कलवार

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कलाल अर्थात्‌ शराब बनाने एवं बेचनेवाले। इनको कल्यपाल और कलवार भी कहा जाता है। इस प्रकार का व्यापार करनेवालों की प्राचीन काल में कोई विशेष जाति नहीं थी। वह समाज कर्मसिद्धांत पर आधारित था। किंतु कालांतर में जन्मना सिद्धांत के जोर पकड़ने के कारण एवं श्रमणों का भी भारतीय समाज पर प्रभाव होने के कारण क्रमश इनका भी एक वर्ग बना और ये हेय दृष्टि से देखे जाने लगे, अछूत तक समझे जाने लगे। कलाल अथवा कलवार का छुआ पानी पीने में आज भी कहीं-कहीं लोगों को आपत्ति होती है। समाज की इस छुआछुत की भावना के बीच इन लोगों के आत्मस्वातंत््रय की भावना दबने लगी थी। परिणामस्वरूप इस बिरादरी के कई विचारकों ने इससे त्राण पाने के हेतु प्रयास किया। क्षत्रिय होना सम्मानित समझा जाता था। फलत: कलवारों के इतिहास की खोज की जाने लगी और बिरादरी सभा उसके 'हैहय क्षत्रिय' होने के निष्कर्ष पर पहुँची। अत: उस सभा ने कलालों को क्षत्रिय घोषित किया।

कलालों को प्राचीन काल में 'शौंडिक' कहते थे। शैंडिक शुंडिक से बना है। शुंडिक मद्य चुआने के शुंडाकृतिक भबके को कहते हैं और भबके (घड़े) से मद्य चुआनवाले व्यक्ति को शौंडिक। शौंडिक के रूप में इनका उल्लेख रामायण, महाभारत, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों और पुराणों आदि में हुआ है। 'शूँडी', कलालों की एक उपजाति का नाम भी है। पाणिनि ने शौंडिक नामक आय का उल्लेख किया है। मद्य विभाग से प्राप्त आय का यह नाम था। कौटिलीय अर्थशास्त्र में उल्लेख है कि इस प्रकार का व्यापार करनेवाले व्यक्तियों को लाइसेंस दिया जाता था और उनसे दैवसिकमत्ययम्‌ (लाइसेंस फ़ीस) लिया जाता था।

मोनियर विलियम्स ने अपनी 'ए संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी' में शौंडिकों को संकर वर्ण कहा है। उन्होंने लिखा है कुछ लोगों के मतानुसार वे कैवर्त पिता और गांधिक माता की संतान थे; दूसरों के अनुसार वे निष्ठय पिता और शुद्रा माँ की संतान थे। मनुस्मृति उनका उल्लेख जातियों (संकर) में करती है, किंतु महामहोपाध्याय डॉ॰ गंगानाथ झा ने मनुस्मृति पर टिप्पणी लिखते हुए शौंडिकों को 'द्विज' कहा है। व्यावसायिक लाभ के लिए अनेक जाति के लोगों ने इस पेशे को स्वीकार किया होगा, क्योंकि कलालों में चालीस उपजातियाँ हैं; संभवत: इन्हीं-किन्हीं कारणों से पुरानी परिभाषा में इसको संकर कहा गया। सत्य क्या है, यह तो कहा नहीं जा सकता क्योंकि यह तो एक व्यवसाय का जिसकों लाभ की दृष्टि से संपूर्ण देश में किया जाता था। किंतु डॉ॰ मोनियर विलियम्स का यह कहना कि वे निष्ठय पिता और शूद्रा माँ की संतान थे, ठीक नहीं लगता। वैश्य भी 'द्विज' कहे गए हैं। पर, चूँकि वे शराब बनाने और बेचने का व्यवसाय करते थे, कालांतर में, श्रेमणविचारधारा से अनुप्राणित होने के कारण समाज की दृष्टि में वे हेय और अस्पृश्य समझे जाने लगे। शिक्षा दीक्षा से उनका संबंध टूट चला था। परिणामस्वरूप आज भी, कई राज्यों में उनको 'पिछड़े वर्ग' में गिना जाता है। भारतीय संविधान संविधान में भी उनका परिगणन 'अनुसूचित जातियों में हुआ है।

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