ओरंगउटान
| ओरांगूटान | ||||||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
बोर्नियो का ओरांगूटान
|
||||||||||||||
| वैज्ञानिक वर्गीकरण | ||||||||||||||
|
||||||||||||||
| प्रजाति प्रकार | ||||||||||||||
| पौंगो बोर्नियो बर्नार्ड, १७९९ |
||||||||||||||
ओरांगूटान की दोनों जातियों का आवास क्षेत्र
|
||||||||||||||
| जाति | ||||||||||||||
| पर्याय | ||||||||||||||
|
फ़ौनस ओकन, १८१६ |
||||||||||||||
ओरंगउटान एशिया में वर्तमान युग में पाया जाने वाला अकेला महाकपि (बड़े अकार का मानवनुमा कपि) है। यह सभी वृक्षवासी जानवरों में आकार में सबसे बड़े हैं और इनकी भुजाएँ सभी अन्य महाकपियों से (जैसे की चिम्पान्ज़ी, मनुष्य, गोरीला) लम्बी होती हैं। यह काफ़ी बुद्धिमान होते हैं और भिन्न प्रकार के औज़ार इस्तेमाल करते हैं। हर रात को यह डंडियों और पत्तों से अपने लिए एक शय्या-सी भी तैयार करते हैं। जहाँ अन्य महाकपियों के बाल ख़ाकी या काले होते हैं, वहाँ ओरंगउटानों के बाल लाल-से रंग के होते हैं।
ओरंगउटान इंडोनीशिया और मलेयशिया के जंगलों में पाए जाते हैं। इनकी दो उपजातियाँ हैं - बोर्नियाई ओरंगउटान (वैज्ञानिक नाम: पोंगो पिग्मेयस, Pongo pygmaeus) और सुमात्राई ओरंगउटान (वैज्ञानिक नाम: पोंगो ऐबेलाए, Pongo abelii)। सुमात्राई ओरंगउटान अब बहुत कम बचे हैं और इनकी नस्ल लुप्त होने का बड़ा ख़तरा है। ओरंगउटान की और भी जातियाँ हुआ करती थीं लेकिन वे अब ख़त्म हो चुकी हैं, जिन में से एक शिवापिथेकस नामक नस्ल भारत की शिवालिक पहाड़ियों में वास करती थी। ओरंगउटान शब्द मलय भाषा से आया है और इसका अर्थ है वनमानुष (ओरंग का अर्थ "मनुष्य" और हुतन का अर्थ "जंगल" होता है)।
आयु [संपादित करें]
ओरंगउटान चिड़ियाघरों में 60 साल तक जीते हैं और माना जाता है के जंगलों में स्वतन्त्र रूप से यह लगभग 35 वर्षों तक जीते होंगे, हालांकि इसका पक्का अनुमान अभी तक नहीं लगाया गया है।[1]
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
सन्दर्भ [संपादित करें]
- ↑ "Primates: Orangutans - National Zoo| FONZ". Nationalzoo.si.edu. http://nationalzoo.si.edu/Animals/Primates/Facts/FactSheets/Orangutans/default.cfm. अभिगमन तिथि: 2011-01-27.