एम.सी.छागला
महोम्मेदाली करीम चागला (एम.सी.छागला) (30 सितंबर, 1900-9 फरवरी, 1981) एक प्रसिद्ध भारतीय न्यायधीश, राजनयिक तथा कैबिनेट मंत्री थे, जिन्होनें 1948 से 1958 तक बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की थी.
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सक्रिय जीवन और करियर[संपादित करें]
30 सितंबर 1900 को बंबई में एक धनी शिया मुस्लिम व्यापारी परिवार में जन्मे छागला ने 1905 में अपनी मां की मौत के कारण एकाकी बचपन व्यतीत किया. उन्होनें बंबई के सेंट जेवियर्स हाई स्कूल और कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की, जिसके बाद 1919 से 1922 तक वह अध्ययन करने के लिए लिंकन कॉलेज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी चले गए. इसके बाद उन्हें बंबई उच्च न्यायालय के बार में दाखिला मिल गया जहां उन्होनें सर जमसेतजी कांगा और मोहम्मद अली जिन्ना, जो बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बन गए, जैसे दिग्गजों के साथ काम किया.
छागला ने जिन्ना को अपना आदर्श माना और मुस्लिम लीग के सदस्य बन गए, किन्तु बाद में उनके (जिन्ना) द्वारा पृथक मुस्लिम राज्य की मांग उठाने के बाद उन्होनें जिन्ना से सभी संबंध समाप्त कर लिए. उसके बाद उन्होंने अन्य लोगों के मिल कर बंबई में मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की जो एक ऐसी पार्टी थी जिसे स्वंत्रता संग्राम के दौरान अनदेखा किया गया और हाशिए में धकेल दिया गया. 1927 में उन्हें बंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में विधि प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त किया गया, जहां उन्होनें डा. बी आर अम्बेडकर के साथ काम किया. 1941 में उन्हें बंबई उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया, 1948 में वे मुख्य न्यायधीश बने और 1958 तक इस पद पर सेवा करते रहे.
1946 में, छागला संयुक्त राष्ट्र में भाग लेने वाले पहले भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे. 4 अक्टूबर से 10 दिसंबर, 1956 तक छागला तत्कालीन बंबई राज्य के राज्यपाल रहे जो बाद में गुजरात तथा महाराष्ट्र राज्यों में विभक्त हो गया. मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के बाद, वह उस एकल सदस्यीय आयोग का हिस्सा बने जिसने विवादित हरिदास मूंदड़ा एल.आई.सी. बीमा घोटाले के लिए भारत के वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी की जांच की, जिसके कारन टी.टी. कृष्णमाचारी को वित्त मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. कृष्णमाचारी नेहरू के काफी निकट थे और इसलिए नेहरू टीटीके के बारे में छागला द्वारा किए गए खुलासे से काफी नाराज़ थे, हालांकि बाद में उन्होनें छागला को माफ़ कर दिया. सितंबर 1957 से 1959 तक छागला ने हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश के रूप में कार्य किया.
सेवानिवृत्ति के बाद 1958 से 1961 तक उन्होनें संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत के रूप में कार्य किया. इसके बाद छागला ने अप्रैल 1962 से सितम्बर 1963 तक ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया. वापिस लौटने के तुरंत बाद, उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद ग्रहण करने की पेशकश की गई जो उन्होनें स्वीकार कर ली, तथा 1963 से 1966 तक उन्होनें शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया, इसके बाद नवंबर 1966 से सितम्बर 1967 तक विदेश मामलों के मंत्री के रूप कार्य किया, जिसके बाद उन्होनें सरकारी नौकरी का परित्याग कर दिया. उसके बाद सत्तर वर्ष की उम्र में अपने जीवन के बचे हुए वर्षों में वह सक्रिय रूप से वकालत करते रहे.
जवाहरलाल नेहरू के अधीन शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते समय छागला सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को ले कर बहुत परेशान थे:
- हमारे संविधान निर्माताओं का इरादा यह नहीं था कि हम सिर्फ झोंपड़ी खड़ी करें, वहां बच्चों को भरें, उन्हें अप्रशिक्षित शिक्षक दें, उन्हें फटी हुई किताबें दें, खेल का कोई मैदान न हो, और फिर यह कहें कि हमने अनुच्छेद 45 का पालन किया है और प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो रहा है... उनकी इच्छा थी कि 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच हमारे बच्चों को वास्तविक शिक्षा दी जानी चाहिए.[1]
दुर्भाग्य से, यह टिप्पणी आज भी भारतीय शिक्षा के लिए उतनी ही सत्य है.
निजी जीवन और परिवार[संपादित करें]
1930 में, छागला ने मेहरुनिस्सा धारसी जीवराज से विवाह किया और 1932 में इस दंपत्ति के घर एक कन्या हुस्नारा तथा 1934 व 1939 में क्रमशः दो बेटे जहांगीर एवं इकबाल पैदा हुए. नवम्बर 1961 में मेहरुनिस्सा धारसी जीवराज की मृत्यु हो गई.
अंतिम वर्ष एवं मृत्यु[संपादित करें]
1973 में, अपने बेटे इकबाल की मदद से छागला ने दिसंबर में अपनी आत्मकथा, रोज़ेज़ (Roses) प्रकाशित की. उन्होनें भारतीय आपातकाल का पुरजोर विरोध किया. 9 फ़रवरी 1981 को 81 वर्ष की आयु में मोहम्मद करीम छागला की दिल के दौरे से मृत्यु हो गई. वह कई वर्षों से अस्वस्थ थे, और उन्हें चार बाद दिल का दौरा पड़ चुका था. अपनी सक्रिय और ऊर्जावान प्रकृति के कारण, उन्होनें स्वास्थ्य के वजह से अपने आप को धीमा नहीं पड़ने दिया. अपनी मृत्यु के दिन, वह रोज की ही तरह बंबई में अपने क्लब में गए और अपने दोस्तों के साथ एक अच्छा समय बिताया. इसके बाद वह चुपचाप ड्रेसिंग रूम में चले गए और वहां शांति से मर गए. उनकी इच्छा के अनुसार, एक पारंपरिक मुस्लिम के रूप में दफन करने के बजाय उनका अंतिम संस्कार किया गया. उनके सम्मान में बंबई उच्च न्यायालय को बंद कर दिया गया और उनकी स्मृति में कई शोक संदेश दिए गए जिसमे भावी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संदेश भी शामिल था. 1985 में, छागला की एक मूर्ति का अनावरण किया गया था और इसे उच्च न्यायालय के भीतर ही मुख्य न्यायधीश न्यायालय के बाहर लगाया गया जहां उन्होनें कार्य किया था. प्रतिमा के चबूतरे पर शिलालेख में लिखा है:
"एक महान न्यायाधीश, एक महान नागरिक, और इन सब से ऊपर, एक महान इंसान."
और अधिक तथ्य[संपादित करें]
छागला नास्तिक थे.
उपनाम "छागला" उनका अपना मूल उपनाम नहीं था. छागला की आत्मकथा में उन्होंने ब्यौरा दिया है कि अपनी जवानी में, वह एक "मर्चेंट" के रूप में जाने जाते थे क्योंकि उनके पिता और दादा दोनों व्यापारी थे. पैसों के साथ यह नाम जुड़ा होने के कारण, वह एक दिन अपने दादा के पास गए और पूछा कि उन्हें अपने आपको किस नाम से बुलाना चाहिए. उनके दादा ने तुरंत कहा "छागला" क्योंकि उनका इकलौता बेटे, जो कि छागला के पिता थे, का प्यार का नाम छागला था, जिसका कच्छी भाषा में अर्थ है "प्रिय". छागला ने तुरंत नया उपनाम अपना लिया.
संदर्भ[संपादित करें]
बाहरी लिंक्स[संपादित करें]
| राजनीतिक कार्यालय | ||
|---|---|---|
| पूर्वाधिकारी Sardar Swaran Singh |
Minister for External Affairs of India 1966–1967 |
उत्तराधिकारी Indira Gandhi |
| पूर्वाधिकारी Gaganvihari Lallubhai Mehta |
Indian Ambassador to the United States 1958-1961 |
उत्तराधिकारी B.K. Nehru |
"रोज़ेज़ इन दिसंबर, एक आत्मकथा," एम.सी. छागला, दसवां संस्करण, भारतीय विद्या भवन, 2000, ISBN 81-7276-203-8