशिष्ठ में काच शब्द का उपयोग कई जगह किया गया है। प्राचीन भारत में स्फटिक (Quartz) से बनी सामग्री, उत्तम वस्तु मानी जाती थी। भारत में कई प्रदेशों में प्राचीन काच के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। भारतीय काच का विवरण वास्तव में 16वीं शताब्दी से आरंभ होता है। उस समय यहाँ से अनिर्मित काच बहुत अधिक मात्रा में यूरोप और उत्तरी इटली को निर्यात किया जाता था; यहाँ तक कि काच निर्माण के लिए रासायनिक पदार्थ भी वेनिस भेजे जाते थे। 19वीं शताब्दी में भारत के प्रत्येक प्रांत में कांच की चूड़ियों, शीशियों और खिलौनों का निर्माण होता था।

आधुनिक भारतीय काच उद्योग सन्‌ 1870 से आरंभ हुआ और सन्‌ 1915 तक कितने ही काच के कारखाने खोले गए, पर वे सब असफल रहे। प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय काच उद्योग को खूब प्रोत्साहन मिला। परंतु युद्धोपरांत भारतीय बाजार काच के विदेशी माल से भर गया, फलस्वरूप कई भारतीय कारखाने बंद हो गए। काच उद्योग की जाँच और उन्नति के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक समिति का संगठन किया और उसकी संस्तुतियों को सरकार ने मान्यता दी। उसी समय से काच उद्योग में तीव्रता के साथ उन्नति हो रही है और अब भारत में काच की सब प्रकार की वस्तुओं का निर्माण आधुनिक ढंग से हो रहा है।

काच निर्माण की विधियों के विकास की समयरेखा[संपादित करें]

  • 1226 – "ब्रॉड शीट" (Broad Sheet) ससेक्स (Sussex) में सर्वप्रथम विकसित
  • 1330 – "Crown Glass" first produced in Rouen, France. "Broad Sheet" also produced. Both were also supplied for export
  • 1620 – "Blown Plate" first produced in London. Used for mirrors and coach plates.
  • 1678 – "Crown Glass" first produced in London. This process dominated until the 19th century
  • 1688 – "Polished Plate" first produced in France (cast then hand polished)
  • 1773 – "Polished Plate" adopted by English at Ravenshead. By 1800 a steam engine was used to carry out the grinding and polishing process
  • 1843 – An early form of "Float Glass" invented by Henry Bessemer, pouring glass onto liquid tin. Expensive and not a commercial success.
  • 1847 – "Rolled Plate" introduced by James Hartley. This allowed a ribbed finish. This type of glass was often used for extensive glass roofs such as within railway stations
  • 1888 – "Machine Rolled" glass introduced allowing patterns to be introduced
  • 1898 – "Wired Cast" glass invented by Pilkington for use where safety or security was an issue. This is commonly given the misnomer "Georgian Wired Glass" but greatly post-dates the Georgian era.
  • 1903 – "Machine Drawn Cylinder" technique invented in USA. Manufactured under licence in UK by Pilkington from 1910 until 1933.
  • 1913 – "Flat Drawn Sheet" technique developed in Belgium. First produced under licence in UK in 1919 in Kent
  • 1923 – "Polished Plate" first appeared in UK. Commonly used for large panes such as on shopfronts.
  • 1938 – "Polished Plate" process improved by Pilkington, incorporating a double grinding process to give an improved quality of finish
  • 1959 – "फ्लोट काच (Float Glass) यूके के बाजार में आया।