एजिटेटर्स

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१६४७ ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट के दीर्घ सत्र ने सेना के एक हिस्से को बरखास्त करने और एक हिस्से को आयरलैंड भेजने का प्रस्ताव किया। सैनिकों ने, जो पूरा वेतन न मिलने के कारण असंतुष्ट थे, क्षुब्ध होकर, प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। अपने दृष्टिकोण और शिकायतों को प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने अपने जो प्रतिनिधि चुने वे एजिटेटर्स (आंदोलक) कहलाए। अस्थायी समझौते के बाद पार्लियामेंट ने सेनाभंग का निश्यच कर लिया। सैनिकों ने तीव्र विरोध किया, तथा एक दस्ते ने विद्रोह भी कर दिया, जिससे निर्णय का परित्याग करना पड़ा। इसी रीति के कारण क्रामवेल की तानाशाही संभव हो सकी। चार्ल्स प्रथम के बंदी होने पर सेना, पार्लियामेंट तथा बंदी राजा की तीनतरफा वार्ता चलती रही। सेना एक ओर चार्ल्स प्रथम से पराङ्मुख होती गई, दूसरी ओर पार्लियामेंट से भी मनमुटाव बढ़ता गया। अंतत: चार्ल्स प्रथम के प्राणदंड के बाद सैनिकों ने लंदन जाकर पार्लियामेंट सदन पर घेरा डाल कुछ सदस्यों को बंदी बनाया, कुछ को निकाल दिया। क्रामवेल के काल से यह आंदोलन शिथिल हो गया; यद्यपि लेवेलरों (Levellers) ने उसके मंतव्यों का अनुगमन किया।