उदयगिरि

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चित्र:Udaygiri1.JPG
उदयगिरि की गुफाएं

उदयगिरि विदिशा से वैसनगर होते हुए पहुँचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग १ मील की दूरी पर है। पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। उत्खनन से प्राप्त ध्वंसावशेष अपनी अलग कहानी कहते हैं।

उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। १० वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया।


उदयगिरि की गुफाएँ[संपादित करें]

चित्र:Udaygiri-caves-915 m.jpg
उदयगिरि ‎

उदयगिरि में कुल २० गुफाएँ हैं। इनमें से कुछ गुफाएँ ४वीं- ५वीं सदी से संबद्ध है। गुफा संख्या १ तथा २० को जैन गुफा माना जाता है। गुफाओं की प्रस्तर की कटाई कर छोटे- छोटे कमरों के रुप में बनाया गया है। साथ- ही- साथ मूर्तियाँ भी उत्कीर्ण कर दी गई हैं। वर्तमान में इन गुफाओं में से अधिकांश मूर्ति- विहीन गुफाएँ रह गई हैं। ऐसा यहाँ पाये जाने वाले स्थानीय पत्थर के कारण हुआ है। पत्थर के नरम होने के कारण खुदाई का काम आसान था, लेकिन साथ- ही- साथ यह मौसमी प्रभावों को झेलने के लिए उपयुक्त नहीं है।


गुफा संख्या - १[संपादित करें]

इस गुफा का स्थानीय नाम सूरज गुफा है। यहाँ से अठखेलियाँ करती वेत्रवती, साँची स्तूप तथा रायसेन के किले की शिलाएँ स्पष्ट दिखाई पड़ती है। यह ७ फीट लंबे व ६ फीट चौड़े कक्ष के रुप में काटा गया है तथा ऊर से एक शिला काफी आगे तक आकर इस गुफा को ढाँके हुए है। कहा जाता है कि पहले इसे सूर्यनारायण की मूर्ति स्थापित थी, जो कालांतर में नष्ट हो गया।

वास्तुकला की दृष्टि से यह गुफा उतना महत्वपूर्ण नहीं है, फिर भी यह मंदिर, वास्तुकला के विकास के प्रारंभिक चरण को दर्शाता है।


गुफा संख्या - २[संपादित करें]

७ फीट ११ इंच लंबी तथा ६ फीट १.५ इंच चौड़ी यह गुफा एक कक्ष की भांति है, जिसका अब केवल चिंह मात्र रह गया है।


गुफा संख्या - ३[संपादित करें]

इस गुफा के भीतर का कक्ष ८ ६ फीट का है तथा गहराई ६ फीट ३ इंच है। पहले दरवाजे के ठीक सामने कोई पुरुष मूर्ति होने का संकेत मिलता है, जो अब नष्ट हो चुका है। इसमें बचे पाँच मूर्तियों में कुछ मूर्तियाँ चर्तुमुखी है व वनमाला धारण किये हुए है।


गुफा संख्या - ४[संपादित करें]

शिव को समर्पित इस गुफा का क्षेत्रुल १३ फीट, ११ इंच ११ फीट, ८ इंच है। वीणा गुफा के नाम से प्रसिद्ध इस गुफा के भीतर एक शिवलिंग है। दरवाजे पर एक किन्नर को वीणा बजाते हुए दिखलाया गया है। शिवलिंग के सामने के भाग पर एक भव्य मानव आकृति का शिवमुख है, जिसमें ऊपर जटा- जूट तथा मस्तक के बीच में तीसरा नेत्र दिखाया गया है। यह मूर्ति गुप्तकालीन मूर्तियों में कला- कौशल की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। उत्तर की तरफ बने दालान में अष्ट दुर्गाओं की मूर्तियाँ बनी हैं, जिसमें त्रिशूल व आयुध अभी भी दिखलाई पड़ते हैं। पहले गुफा के सामने भी एक दालान था, जो अब नष्ट हो गई है।


गुफा संख्या - ५[संपादित करें]

यह गुफा वाराह गुफा के नाम से जाना जाता है तथा उदयगिरि की समस्त गुफाओं में सर्वश्रेष्ठ है। वास्तव में यह पहाड़ी को काटकर एक दालान के रुप में बनाई गई है, जो २२ फीट लंबी तथा १२ फीट ८ इंच ऊँची एवं ३ फीट ४ इंच पत्थर में भीतर की ओर गहरी है।

यहाँ पत्थर को काटकर बनाई गई वाराह अवतार की मूर्ति पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक मानी जाती है। मूर्ति का मुख भाग वाराह के रुप में है तथा शेष हिस्सा मानवाकृति का है। बलिष्ठ भुजाएँ, मांसल जंघाओं तथा सुडौल बनावट ने मूर्ति को बल, शौर्य तथा सुंदरता का प्रतीक बना दिया है। मूर्ति पीतांबर पहने हुए है तथा साथ- साथ कंठहार, वैजयंतीमाला तथा कंगन भी उत्कीर्ण किये गये हैं।

बांये पैर को मुकुट पहने किसी विशेष व्यक्ति के हृदय पर रखा हुआ दिखलाया गया है, जिसके मस्तक के ऊपर विशाल १३ फणों वाला नाग स्थित है। वह वाराह की स्तुति करने की मुद्रा में है। इस विशेष व्यक्ति की पहचान के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्धान इसे राजा बताते हैं, तो कुछ देवता या विष्णु की मूर्ति। पुराणों के अनुसार वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस से पृथ्वी का उद्धार किया था। अतः कुछ विद्वान इसे हिरण्याक्ष की मूर्ति मानते हैं। परंतु मूर्ति का मुख असुर सदृश नहीं दिखलाया गया है। मूर्ति के ऊपर नाग फणों का घेरा होने के कारण लोग इसे पाताल का स्वामी भी मानते हैं या फिर समुद्रराज। वाराह के बायीं ओर स्तुति करती हुई दिखाई गई रानी, संभवतः नीचले मूर्ति की राजमहिषी हो सकती हे।

वाराह के कंधे पर नारी रुपी पृथ्वी को दिखलाया गया है। पृथ्वी के दोनों पैर नीचे लटके हुए दिखाए गये हैं। अंग- प्रत्यंग में करुणा भाव दिखलाया गया है। चोली में स्थित पुष्ट पयोधर पृथ्वी की पोषणात्मक शक्ति के प्रतीक हैं।

नीचे स्थित लेटे अवस्था में दिख रही मूर्ति के पीछे स्थित कलश लिए देवता वरुण का प्रतीक प्रतीत होता है। साथ में दिखाई दे रही दो जल- धाराएँ गंगा तथा यमुना की प्रतीक हैं, जो स्वर्ग से नीचे की तरफ अवतरण करती हुई दिखाई गई हैं। गंगा तथा यमुना को अपने- अपने वाहन मकर तथा कच्छप पर दिखलाया गया है। ऊपर अप्सराएँ दिखाई गई हैं तथा बाई ओर पाँच पंक्तियों में यक्ष, किन्नर, गंर्धव व मरुत गणों को स्तुति- गान करते हुए दर्शाया गया है। ऊपरी पंक्ति में दिख रहे गंधर्व के हाथों में स्थित वायलिन जैसा वाद्य यंत्र इस बात के साक्ष्य हैं कि ऐसे यंत्र की उत्पति भारत में ही हुई होगी। दांयी ओर यक्ष व महर्षिगण चार पंक्तियों में दर्शाये गये हैं। ब्रह्मा तथा नंदी वाहन समेत शिव को सबसे ऊपरी पंक्ति में दर्शाया गया है।


गुफा संख्या - ६[संपादित करें]

प्राप्त शिला- अभिलेखों के साक्ष्य के कारण यह गुफा महत्वपूर्ण है। गुफा का भीतरी हिस्सा चौकोर है तथा बाहर की ओर पत्थर को ही काटकर एक ऊँची दालान बना दी गई है। चौखट अत्यंत कलात्मक है, जिसमें सुंदर बेल- बूटे हैं। दरवाजे के बाहर दो द्वारपाल, दो विष्णु, एक गणेश तथा एक महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति बनाई गई है। ये भव्य मूर्तिया भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यद्यपि उसी समय किये गये पालिश के कारण ॠतु- क्षरण का प्रभाव कम पड़ा है, लेकिन मुस्लिम आक्रमणकारी समय- समय पर इसे नष्ट करते रहे।

द्वारपालों की मूर्ति सैनिक वेशभूषा में हैं। उनके हाथों में चंद्राकार परशु दिखाया गया है तथा लहराते हुए बाल सिर पर दोनों तरफ रोमन लोगों के विग की भाँति दिखते हैं। धोती के नीचे एक विशेष परिधान दिखलाया गया है, जो यहाँ के आम मूर्तियों में नहीं मिलता।

विष्णु की दोनों मूर्तियों, जो खड़ी अवस्था में हैं, कला की दृष्टि से एक- सी है, परंतु बांयी ओर की मूर्ति कुछ छोटी है। दाहिनी मूर्ति में एक चक्राकार आयुध है, परंतु बांयी मूर्ति में ढ़ोलकीनुमा वस्तु पर चक्र टिका हुआ है।

बांयी ओर स्थित विष्णु की मूर्ति के निकट ही दुर्गा की महिषमर्दिनी रुप उत्कीर्ण किया गया है। इसमें देवी वीर भेष में देवी के बारह हाथ हैं। अस्र- शस्र के रुप में त्रिशुल, तलवार- ढाल तथा धनुष- बाण दिखलाया गया। महिषासुर को भैंसे की आकृति में अंकित किया गया है तथा इसके छाती पर दुर्गा को पैर रखे हुए, त्रिशुल चुभोते हुए दिखाया गया है।

गणेशजी की प्रतिमा का अवशेष यह प्रमाणित करता है कि गुप्तकाल तक गजमस्तक वाले इस देवता का सृजन व पूजन आरंभ हो चुका था। संभवतः गणेश की यह प्रतिमा उनकी सबसे पुरानी प्रतिमाओं में से एक है। इस काल से पहले गणेश की प्रतिमा का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता ।

एक मूर्ति के ऊपर सन् ४०२ ई. का अभिलेख इन गुफाओं की प्राचीनता को प्रमाणित करती है। गुफा स्थित शिलालेख इस प्रकार है --

पहली पंक्ति

सिद्धं ।। संवासरे ८०२ आषाढ़ मासे शुक्ले ( क्लै ) कादश्यां परम भट्टारक महाराधि ...( राज ) श्री चंद्र....( गु )प्त पादानुध्यातस्य

दूसरी पंक्ति

महाराज छयलग पोत्रस्य महाराज विष्णुदास पुत्रस्य सन करनी कस्य महा ....( राज ) .....( ढ़ ) लस्यायं देय धम्र्मः

( अर्थात सिद्धों की नमस्कार । गुप्त सं. ८०२ के आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी में परम भट्टारक महाराजाधिराज श्री चंद्रगुप्त के चरणों की आराधना में रत महाराज छगलग के पौत्र तथा महाराज विष्णुदत्त के पुत्र सनकानि वंशीय महाराज .... धर्म में रत हैं। )


गुफा संख्या -७[संपादित करें]

इस गुफा में अब केवल दो द्वारपालों के चिंह अवशिष्ट हैं, जो गुफा संख्या ६ की भांति ही बनाये गये हैं।

प्राप्त शिलालेखों से पता चलता है कि यह एक शैव गुफा है। इस समय सम्राट चंद्रगुप्त अपने उत्कर्ष की चरण सीमा पर थे।


गुफा संख्या - ८[संपादित करें]

इस गुफा में कुछ भी शेष नहीं बचा है।


गुफा संख्या - ९, १० तथा ११[संपादित करें]

ये वैष्णव गुफाएँ हैं, जिनमें खड़े हुए विष्णु के अवशेष रह गये हैं।


गुफा संख्या - १२[संपादित करें]

यह भी वैष्णव गुफा है, जिसमें विष्णु की मूर्ति बनाई गई है तथा बाहर दो द्वारपाल हैं। वर्तमान में ये नष्ट हो चुके हैं।


गुफा संख्या - १३[संपादित करें]

पत्थर की लंबी व कटी हुई चट्टान से निर्मित, इस दालाननुमा गुफा का मुख उत्तर की ओर है। दालान पूर्व- पश्चिम मुखी है। इसके सामने से उदयगिरि पहाड़ी के ऊपर जाने का प्रमुख मार्ग है।

यह गुफा शेषशायी विष्णु की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। मूर्ति की लंबाई १२ फीट है तथा यह शेषनाग के कुंडली पर सोई हुई है। मूर्ति के सिर पर फारसी मुकुट, गले में हार, भुजबंध व हाथों में कंगन हैं। वैजयंतीमाला घुटनों तक लंबी है।

चूंकि पुराणों में विष्णु की स्पष्ट व्याख्या उस समय तक नहीं हो पायी थी, अतः यह मूर्ति, मूर्ति- निर्माण- कला की प्रारंभिक अवस्था विदित होती है। संभवतः यही कारण है कि कमल नाभि में ऊपर ब्रह्मा की मूर्ति नहीं दिखलाई पड़ती। उसके स्थान पर एक गोलाकार चक्र है, जिसपर एक मानवाकृति बनी है। हो सकता है कि यही ब्रह्मा की मूर्ति रही हो। नाभिबेल की मूर्ति के दाहिनी तरफ सात मूर्तियाँ और हैं। उनमें प्रथम मूर्ति, जो पक्षी रुप में है, गरुड़ की मूर्ति है तथा उन्य मूर्तियाँ विभिन्न देवी- देवताओं के हैं। विष्णु के नीचे स्थित एक बड़ी मूर्ति आराधना- मुद्रा में हैं, जो राजा की हो सकती है। मूर्ति के बाल यूनानी पद्धति में घुँघराले हैं।

गुफा के आस- पास व सामने वाली चट्टान पर शंख लिपि खुदी हुई है, जो संसार की प्राचीनतम लिपियों में से एक मानी जाती है।

गुफा संख्या १५ व १६[संपादित करें]

ये गुफाएँ खाली हैं। संभवतः मूर्तियाँ नष्ट कर दी गई हैं।

गुफा संख्या – १७[संपादित करें]

यह गुफा संभवतः गुफा संख्या ६ के बाद निर्मित ज्ञान पड़ती है। इसमें भी गुफा संख्या ६ की भांति दोनों तरफ द्वारपाल हैं, परंतु गणेश की मूर्ति में निखार आ गया है। उनके सिर पर मुकुट- सा बना हुआ है। इसके अलावा इसमें महिषासुरमर्दिनी की भी एक मूर्ति उत्कीर्ण की गई हैं।

गुफा संख्या - १८[संपादित करें]

यह गुफा अब खाली रह गई है।

गुफा संख्या – १९[संपादित करें]

यह गुफा उदयगिरि की गुफाओं में सबसे बड़ी है। इसके भीतर एक शिवलिंग है, लिसकी पूजा स्थानीय लोग आज भी करते हैं। ऊपर भीतरी छत पर कमल की आकृति अंकित है। बाहर की तरफ दोनों ओर द्वारपालों की दो बड़ी- बड़ी क्षरणयुक्त मूर्तियाँ हैं। उपलब्ध प्रमाणों से पता चलता है कि पहले बाहर की तरफ पत्थर का ही एक मण्डप रहा होगा, जो कलात्मक स्तंभों के सहारे टीका रहता होगा। ऊपर की तरफ एक सुंदर समुद्र मंथन का भी दृश्य उत्कीर्ण है। बीच में मंदराचल को वासुकी नाग के साथ बाँधकर एक ओर देवगण व दूसरी ओर असुरगण मंथन कर रहे हैं। दाहिनी ओर असुर लगे हुए हैं, जिनकी पीठ दिखलाई पर रही है तथा बांयी ओर देवगण वासुकी नाग को पकड़े हुए दिखलाये गये हैं। द्वार के चारों ओर अनेक प्रकार की लताएँ, बेलें, कीर्तिमुख व आकृतियाँ खुदी हुई हैं।

संभावित मण्डप में लगे खम्भे संभवतः पहाड़ी के ऊपर के अशोक महल के खण्डहरों पर बने गुप्त मंदिर के हैं। जब यह मंदिर नष्ट हो गया, तब उसी के खंभों को नीचे लाकर पुर्नप्रयोग कर लिया गया। मंदिर के मलवे से प्राप्त खंभों का इन खंभों से मेल खाना इस बात की प्रामाणिकता है।

गुफा में मिला शिलालेख इस प्रकार हैं --
  • नवो जीर्णोधारि
  • कन्हं प्रणमति
  • वीष्णु पादौ नित्यं।
  • संवत् १०९३ चंद्रगुप्तेन
  • कीर्तन कीर्तितः
  • पश्चात वीक्रमा
  • दिव्य राज्यः।

चंद्रगुप्त की कीर्ति को प्रकाशित करते हुए, पश्चात विक्रमादित्य के १०९३ संवत् ( सन् १०३६- ३७) में पुनर्निमाण किया।

भीतर खंभों पर भी कई नागरी लिपि में लेख लिखे हुए हैं, जो बाद में प्रभावशाली व्यक्तियों ने लिखवाये होंगे।

गुफा संख्या – २०[संपादित करें]

यह गुफा इस गिरि श्रेणी की अंतिम गुफा है। इसमें चार मूर्तियाँ हैं, जो कमलासनों पर विराजमान हैं। इसके चारों ओर आभामण्डल व ऊपर छत्र हैं। इसमें तीन मूर्तियों में नीचे की ओर, जो चक्र है उनके दोनों ओर दो सिंह आमने- सामने मुँह किये बैठे हुए हैं।

बायीं ओर की मूर्ति के पास एक शिलालेख के जो गुप्त संवत १०६ का है। संभवतः गुप्त सम्राटों के काल में पाया जाने वाला यह प्रथम लेख है। इसमें पार्श्वनाथ की मूर्ति की स्थापना का उल्लेख है, परंतु वर्तमान में इस मूर्ति का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।


इन २० गुफाओं के अलावा गिरि शिखर पर ध्वंसावशेष भी दिखते हैं। पूर्व- पश्चिम में १२७ फीट लंबा व उत्तर- दक्षिण में ७२ फीट चौड़ा यह स्थान कोई भव्य इमारत रहा होगा। महावंश के अनुसार युवावस्था में अशोक का निवास वाग्माला पर्वत का ही एक भाग है। अतः इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि वैस नदी के निकट स्थित यह स्थान अशोक का निवास- भवन था। जनश्रुतियों के अनुसार आज भी इसे अशोक का महल कहा जाता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियां[संपादित करें]