ऋणात्मक दाब श्वासयंत्र

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नकारात्मक दाब श्वासयंत्र जिसे प्रायः लौह फेफड़े के नाम से भी संदर्भित किया जाता है, श्वासयंत्र का एक प्रकार है जो फेफड़ों की मांसपेशी नियंत्रण खोने से सांस लेने में असमर्थ या कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति को सांस लेने में समर्थ बनाता है। अब नकारात्मक दाब श्वास्यंत्र का स्थान पूरी तरह से धनात्मक दाब श्वास् यंत्र या बाइपासिक क्युरास स्वासयंत्र ने ले लिया है।

प्रविधि और प्रयोग[संपादित करें]

मनुष्य भी अधिकांस प्राणियों की तरह नकारात्मक दबाव पद्धति से सांस लेता है। फेफड़ों की पेशियाँ अनवरत रूप से फैलती और सिकुड़ती रहती है। पेशियों के फैलने पर फेफड़ों का आकार बढ़ जाता है। इससे वहाँ बाहरी वातावरण की तुलना में हवा का दबाब कम रह जाता है। इससे वातावरण से वायु नाक की श्वास नली से होकर फेफड़ों में पहुँच जाती है। फिर मांसपेशियों के संकुचित होने पर उ्चच्च दाब निर्मित हो जाता है और वायु फेफड़ों से निःश्वास के रूप में बाहर चली जाती है। किसी कारण संकुचण और विस्तार करने वाली पेशियाँ यदि कमजोर पड़ जाएं, नियंत्रण में न रहें तो व्यक्ति के लिए सांस लेना मुश्किल या असंभव हो जाता है।

लौह फेफड़े का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को इस्पात के बंद बेलन में नियंत्रित दाब में रखा जाता है। व्यक्ति का सिर तथा गरदन बाहर और शेष सारा शरीर वायुरुद्ध स्थिति में बेलन के भीतर रहता है। बेलन से संबद्ध पंप नियमित रूप से बेलन में हवा डालकर और निकालकर व्यक्ति के चारों ओर के और खास तौर पर फेफड़ों के पास छाती पर वायुदाब को बढ़ाता और घटाता रहता है। वायुदाब कम होने की स्थिति में बाहरी वातावरण की हवा स्वासनली के रास्ते फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है बेलन के भीतर का दाब बढ़ने पर फेफड़ों की हवा बाहर निकल जाती है।

इतिहास[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]