ओ. हेनरी

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विलियम सिडनी पोर्टर
William Sydney Porter.jpg
ओ हेनरी
जन्म: ११ सितंबर, १८६२
ग्रीन्सबरो, उत्तर केरोलाइना, अमेरिका
मृत्यु: ५ जून, १९१०
न्यूयॉर्क, अमेरिका
कार्यक्षेत्र: साहित्यकार
राष्ट्रीयता: अमरीकी
भाषा: अँग्रेज़ी

ओ. हेनरी या विलियम सिडनी पोर्टर (अंग्रेज़ी: William Sydney Porter) (11 सितंबर, 1862–5 जून, 1910) प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक थे। उनका जन्म 11 सितंबर, 1862 के दिन ग्रीन्सबरो, उत्तर केरोलाइना में हुआ और म्रत्यु 5 जून, 1910 को न्यू यार्क में। पिछले वर्षों में वह अपना बीच का नाम 'सिडनी' ही लिखा करते थे।

जीवन[संपादित करें]

सोलह वर्ष की उम्र में उन्होने स्कूल छोड़ दिया, पर उनकी पढ़ने-लिखने की आतुरता नहीं छूटी। बचपन में उन्होने ग्रीन्सबरो की एक दवाइयों की दुकान में काम किया था, जहां अब तक उसकी जयन्ती मनायी जाती है। उन्नीस वर्ष की अवस्था में वह अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए टेक्सास प्रदेश के गोचरों में रहने चला गया। वहां उसने घुड़सवारी सीख ली और जंगली, अड़ियल घोड़ो को भी वश में करने लगा। फ़िर ऑस्टिन में उसे एक खेती-बाड़ी के दफ़्तर में नौकरी मिल गयी।

आपने आस-पास के चित्रमय जीवन की जिन वस्तुओं का भी उसे परिचय हुआ, वे सब की सब उसकी कहानियों में छन आयीं। यही कारण है कि उसकी कहानियां अधिकतर चरागाहों के प्रदेश, मध्य अमरीका या न्यूयार्क में घटित होती है। शहरी जीवन की कहानियों में जिनके लिए वह प्रसिद्ध है, जीवन की विडम्बनाओं कीस्वीक्रति हैं। वे उनके अपने कटु अनुभवों के प्रतिबिम्ब हैं।

अपने पन्द्रह वर्ष के जिस टेक्सास प्रवास में उन्होने विवाह किया और एक पुत्री के पिता बने, उसी में खेदजनक घटानाओं ने उनकी उमंगो को ढंक लिया। उन्हे किसी बैंक में नोट गिनने का काम मिल गया, लेकिन कुछ ही दिनों में उसके हिसाब में कुछ हजारेक डालर की गड़बड़ का पता चलने पर, वह नौकरी भी छूट गई। ऎसा लगता है कि उसके मालिक उसे सजा दिलाना नहीं चाहते थे, इसलिए वह बिना रोक-टोक,लगभग एक वर्ष तक ह्युस्टन शहर के एक अखबार में काम करता रहा। तब, शायद गिरफ़्तारी से बचने के लिए वह न्यू ओर्लियन्स चले गए, जहां से उन्होने टूजिलो और होण्डूरास का टिकट कटा लिया। 'केबेजस एण्ड किंग्स' नामक उसकी सर्वप्रथम पुस्तक में वर्णित, साहस और जीवट की सारी कहानियों का घटनास्थल यहीं से मिला है। अपनी पत्नी की बीमारी ने उन्हे वापिस ऑस्टिन बुला लिया। उनके लौटते ही वह मर गयी। तब खयानत के अपराध में उनपर मुकदमा चला और सजा हो गयी।

उपनाम की खोज[संपादित करें]

विलियम पोर्टर, तीन वर्ष और तीन महीनों तक जेल में रहे। वह अपनी सजा को उत्साहपूर्वक झेलने वाला एक सदाचारी कैदी थे। लेकिन उसके जीवन पर इस काल की काली छाया हमेशा दिखाई पड़ती रही। यहीं से उनमें गरीबों के प्रति दया भाव उत्पन्न हुआ और यही से उसकी कई श्रेष्ठ कहानियों का जन्म हुआ,जिनमें से 'ह्रदय परिवर्तन' नामक कहानी के आधार पर खेला गया 'उर्फ़ जिम्मी बैलण्टाइन' नामक नाटक, उस समय का सर्वश्रेष्ठ नाटक सिद्ध हुआ। जेल केसिपाहियों के ओरन हेनरी नामक कप्तान ने ही उसके उपनाम को खोज निकाला गया है। पोर्टर ने सोचा कि हस्ताक्षर करने के लिए 'ओ० हेनरी' ही काफ़ी है।उन्होने जब लिखना शुरू किया तो सम्पादकों से अपना नाम गुप्त रखने की भी प्रार्थना की।

लिखने का अंदाज[संपादित करें]

न्यूयार्क में ओ० हेनरी, मैडिसन चौक और इरविंग प्लैस के मुहल्लों के कमरों में रहते और अपनी कहानियों से पैसा कमा-कमा कर किराया चुकाने के लिए भीषण संघर्ष करते रहते। राबर्ट एच० डेविस, बार्टलेट मारिस, इरविन एस० काब आदि मित्रों ने और दूसरे कई लिखकों और सम्पादकों ने उनके कमरों का वर्णन किया है। वे एक बाहर वाले कमरे में रहता थे। जिसकी खिड़कियां फ़र्श तक फ़ैली हुई थीं,। यहां बैठकर वह राहगीरों की ओर घूरते रहते और उनके इर्द-गिर्द जीवट के जाल बुनते रहते। उनहोने आशावादी, एकांकी सामान्य व्यक्तियों को अपनी कहानियों के पात्र बनाना शुरू किया। उन लड़कियों की कल्पना की, जो धंधा और प्यार पाने के लिए , शहरों में भटकने आती हैं; वे युवक, जो दूसरों से अधिक लाभ खोजते हैं और वे शराबी तथा अयोग्य आदमी, जो दुर्भाग्य को भी अहंकार से झेलते हैं तथा कभी-कभी कहानियों के पात्रों की तरह भावुकता प्रदर्शित करते हैं, उसके कथानायक बने।

यदि कथावस्तु दुखान्त हुई तो ओ० हेनरी उसमें स्थानीय बोलियों का नमक-मिर्च लगा देता। उसके लिए कोई घटना इतनी नीरस नहीं थी कि जिसमें वह चमक न पैदा कर सके। ठीक इसी जगह आकर उसने उस चरम बिन्दु या मोड़ का आविष्कार किया, जिससे उसकी अनेक कहानियों का अन्त अप्रत्याशित बनने लगा। "सजा हुआ कमरा,""छत पर का कमरा" और "वासन्ती मेनू" जैसी छोटी कहानियों में तो यह स्पष्ट है ही, कुछ बड़ी कहानियों में भी इस तत्व के दर्शन होते हैं। अमरीका के श्रोताओ मे, पुराने जमाने के आग के चारो ओर बैठकर कहानियां सुनने के युग से, इस प्रकार के किस्सों के प्रति विशेष लगाव रहा है। ओ० हेनरी की कहानियां इन्हीं परम्परागत कथाओं की विस्त्रत प्रतिक्रतियां मालूम देती है। कथानक के तो वह जादूगर थे और ऎसी-ऎसी कल्पनारम्य परिस्थितियां निर्माण करनें में वह सिद्धहस्त थे, जहां उसके पात्र जीवन जीते नहीं बल्कि उससे खिलवाड़ करते प्रतीत होते है। पाठको का मनोरंजन करना उसका ध्येय था और उनकी कौतूहलव्रत्ति को जगाते रखने के लिए, उनहोने अपनेपात्रों से तरह-तरह के तमाशे करवाये हैं। वे रोमांस के भूखे, बुरे वक्त का हिम्मत से मुकाबला करने वाले, कुलीनता का ढोंग करने वाले और आधुनिक 'अलिफ़-लैला' की रंगीन दुनिया में विचरने वाले चित्रित किए गये हैं।

मनुष्य का सर्वस्पर्शी और सागोपांग विश्लेषण उन्होने शायद ही कहीं किया हो। उन्होने तो मनुष्य का, आधुनिक शहरी जीवन के भंवर मे फ़से हुए, असहाय व्यक्ति के रूप मे ही, दर्शन कराया। 'स्नेह दीप' कहानी की नान्सी को सिर्फ़ एक दुकान में काम करने के कारण, एक दुकानदार लड़की मानने से वह इन्कार कर देता है और कहता है," ऎसी कोई किस्म नहीं होती। आज के भ्रष्ट समाज को किस्म खोजने की आदत पड़ गयी है।" उसने मनुष्य को इतना गिरा हुआ शायद हीचित्रित किया हो कि वह अपनी कमजोरियों के लिए शर्मिंदा भी न हो। उसकी सब कहानियों के नीचे सह्रदयता और सहानुभुति की अन्तर्धारा बह रही है। जीवनमें भूले-भटके या पिछड़े हुए हर बदनसीब को वह मनुष्यता के व्यापक कुटुम्ब में स्थान देने को सदा तत्पर रहा। कभी-कभी वे उसका मनोरंजन करते हैं, कभीअपने जीवन की विडम्बनाओं से उसे दुखी कर देते है और कभी वह भावुक भी हो उठता अहि परन्तु हर हालत में, वह भाग्य की हर छेड़छाड़ को स्वीकार कर लेतेहै और उसके खलनायक भी हास्यास्पद ही हो पाते हैं- दुष्ट नहीं।

ओ० हेनरी की कला, उसकी दूसरी किताब 'द फ़ोर मिलियन' में निखर उठी, जिससे उसे काफ़ी लोकप्रियता भी मिली। प्रथम बार प्रकाशित होने के चालीस वर्ष बाद, उसकी 'उपहार' नामक कहानी का चलचित्र बना। उसकी अन्य कहानियों के कई संकलन प्रकाशित हुए जैसे 'स्नेह दीप' (१९०७), 'पश्चिम की आत्मा' (१९०७), 'शहर की आवाज' (१९०८),'भाग्यचक्र' (१९०९),'विकल्प' (१९०९),'धन्धे की बात' (१९१०),' जीवन चक्र' (१९१०)। उसकी म्रत्यु के बाद तीन किताबें और छपीं- 'सफ़ेदपोश ठग', 'आवारा' और 'भूले-भटके'।

कहानियाँ[संपादित करें]

ओ०हेनरी की कहानियां उसके जीवनकाल में अत्यन्न प्रसिद्ध रहीं और यह भी कहा जा सकता है कि अपनी रचनाओं और अपनी विचारधारा, दोनों में मनुष्यस्वभाव की नुमाइश व्रत्ति के प्रति असन्तोष प्रदर्शित करते हुए उसने ह्रदय की गहराइयों में उतरने की कोशिश की। वह मनुष्य के सच्चे रूप को छिपाने वाले, रूढ़ि और विश्वास के हर पर्दे को चीर कर सत्य के दर्शन कराना चाहते थे। वह कहा करते थे कि सत्य की सच्ची अनुभूति केवल कथासाहित्य में ही हो सकती है। अपने निजी अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहुंच कर, ओ० हेनरी ने विद्वानों के इस वि़श्वास को फ़िर से स्थापित कर दिया कि ऎतिहासिक तथ्य की अपेक्षा, कल्पना ही सौन्दर्य का अधिक प्रभावशाली आविष्कार करती है।

पेशेवर कहानीकारों द्वारा भी कहानी-कला में परिवर्तन किया जा रहा था। मनुष्य के बर्ताव को प्रभावित करने वाले हर हेतु के मूल, मानसिक और शारीरिक कमियों में ढुंढ़े जाने लगे थे और व्यक्ति के जीवन पर सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन किया जाने लगा था। यदि जीवित रहता तो ओ- हेनरी कहां पहुंचते- यह कहना कठिन है, पर उसका योगदान काफ़ी होता।

आज ओ० हेनरी की कहानियां, उसके युग के प्रतीक के रूप में ही पढ़ी जाती है। जिस प्रकार ब्रेट हार्ट की कथाएं, पश्चिमी सीमाप्रदेश के खान के मजदूरों, जुआरियों और ठेकेदारों को पुनर्जीवित कर देती हैं, उसी प्रकार ओ० हेनरी की कहानियां सन १९०० के आस-पास की दुनिया खड़ी कर देती है। जब उसने घुड़सवारों का मजाक उड़ाया, तब स्पेन की लड़ाई के घुड़सवारों की याद जाता थी।

अमरीकनों को मध्य अमरीका के छोटे-छोटे राज्य, उतने ही विचित्र लगते हैं, जितना कि उसकी कहानी में वर्णित अच्चूरिया! स्वभाव से वह संकोची और मितभाषी था। अपने कुछ घनिष्ट मित्रों- जो मुख्यत: अखबारों के सम्पादक थे- की सोहबत और जरा सी शराब उसे प्रिय थी। उसे हमेशा समय की कमी रहती थी, क्योंकि उसकी कहानियां अत्यन्त छोटी होती थी और उनके बदलें में उसे जो कुछ मिलता, तुरन्त समाप्त हो जाता था। सम्पादकों की निरन्तर मांग के नीचे वह पिसता रहा। उसके लिए जीवन एक अस्त-व्यस्त व्यापार था, जिसमें पुरस्कार मिलने का ढंग बड़ा सनकी है। फ़िर भी उसने, इस व्यवहार ही हर घूप-छांव का स्वागत मुस्कारा कर किया। उसकी कहानियों में भाग्य और संयोग, महत्वपूर्ण पार्ट अदा करते है। दु:ख और पीड़ा भी पर्याप्त मात्रा में है, परन्तु कड़वाहट कहीं नहीं घुसने पायी है। ४७ वर्ष की छोटी-सी आयु में नियति ने जब उसकी इहलीला समाप्त कर दी, तब तक उसकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं तो शायद लिखी नहीं गयीं थी, परन्तु उसने जो कुछ भी लिखा, उसकी कथासाहित्य पर अमिट छाप रहेगी और उसकी कुछ कहानियां तो अमर रहेगी।

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

यह भी देखे[संपादित करें]