ओडेसी

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ओडेसी का प्राचीन ज़ूनानी निदर्श चित्र

ओडेसी (प्राच. यून. Ὀδυσσεία Odusseia) — इलियाड के बाद द्वितीय महा काव्य है, जिसके रचयिता प्राचीन यूनानी कवि होमर को माना जाता है।

ओडेसी ई.पू. आठवीं शताब्दी में लिखी गयी है। यह कहाँ लिखी गई इस संबंध में माना जाता है कि यह इस समय के यूनान अधिकृत में सागर तट आयोनिया में लिखी गई जो अब टर्की का भाग है।[1] इसमें ओडेस या उलीस नाम के एक पौराणिक नायक के ट्रॉय के युद्ध के बाद मातृभूमि वापस लौटते समय घटने वाले साहसपूर्ण कार्यों की गाथा कही गयी है। जिस प्रकार हिंदू रामायण में लंका विजय की कहानी पढ़कर आनंदित होते हैं। उसी प्रकार ओडिसी में यूनान वीर यूलीसिस की कथा का वर्णन आनंदमय है। ट्राय का राजकुमार स्पार्टा की रानी हेलेन का अपहरण कर ट्राय नगर ले गया। इस अपमान का बदला लेने के लिए यूनान के सभी राजाओं और वीरों ने मिलकर ट्राय पर आक्रमण किया। पर न नगर का फाटक टूटा और न प्राचीर ही लॉंघी जा सकी। अंत में यूनानी सेना ने एक चाल चली। एक लकड़ी का खोखला घोड़ा पहिएयुक्‍त पटले पर जड़ा गया। उसे छोड़ वे अपने जहाजों से वापस लौट गए। ट्रॉय के लोगों ने सोचा कि यूनानी अपने देवता की मूर्ति छोड़कर निराश हो चले गए। वे उसे खींचकर नगर में लाए तो मुख्‍यद्वार के मेहराब को कुछ काटना पड़ा। रात्रि को जब ट्रॉय खुशियॉँ मना रहा था, खोखली अश्‍व मूर्ति से यूनानी सैनिकों ने निकलकर चुपचाप ट्रॉय का फाटक खोल दिया। ग्रीक सेना, जो वापस नहीं गई थी बल्कि पास में जाकर छिप गई थी, ट्रॉय में घुस गई।[2] एक हेलेन के पीछे ट्रॉय नष्‍ट हो गया ठीक वैसे ही जैसे सीता के पीछे रावण की स्‍वर्णमयी लंका नष्‍ट हुई थी। इसी से अंग्रेजी में ‘द ट्रॉजन हॉर्स’ का मुहावरा बना। ‘ओडेसी’ मनीषी ग्रीक कप्‍तान ओडेसस की साहसिक वापसी यात्रा की गाथा है। ट्राय से लौटते समय उनका जहाज तूफान में फस गया। वह बहुत दिनों तक इधर उधर भटकता रहा। इसके बाद अपने देश लौटा।

ओडेसी नामक महाकाव्य में ओडेस नामक योद्धा अपने साहसिक कार्यों को लोक कथा के तत्वों से रंजित कर अलकिनोय महाराजा द्वारा आयोजित प्रीतिभोज के अवसर पर सुनाता है।


अनुक्रम

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ओडेसी

मंगलाचरण - हे देवी, तू उस कुशल मानव ओडेसियस की कथ

गाने की शक्ति दे जिसने ट्राय के दुर्ग को धराशायी कर दिया और जो सारे संसार में भटकता रहा,

जिसने विविध जातियों और नगरों को देखा तथा उत्ताल समुद्र की लहरों पर प्राणों की रक्षा के लिए घोर कष्ट सहन किया।

सर्ग 1 - (ट्राय युद्ध के बाद दस वर्षों तक योद्धा ओडेसियस वरुण के क्रोध के कारण कष्ट भोगता एवं भटकता रहा। इस कष्टमय काल के अन्तिम भाग में कथा प्रारम्भ होती है।) स्वर्गसभा में एथनी द्वारा ज़ीयस से प्रार्थना-ज़ीयस का एथनी को ओडेसियस के पुत्र टेल्मेकस के पास एवं टर्मीज को अप्सरा कैलीप्सो के पास भेजना जिसने ओडेयिसस को प्रेमी के रूप में अपने द्वीप में बन्दी कर लिया है -ओडेसियस अकेले हैं और उसके साथी समुद्र में डूबकर मर चुके हैं और उसे अभी दुःख भोगना बदा है -इधर उसकी पत्नी पिनीलोपी ग्रीक कुमारों द्वारा तंग की जा रही है एवं वे ओडेसियस की सम्पत्ति को मौज से उड़ा रहे हैं एवं उसकी पत्नी के प्रति अपना प्रणय-निवेदन कर रहे हैं - टेल्मेकस शिशु है एवं पिनीलोपी अबला नारी-एथनी इथैका (ओडेसियस का नगर) जाती है एवं टेल्मेकस को गुप्तरूप से ग्रीक नायकों के पास जाकर पिता का पता पूछने को कहती है।

सर्ग 2 - इथैका के नागरिकों द्वारा प्रणय-प्रार्थी कुमारों से अपने-अपने घर जाने का अनुरोध -उत्तेजना एवं सभा भंग - ओडेसियस के एक मित्र मेण्टर का रूप धारण करके एथनी का टेल्मेकस के साथ गुप्त यात्रा पर प्रस्थान - यात्रा का पता एक वृद्धा धाय को छोड़कर अन्य किसी को नहीं।

सर्ग 3 - टेल्मेकस की वृद्ध नेस्टर से भेंट - परन्तु ओडेसियस के बारे में वहाँ से कुछ ज्ञात नहीं हो सका।

सर्ग 4 - टेल्मेकस की मिनीलास एवं हेलेन से भेंट - सुखी दम्पती - इधर इथैका में दुष्ट ग्रीक कुमार टेल्मेकस की यात्रा का पता पाकर उसकी हत्या के लिए एक दस्यु-पोत भेजते हैं।

सर्ग 5 - एथनी द्वारा प्रार्थित होने पर ज़ीयस का अपने दूत हर्मीस को कैलीप्सो अप्सरा के पास भेजना कि वह ओडेसियस को प्रेम बन्धन से मुक्त करे - कैलीप्सो की व्यथा, तथा भारी मन से ओडेसियस की यात्रा का प्रसाधन - ओडेसियस उत्ताल समुद्र पर-वरुण की वक्रदृष्टि एवं पुराना क्रोध अब भी प्रखर - ओडेसियस का पोत-भग्न - मृत्यून्मुख पोत एवं लहरों से संघर्ष - ओडेसियस कूदकर लहरों पर-बहते-बहते अर्धचेतन अवस्था में तट पर जा लगता है।

सर्ग 6 - तटदेश की राजकुमारी ‘नासिका’ अपनी सखियों के साथ समुद्रतट पर वस्त्र धोने आयी है। ओडेसियस की चेतना वापस एवं उक्त सुन्दरी बाला का दर्शन - वह सौन्दर्य से पराभूत होकर उसे कोई स्नेहमयी देवी मान बैठता है - नासिका द्वारा ओडेसियस तट के नगर में आता है।

सर्ग 7-8 - उक्त देश के राजा द्वारा ओडेसियस का स्वागत-दूसरे दिन उत्सव में राजसभा के अन्दर चारण द्वारा अफ्रोदीती एवं आर्स के परकीया प्रेम एवं ट्राय-पतन की कथाओं का गान - ओडेसियस को अपने साथियों की याद आ गयी एवं उसकी आँखों से आँसू झरने लगे - कारण पूछने पर ओडेसियस अपना वास्तविक परिचय देता है एवं अपने दुःख की कथा सुनाता है।

सर्ग 9 - ओडेसियस ने कहा -

जब ट्राय युद्ध समाप्त हुआ तब गृहागमन के रास्ते में हमने सिकोनीजों पर आक्रमण किया,
पराजित हुए। नौ दिन नौ रात लगातार उत्तरी हवा के धक्के से हमारे रण-पोत रास्ते स

े बहुत दूर भटक गये। अन्त में हम लोटसों के देश में पहुँचे - यह लोटस एक मधुर वनस्पति है जिसके खाने से हमारे नाविक घोर प्रमाद में निमग्न हो गये। जबरदस्ती उन्हें घसीटकर पोत पर लाया गया। फिर आगे चलकर हम एक नयनवाले राक्षसों के देश में पहुँचे और अपनी मूर्खता से एक राक्षस की गुफा में कैद हो गये। फिर चतुरता से उसे शराब पिलाकर उसकी आँख बड़े कुन्दे से फोड़ दी एवं सवेरे राक्षस ने जब गुफाद्वार

अपनी भेड़ों को बाहर निकलने के लिए खोला तब एक-एक भेड़ के साथ अपने को बाँधकर हम निकल गये।
यह राक्षस समुद्र एवं भूकम्प के अधिपति वरुण (पोजीदून) का पुत्र था। इसी से वरुण हम पर क्रुद्ध हो गये।

सर्ग 10 - फिर यात्रा का प्रारम्भ-इयोलियन द्वीप के निवासियों द्वारा आतिथ्य-लास्ट्रेजियन (असुराकार) मानवों के देश में - वहाँ से पलायन के बाद सूर्यदेवता एवं समुद्र-कन्या से उत्पन्न अप्सरा सर्सी के काम - द्वीप में - तटवर्ती वन में सर्सी का प्रमद वन एवं सम्मोहन-प्रासाद, जिसमें अनेक योद्धा और राजकुमार, जो भटकते हुए आये, पशुरूप में परिवर्तित करके सर्सी ने अपनी वासना-पूर्ति के लिए कैद कर रखा है - परन्तु हर्मीज द्वारा मुझे यह भेद ज्ञात था एवं इस देवता द्वारा प्रदत्त जड़ी के कारण सम्मोहन से मुक्ति बनी रही - मेरी धमकी से सर्सी ने मेरे शूरों को उक्त सम्मोहन से मुक्त कर दिया -सर्सी के साथ एक वर्ष तक सुखभोग - सर्सी ने अन्त में भरे हृदय से मुझे एवं मेरे सैनिकों को विदा प्रदान की - पाथेय देकर उसने सारे मार्ग के बारे में मुझे निर्देश दिया : मैं यमलोक (पाताल, हेडीज़) जाऊँ और वहाँ टाइरेसिया (भविष्यदर्शी) से अपना भविष्य एवं लौटने का मार्ग पूछूँ। पहले मैं सीधे दक्षिण को प्रस्थान करूँ। जाते-जाते मुझे अति भयंकर पर्वत-यात्रा के बाद पर्सीफोन का निकुंज मिलेगा - वहाँ से आगे यमलोक है जहाँ से मानवों में हेराक्लीज़ को छोड़ अन्य कोई नहीं लौट सका। आगे चलकर ज्वलन्त अग्नि की नदी एवं आँसुओं की नदी का संगम है। वहाँ मैं टाइरिया को, बाद में अन्य मृतात्माओं को भेड़े के रक्त का अर्घ्य प्रदान करूँ एवं अपने मार्ग की जानकारी प्राप्त करूँ - इतनी बातें उस सर्सी ने कहीं। सारी बात सुनकर मेरे नाविकों का दिल ही बैठ गया। भय से उनका मुख श्वेत हो गया। मेरे समझाने से उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की।

सर्ग 11 - मैं मृतात्माओं के देश में पहुँचा और वहाँ टाइरेसिया को मेष-रक्त का अर्घ्य प्रदान कर मार्ग की रूप-रेखा एवं विविध खतरों को ज्ञात किया। उसने थ्रिनेसी द्वीप में चरनेवाली सूर्य की गायों को न छूने की चेतावनी विशेष रूप से दी। मेरी मृत माता, मेरे साथ ट्राय के मैदान में लड़नेवाले योद्धाओं एवं प्राचीन पुरुषों की छायामयी आत्माएँ मेरे सम्मुख आयीं। अगामेनन ने बताया कि किस प्रकार वह अपनी पत्नी क्लाइटेम्नस्त्रा के द्वारा, जो उसकी अनुपस्थिति में जार रखे हुए थी, अपनी पुत्री की बलि का प्रतिशोध लेने के लिए, कत्ल कर दिया गया। अयेज़ की आत्मा अपने क्रोध को अभी भी भूल नहीं सकी थी। उसने मौन मुँह को फेर लिया। एकिलेस की मृत्यु के बाद उसका कवच हमें दिया गया और शूर अयेज़ ने इसे अपना अपमान समझकर क्रोध में आत्मघात कर लिया था। एकिलीज ने जो एड़ी में पेरिस के रूप में अपोलो द्वारा सन्धानित बाण के लगने से मरा था (क्योंकि उसका शेष शरीर तो अभेद्य था) मुझसे युद्ध का शेष हाल पूछा। मैंने बताया कि उसके मरने पर छल द्वारा हमने ट्राय को नष्ट किया। समुद्रतट पर हमने काठ की विशाल अश्वमूर्ति, जिसमें मैं चुने योद्धाओं के साथ छिपा था, छोड़ दी और जलपोतों को हटाकर लौट जाने का स्वाँग किया। मूर्ख ट्रोजन क्रीड़ा के हेतु उक्त अश्व को खींचकर अपने नगर के भीतर ले गये तथा आमोद-प्रमोद से थककर गहरी निद्रा में सो गये। उस भयंकर रात्रि में हमने अश्व से निकलकर नगर का फाटक खोल दिया। हमारे जलपोत तब तक लौट आये थे। हमने सोते हुए शत्रुओं का क्रूरतापूर्वक संहार कर ट्राय का ध्वंस कर डाला। एकिलीज यह सुनकर प्रसन्न हुआ कि उसके पुत्र पिर्रस ने वृद्ध प्रायम एवं ट्रोजनों का क्रूरतापूर्वक संहार किया।

सर्ग 12 - ‘टाइरेसिया के बताये मार्ग के अनुसार फिर हमने यात्रा प्रारम्भ की। फिर वहाँ से लौटकर हम सर्सी के पास आये। उक्त अप्सरा ने हमारी आगे की यात्रा के बारे में हमें कुछ बताया। उसके बताने के अनुसार हमारा जलपोत प्रथमतः जल-कन्याओं के द्वीप के पास से गुजरा। ये जल-कन्याएँ समुद्र के अन्दर निकली चट्टानों पर बैठकर अति मोहक संगीत गाती हैं और नाविक उस संगीत पर मुग्ध होकर उनकी ओर खिंचे आते हैं, पर रास्ते में जलगर्भ की चट्टानों से टकरा उनके जहाज जल-समाधि ले लेते हैं और वे इन सुन्दरी छलनाओं के फेर में अपना प्राण गँवा बैठते हैं। मैंने पहले से ही अपने को जहाज के मस्तूल से कसकर बँधवा दिया था एवं नाविकों के कानों में मोम भर दिया था। मैं सुर की चोट खाकर जल में कूदने के लिए बेचैन हो उठा पर शरीर तो बँधा था। इस खतरे को इस प्रकार पार करके दूसरे खतरे पर पहुँचे जिसे ‘सिला और चैरिब्डिस का जलपथ’ कहते हैं। दूर से षट्मुखी सरमा राक्षसी सिला की हल्की-हल्की भूँक सुनाई पड़ी। पास ही में चैरिब्डिस का पातालगामी भयंकर खौलता हुआ जल-आवर्त्त था, दूसरी ओर दोनों के बीच में अति संकीर्ण मार्ग था। चूँकि इस समय जलावर्त्त पातालगामी था, अतः हमने, अपनी नौकाओं को दूसरे किनारे के समीप से ले जाना उचित समझा। हमारी नौकाएँ तीर की तरह चलीं, फिर भी अपनी कन्दरा से सिर निकालकर उस आसुरी कुतिया ने मेरे छः साथियों को दबोच लिया-उनकी दर्द भरी कराह अब भी मेरे कानों में गूँजती है, जब वह उन्हें चबा रही थी। आज तक कोई यहाँ से जाकर लौटा नहीं। फिर हम सूर्य के द्वीप में पहुँचे जहाँ देवता की पवित्र गायें चर रही थीं। वहाँ दुर्भाग्यवश दक्षिणी हवा ने महीनों हमें रोक दिया और भूख से पीड़ित होकर कुछ साथियों ने उनमें से कुछ गायों का भक्षण किया। सूर्य देवता अत्यन्त क्रुद्ध हुए, और देवराज को धमकी दी कि हम सुफला श्यामला धरती एवं स्वर्ग को प्रकाशित न करके पाताल-गर्भ में जाकर रहने लगेंगे। देवराज ज़ीयस ने उनकी तुष्टि के लिए समुद्र में हम पर वज्रपात किया एवं हमारे सारे नाविक एवं जलपोत जलमग्न हो गये। मैं अकेला बहता-बहता लहरों के धक्के खाने लगा। सवेरा हुआ तो देखता हूँ कि फिर उसी सिला-चैरिब्डिस के मुँह पर हूँ। मेरे प्राण सूख गये। चैरिब्डिस की ओर बढ़ा। सौभाग्यवश एक अंजीर के पेड़ की शाखा पकड़ में आ गयी। मैं शाखा से चिपका रहा और मेरे हाथ का मस्तूल, जिसके सहारे तैर रहा था, चक्कर खाकर पाताल में चला गया-कुछ समय बाद पाताल से पानी ऊपर आने लगा। प्रत्यावर्तन के रूप में और मेरा मस्तूल भी ऊपर आ गया। मस्तूल को पकड़कर पानी की उछाल के साथ मैं भी ऊपर उठा और उस ऊर्ध्व आवर्त्त के एक धक्के ने मुझे इसकी परिधि के बाहर फेंक दिया। फिर बहता-बहता एक सुन्दर रूपवाली डायन केलीप्सो अप्सरा के द्वीप के पास लगा। वहाँ कुछ काल रहने पर देवताओं के आदेश से उक्त डायन द्वारा मुझे मुक्ति मिली। मैं बेड़ा बनाकर समुद्र में चला। परन्तु वरुण क्रुद्ध था, अतः बेड़ा टूट गया। मैं बहते-बहते अर्ध-चेतन अवस्था में इस तट पर आ लगा।’

सर्ग 13 - ओडेसियस की कथा को सुनकर उक्त आतिथेय राजा द्वारा उसकी यात्रा का प्रबन्ध - ओडेसियस अपने देश को इतने दिनों बाद देखकर भी पहचान नहीं पाया - एथनी द्वारा सलाह एवं सहायता।

सर्ग 14-18 - ओडेसियस प्रथम अपने पशुपाल की झोंपड़ी में रात भर अपने को अजनबी बताकर रहा - इसी समय मिनीलास के यहाँ से उसका पुत्र टेल्मेकस भी लौटता है - तीनों में पहचान एवं तीनों द्वारा स्थिति पर विचार एवं दुष्ट ग्रीक कुमारों की हत्या की योजना - सवेरे ओडेसियस का भिखारी के रूप में अपने राजमहल में प्रवेश।

सर्ग 19-20 - बूढ़ी धाय ओडेसियस को पहचान जाती है - ओडेसियस का उसे चुप रहने का कड़ा आदेश - पिनीलोपी को भी कुछ ज्ञात नहीं - दुष्ट कुमारों के उत्पात एवं उनके द्वारा ओडेसियस का अपमान।

सर्ग 21 - एथनी द्वारा पिनीलोपी को स्वयंवर का सुझाव - ओडेसियस का विशाल धनुष जो चढ़ा सकेगा, उसी का वह वरण करेगी - इस सुझाव को सुनकर अनेक कुमारों द्वारा धनुष चढ़ाने की चेष्टा, परन्तु सभी असफल - ओडेसियस द्वारा भिखारी के रूप में सारी घटना का पर्यवेक्षण एवं धनुष की माँग - कुमारों ने तिरस्कारपूर्वक मजाक समझकर धनुष दे दिया - ओडेसियस ने अपने पुत्र को संकेत दिया।

सर्ग 22 - कपाट बन्द-कुमारों के शस्त्र टेल्मेकस ने पहले से ही शान्ति भंग की आशंका का बहाना करके, हटा लिये थे - सबका निर्दयतापूर्वक संहार।

सर्ग 23 - पति-पत्नी की भेंट - पिनीलोपी ने अपने पति को पहचाना - दोनों का सस्नेह रुदन।

सर्ग 24 - दुष्ट कुमारी की आत्माएँ अध यमलोक में - उनके सम्बन्धियों द्वारा युद्ध की योजना - युद्ध प्रारम्भ होने ही वाला था कि दवा एन्थनी के भयंकर उद्घोष को सुनकर शत्रु त्रस्त हो गये - अन्त में शान्ति एवं सन्धि।

होमरीय कथा कौशल

इलियड का कथानक महज 50 दिनों का है - दसवें वर्ष के अन्तिम दो मास के अन्दर की घटी घटनाएँ। 

यदि कथानक कथा के आरम्भ से प्रारम्भ होता तो उस लीडा एवं हंस के संयोग से प्रारम्भ होना चाहिए था।

पर होमर कथा के अन्तिम भाग को पकड़ता है। बीच-बीच में वह पूर्व कथा का संकेत करता जाता है,
वह भी एक क्रम से नहीं। ग्रीक श्रोतासमाज को कथा पहले ही से ज्ञात है। इसी से उसे कोई कठिनाई नह

ीं ज्ञात होती, अन्यथा एक अनजान व्यक्ति को कथा का प्रथमांश तभी स्पष्ट होगा जब एक बार वह सम्पूर्ण काव्य का पठन कर जाए। इलियट के बारे में दूसरी बात यह ध्यान में रखने की है कि उसका विषय जैसा कि मंगलाचरण से स्पष्ट है, एकिलेस के क्रोध का गान है। जहाँ यह क्रोध अपनी चरम परिणति के बाद समाप्त होता है। उससे कुछ आगे तक, अर्थात् इस क्रोध के प्रत्यक्ष फल पेट्राक्लस की मृत्यु एवं अप्रत्यक्ष फल हेक्टर की मृत्यु तक, चलकर कथा समाप्त हो जाती है पर एकिलेस की मृत्यु, ट्राय का ध्वंस आदि इस

महाकाव्य में नहीं आते हैं। होमर अपने महाकाव्य में घोषित विषय पर बड़ी कड़ाई से ‘टु द प्वाइण्ट’ स्थित 

रहता है - जरा भी इधर-उधर नहीं जाता। इस घोर संयम का ही परिणाम है कथा-या ‘विषय की एकता’ (युनिटी ऑव ऐक्शन)। प्रत्येक घटना समूची डिजाइन के अन्दर कसी हुई आंगिक संगति के साथ बैठायी गयी है। भारतीय महाकाव्यों में इसी एकता एवं संगति का अभाव है एवं सारा ढाँचा ढीली-ढाली कथा व्यवस्था से पूर्ण है। वाल्मीकि रामायण का विषय है पोलस्त्यवध, पर उसमें अवान्तर घटनाएँ बहुत ढीले सूत्रों से जुड़ी हैं। महाभारत म ें तो यह ‘एकता’ बिलकुल नहीं - वह तो विश्वकोष की शैली में लिखा गया है। तुलसीदास के रामचरितमानस में अवश्य यह ‘गठीली एकता’ एवं ‘आंगिक संगति’ होमर की ही तरह मिलती है। जहाँ तक विषय की एकता एवं प्रभावान्विति (युनिटी आव इम्प्रेशन) का प्रश्न है तुलसीदास की समता कोई भी भारतीय कवि, चाहे वह कालिदास ही क्यों न हो, नहीं कर सकता। यह बात यहाँ अभिधार्थ में लिखी जा रही है।

होमर एकिलेस के क्रोध एवं उसके विकास का प्रतिफल एवं वर्णन 9 सर्गों में करता है 

और कथा को उसके प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष फलों तक ले जाकर समाप्त करता है।

यदि वह आगे की घटना, एकिलीज की मृत्यु एवं ट्राय-ध्वंस, तक वर्णित करने क

े प्रलोभन में पड़ता तो काव्य में वह कटी-छटी गठीली ढाँचागत एकता नहीं आ पाती।

ढाँचा (स्ट्रक्चर) ढीला हो जाता। अरस्तू ने होमर की प्रतिभा की सराहना ‘पोयटिक्स’ के उन अध्यायों में की है,
और होमर का ही अनुकरण का आदर्श बनाने की शिक्षा दी है, जहाँ वह ‘तीन एकताओं’ (देश, काल एवं विषय)
एवं प्रभावान्विति की चर्चा करता है। ग्रीक साहित्य में ढाँचा (‘छन्द’, फार्म) पर
बहुत ही अधिक जोर दिया गया है। यह रूप विधान की ज्यामितिक संगति (ज्यामेट्रिकल सिमट्री),
उनकी मूर्तिकला, नाट्यकला आदि सभी के अन्दर स्पष्ट है। उन्होंने छन्द (ढाँचा) को भावानुभूति एव

ं अलंकार से कम महत्त्व नहीं दिया। होमर में यह प्रवृत्ति न केवल बीज रूप में विद्यमान है,

बल्कि उसका सर्वोत्तम रूप होमर में ही मिलता है। इलियड में सारा ‘ऐक्शन’ वृत्ताकार है। 

जहाँ से प्रारम्भ होता है, वहीं पर आकर समाप्त होता है। जिन संस्कारों ने ग्रीक ट्रेजेडी को ढाँचा एवं भावभूमि प्रदान की, वे संस्कार ग्रीकों की जातीय निधि हैं और वे ही होमर की प्रतिभा में भी प्राण स्थापन करते हैं। इसी से होमर एव ं कालान्तर के ट्रेजेडी साहित्य में ढाँचागत (स्ट्रक्चरल) एवं भावगत (इमोशनल) समानता है। ग्रीक ट्रेजेडी के ढाँचे का संयमन तीन तत्त्व - ‘एक देश’, ‘एक काल’, एवं ‘ एक व्यापार या विषय’-करते हैं। इलियड में ‘देश’ एक ही है अर्थात् सारी घटना ट्राय क े महलों एवं सामने के समुद्रतट पर ही होती है। ‘काल’ भी एक ही है, क्योंकि महाकाव्य का घटनासूत्र लगातार 50 दिन की अवधि का है। अर्थात्, ‘काल’ का एक अनवरत अखण्ड रूप दिया गया है - 10वें वर्ष के अन्तिम 50 दिनों को पकड़ कर। काव्यवृत्त को 10 वर्षों की सतह पर न फैलाकर वह 50 दिनों के अन्दर ही समेट लेता है। व्यापार या विषय भी एक ही है - एकिलेस का क्रोध, उसका शमन एवं उपसंहार के रूप में उसका फल। बस, यहीं महाकाव्य समाप्त हो जाता है।

ओडेसी का विषय विस्तृत है। महाकाव्य का नायक ओडेसियस ट्राय युद्ध के बाद 10 वर्ष तक भटकता रहा। 

इस दशक के अन्तिम भाग से इस महाकाव्य का भी प्रारम्भ होता है। ढाँचा ठीक इलियड जैसा है। इलियड के 50 दिनों की घटना में वर्तमान का ही प्राधान्य है - उन 50 दिनों में क्या घटित हुआ, इसी का वर्णन कवि का उद्देश्य है। पूर्व की घटनाएँ राह चलती चर्चा-सी कहीं-कहीं आ जाती हैं।

परन्तु ओडेसी में यह बात नहीं। ओडेसी का विषय ही है ‘ओडेसियस का दुःखमय भ्रमण’।

अतः यह 10 वर्षों का भ्रमण-वृत्तान्त ही उसका उद्देश्य है। वह इलियड की तरह ही दशक क े अन्तिम छोर पर प्रारम्भ होता है अवश्य, परन्तु उसका उद्देश्य ‘वर्तमान’ से अधिक ‘अतीत’ से सम्बन्धित है। इसलिए होमर आधुनिक फिल्मों का फ्लैशबैक-टेकनीक का उपयोग करता है। महाकाव्य का आरम्भ होता है 10वें वर्ष में, जब ओडेसियस अप्सरा केलीप्सो के द्वीप से यात्रा शुरू करता है और उसका भग्न पोत डूब जाता है एवं वह नासिका के देश में बहकर लग जाता है। वहाँ के राजा को अपने 9 वर्ष ों की राम कहानी सर्ग 9 से 12 तक में सुनाता है। ‘पूर्व-स्मृति’ तकनीक (फ्लैशबैक टेकनीक) इसी 9वें से 12वें सर्गों में है। परन्तु इस पूर्व स्मृति के गर्भ में भी ‘अन्तःपूर्व स्मृति’ है 11वें सर्ग में, जब वह एकिलेस को ट्राय युद्ध की कथा का शेषांश सुनाता है। ओडेसी का काल संगठन बड़ा ही पेचीदा है। ‘वर्तमान’ के गर्भ में ‘पूर्व’ एवं उस पूर्व के गर्भ में ‘अन्तःपूर्व’ निहित है। समूचे काल-बन्ध (टाइम-अरेंजमेण्ट) को ‘मुकुल-पत्र-बन्ध’ की संज्ञा दी जा सकती है। कली में पंखुड़ियों की एक परत के अन्दर दूसरी परत,

दूसरी के अन्दर तीसरी परत पड़ी रहती है। उसी भाँति ओडेसी का काल-बन्ध है।
यह काल-बन्ध द्विगुण पेचीदा इसलिए हो जाता है कि ओडेसी का ‘देश’ एक नहीं है। ओडेसी का विषय है,
‘भयंकर समुद्र-भ्रमण एवं गुहागमन’। अतः व्यापार के केन्द्र दो हो जाते हैं। एक तो है इथैका जहाँ उसकी 

रानी पिनीलोपी उसकी प्रतीक्षा में बैठी है और उसके पुत्र-कलत्र उसके शत्रुओं से घिरे हैं। दूसरा है ओडेसियस स्वयं एवं उसकी समुद्र-सतह पर की चलायमान स्थिति। इन दो ‘देशों’ के घटनाओं संचालन होता है महान सूत्रधार ज़ीयस द्वारा। ‘देश की एकता’ न होने पर भी विषय या व्यापार का एकता उसी तरह कटी-छँटी रूप में विद्यमान है जिस तरह ‘इलियड’ में। कवि बड़ी सावधानी से एक घटना की परत में दूसरी घटना रखकर समूचे व्यापार की संगति एवं सुडौलता की रक्षा बड़ी धीरता से करता है।

इलियड की विषय-वस्तु सीमित है। इसी से ट्रेजेडी का पैटर्न बैठ गया। बड़ी सरलता से 

कार्य-प्रभाव की एकता साध ली गयी। परन्तु ‘ओडेसी’ का विषय विस्तृत है। यह उपन्यास की तरह है। फिर भी इतनी सावधानी से कार्य एवं प्रभाव की एकता सम्पादित की गयी है कि आज के शैली-प्रधान या रूप-प्रधान उपन्यास भी उसक े सामने फीके पड़ जाते हैं। एक आदि कवि के लिए-एक प्रारम्भकर्त्ता के लिए इतनी बड़ी कारीगरी आश्चर्य का ही विषय है। संक्षेप में इलियड का रूपायन (फार्म) ट्रेजेडीपरक है एवं ओडेसी का उपन्यासपरक।

इतना होते हुए भी ओडेसी बहुत-सी बातों में इलियड के समानान्तर है। 

इलियड और ओडेसी दोनों काव्यों का आरम्भ कथाकाल की अन्तिम छोर पकड़कर होता है। दोनों का अन्त भी प्रारम्भ में घोषित विषय पर होता है। दोनों की गति-रेखा वृत्ताकार है। दोनों में सर्गों की संख्या 24 है। इलियड के अन्त में हेक्टर का निधन है तो ओडेसी में पाणि-प्रार्थी राजकुमारों का। इलियड के अन्त में एक शान्त वातावरण, कुछ काल के ही लिए सही, उपस्थित हो जाता है जिसमें दोनों पक्ष मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं। ओडेसी में तो अन्त में प्रियामिलन एवं स्थायी शान्ति आ जाती है।

दोनों महाकाव्यों के अन्दर आये चरित्र एक ही पैमाने और साँचे में ढले ज्ञात होते हैं। 

एन्थनी जिस कुटिलता और तत्परता से ग्रीक योद्धाओं की सहायता इलियड में करती है उसी रूप में ओडेसी में भी। पोजीडॉन (वरुण) दोनों में एक क्रूर एवं उजड्ड देवता की तरह है।

ओडेसियस दोनों महाकाव्यों में साहसी, वीर, क्रूरकर्मा एवं कुटिल रूप में चित्रित है।
मिनीलास उसी प्रकार धनी, उदार हृदय योद्धा दोनों महाकाव्यों में है। 

बुद्धिमान् वृद्ध नेस्टर का मित्र भी वहीं रहता है। यदि इन महाकाव्यों क े रचयिता अलग-अलग होते तो चरित्रों के चित्रण में फर्क अवश्य आ जाता। उदाहरण के लिए होमर का ‘डायोमीडिल’ या ‘अफ्रोदीती’ वर्जिल के डायोमीडिज या अफ्रोदीती (वीनस) से बिलकुल अलग हैं। कथानक एवं चरित्रों का समान पैटर्न बताता है कि दोनों काव्य एक ही व्यक्ति की प्रतिभा से निःसृत हैं।


संदर्भ

  1. Rieu, D.C.H. (२००३). The Odyssey. पेंगुइन. प॰ xi. 
  2. "अन्य देशों में मानवाधिकार और स्वत्व" (एचटीएमएल). मेरी कलम. http://v-k-s-c.blogspot.com/2009/01/human-rights-ancient-times-other.html. अभिगमन तिथि: २००९. 

सन्दर्भ

सन्दर्भ

The Iliad

By Homer

Written 800 B.C.E

Translated by Samuel Butler

   Table of Contents 

Book I

बाहरी कड़ियाँ

http://classics.mit.edu/Homer/iliad.1.i.html