कलन

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कलन (Calculus) गणित का बहुत ही ख़ास क्षेत्र है, जो बीजगणित और अंकगणित से विकसित हुआ है।

कलन गणित की एक विशेष शाखा है जिसमें बीजगणित की छह मूल क्रियाओं-जोड़ना, घटाना इत्यादि-के अतिरिक्त सीमाक्रिया का प्रयोग विशेष रूप से होता है। इस क्रिया का प्रयोग 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ। इससे बीजगणित और ज्यामिति से भिन्न गणित की एक नवीन शाखा कलन का जन्म हुआ। वैसे तो अब भी सीमा की कल्पना बिल्कुल नई न थी, क्योंकि ज्यामिति में वृत्त का क्षेत्रफल उसके अंतर्लिखित बहुभुज की सीमा मानकर किया जाता था तथा बेलन और शंकु का घनफल समपार्श्व और सूचीस्तंभ की सीमा मानकर।

कलन दो भागों का आपसी मिलन है : समाकलन और अवकलन। दोनो भागों में एक ख़ास विषय रहता है : अनन्त और अतिसूक्ष्म राशियों की मदद से गणना करना।

समाकलन[संपादित करें]

समाकलन (Integral Calculus) यह एक विशेष प्रकार की योग क्रिया है जिसमें अति-सूक्ष्म मान वाली (किन्तु गिनती में अत्यधिक, अनन्त) संख्याओं को जोड़ा जाता है। किसी वक्र तथा x-अक्ष के बीच का क्षेत्रफल निकालने के लिये समाकलन का प्रयोग करना पडता है।

अवकलन[संपादित करें]

अवकलन (Differential Calculus) किसी राशि के किसी अन्य राशि के सापेक्ष तत्कालिक बदलाव के दर का अध्ययन करता है। इस दर को 'अवकलज' (en:Derivative) कहते हैं।

किसी फलन के किसी चर रासि के साथ बढ़ने की दर को मापता है। जैसे यदि कोई फलन y किसी चर रासि x पर निर्भर है और x का मान x1 से x2 करने पर y का मान y1 से y2 हो जाता है तो (y2-y1)/(x2-x1) को y का x के सन्दर्भ में अवकलज कहते हैं। इसे dy/dx से निरूपित किया जाता है। ध्यान रहे कि परिवर्तन (x2-x1) सूष्म से सूक्ष्मतम (tend to zero) होना चाहिये। इसी लिये सीमा (limit) का अवकलन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी वक्र (curve) का किसी बिन्दु पर प्रवणता (slope) जानने के लिये उस बिन्दु पर अवकलज की गणना करनी पड़ती है।

इतिहास[संपादित करें]

कैलकुलस के विकास में मुख्य योगदान लैब्नीज (Leibniz) और आइजक न्यूटन का है। किन्तु इसकी जड़े बहुत पुरानी हैं। भारत के केरल के महान गणितज्ञ माधव ने चौदहवीं शताब्दी में कैलकुलस के कई महत्वपूर्ण अवयवों की चर्चा की और इस प्रकार कैलकुलस की नींव रखी। उन्होने टेलर श्रेणी, अनन्त श्रेणियों का सन्निकटीकरण (infinite series approximations), अभिसरण (कन्वर्जेंस) का इन्टीग्रल टेस्ट, अवकलन का आरम्भिक रूप, अरैखिक समीकरणों के हल का पुनरावर्ती (इटरेटिव) हल, यह विचार कि किसी वक्र का क्षेत्रफल उसका समाकलन होता है, आदि विचार (संकल्पनाएं) उन्होने बहुत पहले लिख दिया। फर्मत तथा जापानी गणितज्ञ सेकी कोवा ने भी इसमें योगदान दिया।

आधारभूत संकल्पनाएं (concepts)[संपादित करें]

फलन, सीमा, सातत्य, श्रेणी का अनन्त तक योग, अत्यणु (infinitesimal) आदि संकल्पनाओं की समझ और विकास ने कैलकुलस को जन्म दिया।

कलन का मूलभूत प्रमेय[संपादित करें]

'समाकलन और अवकलन एक दूसरे के व्युत्क्रम क्रियायें हैं'। इस कथन की पुष्टि करने वाले दो प्रमेयों को कलन के मौलिक प्रमेय कहा जाता है। इन प्रमेयों की‌ खोज न्यूटन तथा लेइब्नित्ज़ ने की थी।

उपयोग[संपादित करें]

कैलकुलस का उपयोग सभी भौतिक विज्ञानों, इंजीनियरी, संगणक विज्ञान, सांख्यिकी, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्विज्ञान, एवं अन्यान्य क्षेत्रों में होता है। जहाँ भी किसी डिजाइन समस्या का गणितीय मॉडल बनाया जा सकता हो और इष्टतम (optimal) हल प्राप्त करना हो, कलन का उपयोग किया जाता है। कलन की सहायता से हम परिवर्तन के अनियत चर दरों (non-constant rates) को भी लेकर आसानी से आगे बढ़ पाते हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]