उदगमंदलम
| ऊटी உதகமண்டலம் ಉದಕಮಂಡಲ |
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| — शहर — | |||||||
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| समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०) | |||||||
| देश | |||||||
| राज्य | तमिलनाडु | ||||||
| जिला | नीलगिरि | ||||||
| महापौर | |||||||
| सांसद | |||||||
| जनसंख्या | ९३,९२१ (२००१ के अनुसार [update]) | ||||||
| क्षेत्रफल • ऊँचाई (AMSL) |
• २२१३ मीटर |
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विभिन्न कोड
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निर्देशांक: ऊटी या उटकमंडलम तमिलनाडु प्रान्त का एक शहर है। कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर बसा यह शहर मुख्य रूप से एक हिल स्टेशन के रूप में जाना जाता है। कोयंबतूर यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा है। सड़को द्वारा यह तमिलनाडु और कर्नाटक के अन्य हिस्सों से अच्छी तरह जुड़ा है परन्तु यहाँ आने के लिये कन्नूर से रेलगाड़ी ट्वाय ट्रेन द्वारा पहुँचा जा सकता है। ऊटी या उटकमंडलम तमिलनाडु प्रान्त में नीलगिरी की पहाडियो में बसा हुआ एक लोकप्रिय पर्वतीय स्थल है। उधगमंडलम शहर का नया आधिकारिक तमिल नाम है। ऊटी समुद्र तल से लगभग ७,४४० फीट (२,२६८ मीटर) की ऊचाई पर स्थित है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] इतिहास
नीलगिरी पर्वत चेर साम्राज्य का अन्श हुआ करते थे। फिर वे गन्गा सामराज्य के हाथों मे चले गये और फिर १२वीं शताब्दी में होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन के राज्य मे आ गये। उस के बाद नीलगिरी पर्वत मैसूर राज्य का हिस्सा बन गये जिस के टीपू सुलतान ने उन्हें १८वीं शताब्दी में अंग्रेजों के हवाले कर दिया।
पडोसी कोइम्बटोर जिले के गवर्नर, जॉन सुलिवान को यहाँ की आबो-हवा बहुत पसंद आने लगी और उसने स्थानीय जातियों (टोडा, इरुम्बा और बदागा) से जमीन खरीदनी शुरु कर दी।
अंग्रेजी राज के तहत इन पर्वतों का विकास बहुत तेजी से होने लगा क्योंकि ज्यादातर जमीन यहाँ अमीर अंग्रेजों की निजी संपत्ती थी। बाद में ऊटी को मद्रास प्रेसीडेंसी की ग्रीश्मकालीन राजधानी का दर्जा दे दिया गया।
[संपादित करें] पर्यटन उद्योग
नीलगिरी या नीले पर्वतों की पर्वतमाला मे बसा हुआ ऊटी प्रति वर्ष बडी तादाद में पर्यटको को आकर्शित करता है। सर्दियों के अलावा साल भर मौसम सुहाना ही रहता है। सर्दी के समय तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है। पर आज ये शहर अधिकाधिक औद्योगिकीकरण और पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रहा है।
घने वनस्पति, चाय के बागान और नीलगिरी के पेड यहा के पहाडों की विशेशता है। यहाँ कि प्राक्रितिक सुंदरता बनाये रखने के लिये पहाडों के कई हिस्सों को आरक्षित वन का दर्जा प्रदान किया गया है। इस कारण से शिविर क्षेत्र से बाहर शिविर लगाने के लिये खास अनुमति लेनी पड़ती है। ऊटी एक बिंदू की तरह पर्यटकों को आकर्षित करता है और फिर वे आसपास भी भ्रमण करते हैं।
इन्ही पहाडो़ में दूसरे छोटे शहर जैसे कुन्नूर और कोटागिरी भी हैं। ये शहर ऊटी से सिर्फ कुछ ही घंटों की दूरी पर हैं और इन का मौसम भी ऊटी जैसा ही है पर यहाँ कम पर्यटक है और दाम भी सस्ते हैं।
[संपादित करें] स्थानीय अर्थव्यवस्था
ऊटी जिला हेडक्वाटर भी है। ऐसे तो यहाँ की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर्यटन पे ही टिकी है, ऊटी आसपास के शहरों के लिये बाजा़र का काम भी करता है। अर्थव्यवस्था मूलतः क्रिषि पे निर्भर है। ठन्डे मौसम की वजह से यहाँ "अंग्रेजी सब्जियाँ" जैसे आलू, गाजर और गोभी उगाई जाती हैं। ऊटी म्यूनिसिपल बाजा़र में रोजना इन सब्जियों की नीलामी होती है।
[संपादित करें] पर्यटन आकर्षण
[संपादित करें] वनस्पति उद्यान
इस वनस्पति उद्यान की स्थापना 1847 में की गई थी। 22 हेक्टेयर में फैले इस खूबसूरत बाग की देखरख बागवानी विभाग करता है। यहां एक पेड़ के जीवाश्म संभाल कर रखे गए हैं जिसके बारे में माना जाता है कि यह 20 मिलियन वर्ष पुराना है। इसके अलावा यहां पेड़-पौधों की 650 से ज्यादा प्रजातियां देखने को मिलती है। प्रकृति प्रेमियों के बीच यह उद्यान बहुत लोकप्रिय है। मई के महीने में यहां ग्रीष्मोत्सव मनाया जाता है। इस महोत्सव में फूलों की प्रदर्शनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें स्थानीय प्रसिद्ध कलाकार भाग लेते हैं।
[संपादित करें] ऊटी झील
इस झील का निर्माण यहां के पहले कलक्टर जॉन सुविलिअन ने 1825 में करवाया था। यह झील 2.5 किमी. लंबी है। यहां आने वाले पर्यटक बोटिंग और मछली पकड़ने का आनंद ले सकते हैं। मछलियों के लिए चारा खरीदने से पहले आपके पास मछली पकड़ने की अनुमति होनी चाहिए। यहां एक बगीचा और जेट्टी भी है। इन्हीं विशेषताओं के कारण प्रतिवर्ष 12 लाख दर्शक यहां आते हैं। बोटिंग का समय: सुबह 8 बजे-शाम 6 बजे तक this is a beutifull place
[संपादित करें] डोडाबेट्टा चोटी
यह चोटी समुद्र तल से 2623 मीटर ऊपर है। यह जिले की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है। यह चोटी ऊटी से केवल 10 किमी. दूर है इसलिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां से घाटी का नजारा अदभूत दिखाई पड़ता है। लोगों का कहना है कि जब मौसम साफ होता है तब यहां से दूर के इलाके भी दिखाई देते हैं जिनमें कायंबटूर के मैदानी इलाके भी शामिल हैं।
[संपादित करें] आसपास दर्शनीय स्थल
[संपादित करें] मदुमलाई वन्यजीव अभ्यारण्य
यह वन्यजीव अभ्यारण्य ऊटी से 67 किमी. दूर है। यहां पर वनस्पति और जन्तुओं की कुछ दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं और कई लुप्तप्राय:जानवरों भी यहां पाए जाते है। हाथी, सांभर, चीतल, हिरन आसानी से देखे जा सकते हैं। जानवरों के अलावा यहां रंगबिरंगे पक्षी भी उड़ते हुए दिखाई देते हैं। अभ्यारण्य में ही बना थेप्पाक्कडु हाथी कैंप बच्चों को बहुत लुभाता है।
[संपादित करें] कोटागिरी
यह पर्वतीय स्थान ऊटी से 28 किमी. पूर्व में स्थित है। नीलगिरी के तीन हिल स्टेशनों में से यह सबसे पुराना है। यह ऊटी और कून्नूर के समान प्रसिद्ध नहीं है। लेकिन यह माना जाता है कि इन दोनों की अपेक्षा कोटागिरी का मौसम ज्यादा सुहावना होता है। यहां बहुत ही सुंदर हिल रिजॉर्ट है जहां चाय के बहुत खूबसूरत बागान हैं। हिल स्टेशन की सभी खूबियां यहां मौजूद लगती हैं। यहां की यात्रा आपको निराश नहीं करेगी।
[संपादित करें] कलहट्टी वॉटरफॉल्स
कलपट्टी के किनारे स्थित यह झरना 100 फीट ऊंचा है। यह वॉटरफॉल्स ऊटी से केवल 13 किमी. की दूरी पर है इसलिए ऊटी आने वाले पर्यटक यहां की सुंदरता को देखने भी आते हैं। झरने के अलावा कलहट्टी-मसिनागुडी की ढलानों पर जानवरों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती हैं जिसमें चीते, सांभर और जंगली भैसा शामिल हैं।
[संपादित करें] आवागमन
- वायु मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा कोयंबटूर है।
- रेल मार्ग
ऊटी में रेलवे स्टेशन है। मुख्य जंक्शन कोयंबटूर है।
- सड़क मार्ग
राज्य राजमार्ग 17 से मड्डुर और मैसूर होते हुए बांदीपुर पहुंचा जा सकता है। यह आपको मदुमलाई रिजर्व तक पहुंचा देगा। यहां से ऊटी की दूरी केवल 67 किमी.है।
[संपादित करें] खानपान
ऊटी में कई चाइनीज रेस्टोरेंट हैं लेकिन सबसे मशहूर है नीलगिरी पुस्तकालय के पास स्थित शिंकोज। कमर्शियल रोड पर बने कुरिंजी में दक्षिण भारतीय भोजन मिलता है।
[संपादित करें] खरीदारी
ऊटी चाय, हाथ से बनी चॉकलेट, खुशबूदार तेल और मसालों के लिए प्रसिद्ध है। कमर्शियल रोड पर हाथ से बनी चॉकलेट कई तरह के स्वादों में मिल जाएगी। यहां हर दूसरी दुकान पर यह चॉकलेट मिलती है। हॉस्पिटल रोड की किंग स्टार कंफेक्शनरी इसके लिए बहुत प्रसिद्ध है। कमर्शियल रोड की बिग शॉप से विभिन्न आकार और डिजाइन के गहने खरीदे जा सकते हैं। यहां के कारीगर पारंपरिक तोडा शैली के चांदी के गहनों को सोने में बना देते हैं। तमिलनाडु सरकार के हस्तशिल्प केंद्र पुंपुहार में बड़ी संख्या में लोग हस्तशिल्प से बने सामान की खरीदारी करने आते हैं।
[संपादित करें] यह भी देखें
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
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