ऑस्पेन्स्की

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ऑस्पेन्स्की, प्योत्र दिमाइनोविच (1878-1947)




पी॰डी॰ऑस्पेन्स्की मशहूर रहस्यवादी गुर्जिएफ़ के शिष्य थे। उनका जन्म ४ मार्च, १८७८ को मॉस्को में हुआ था। उनकी मां एक चित्रकार तथा पिता रेलवे मे उच्चाधिकारी होते हुए भी संगीत प्रेमी थे। अल्प आयु मे ही बौद्धिक परिपक्वता के कारण अकादमिक डिग्रियों में उनकी रुचि नहीं थी और उन्होंने स्कूल छोड़ दिया तथा अपना अधिकांश समय यात्रा एवं पत्रकारिता में बिताने लगे। उनकी पहली पुस्तक 'चतुर्थ आयाम' (फोर्थ डायमेंशन) १९०९ तथा 'टर्शियम ऑर्गेनम' १९१२ में रूसी भाषा में प्रकाशित हुई। १९१४ में रूसी में प्रकाशित उनके लेखों के संग्रह 'ए न्यू मॉडल ऑफ़ दि यूनिवर्स' ने रहस्यवाद में उनकी रुचि की ओर संकेत किया। इन पुस्तकों के कारण ऑस्पेन्स्की की ख्याति एक गंभीर चिंतक एवं दार्शनिक के रूप में स्थापित हो चुकी थी। १९१५ में, भारत-यात्रा से लौटने के पश्चात, मॉस्को में जी॰आई॰ गुर्जिएफ़ से उनकी मुलाकात उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई। उसके बाद से उनके कार्य का गुरुत्व-केंद्र मनुष्य में चेतना के विकास की व्याहारिक विधियों के अध्ययन पर केंद्रित हो गया। आठ साल तक गुर्जि़एफ़ के साथ कार्य करने के उपरान्त उनकी पद्धति को ऑस्पेन्स्की ने 'इन सर्च ऑफ़ दि मिरैक्यूलसः फ्रैगमेंट्स ऑफ़ ऐन अननोन टीचिंग्स' में कलमबद्ध किया, जो १९४९ में उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई। सन १९२३ में गुर्जिएफ़ से अलग होने के बाद ऑस्पेन्स्की ने लंदन में अपना ठिकाना बनाया और चतुर्थ मार्ग (फोर्थ वे) की स्वतंत्र रूप से शिक्षा देने लगे। उनकी शिक्षा का तरीका यह था कि जो 'नये लोग' उनके पास आते थे, उन्हें उनके पांच या छह लिखित अभिभाषणों को पढ़ कर सुनाया जाता था। फिर ऑस्पेन्स्की उनके प्रश्नों का उत्तर देते थे। यही अभिभाषण आगे चल कर 'दि साइकोलॉजी ऑफ़ मैन्स पॉसिबल इवोल्यूशन' नामक पुस्तक में संकलित होकर प्रकाशित हुए तथा प्रश्नोत्तरों को 'फोर्थ वे' शीर्षक से प्रकाशित किया गया। ऑस्पेन्स्की को मुख्यतः 'इन सर्च ऑफ़ दि मिरैक्यूलस' तथा 'फोर्थ वे' के लिये ही याद किया जाता है। गुर्जिएफ़ की शिक्षाओं का यह अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथ है। कहा जा सकता है कि जो भूमिका प्लेटो ने सुकरात की शिक्षाओं के प्रसार में तथा स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं के प्रसार में अदा की, वही भूमिका ऑस्पेन्स्की की यह किताब गुर्जिएफ़ की शिक्षाओं के लिए करती है। भारतीय पाठकों की सुविधा के लिए हिंदी में उनकी दो पुस्तकों का अनुवाद अवधकिशोर पाठक ने किया है। 'इन सर्च ऑफ़ दि मिरैक्युलस' का हिंदी में 'अलौकिक की तलाश में: एक अज्ञात विद्या के अंश' शीर्षक के तहत तथा 'दि साइकॉलॉजी ऑफ़ मैन्स॰॰॰॰॰॰॰' का 'तोडो़ कारा बंदी मन की' शीर्षक के तौर पर अनुवाद हुआ है।



The second book, Which expounds the ideas of Russian mystic G.I. gurdjieff in detail and established him as a great thinker, is "In Search of the Miraculous". This book in Hindi is available under the title of "Alaukik Ki Talash Mein". The translator, through a four page introduction and footnotes at appropriate places in text, has provided the insight which connects the origin of ideas to vedantic literature.