उईग़ुर ख़ागानत

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उइग़ुर ख़ागानत
८२० ईसवी में दुनिया के नक़्शे पर उइग़ुर ख़ागानत (ऊपर-दाई तरफ़ ख़ाकी रंग में)

उइग़ुर ख़ागानत (उइग़ुर: ئورخۇن ئۇيغۇر خانلىقى, उरख़ुन उइग़ुर ख़ानलिक़ी; मंगोल: Уйгурын хаант улс, उइग़ुरिन ख़ान्त उल्स; चीनी: 回鶻, हुइहु; अंग्रेज़ी: Uyghur Khaganate), जिसे तोक़ुज़ ओग़ुज़ देश (Toquz Oghuz Country) भी कहा जाता था, एक तुर्की ख़ागानत (साम्राज्य) था जो ७४४ ईसवी से ८४८ ईसवी (यानि लगभग एक शताब्दी) तक चला। यह ओरख़ोन उइग़ुर क़बीले के सरदारों के अधीन एक क़बीलों का परिसंघ था।

उइग़ुरों का उभारना[संपादित करें]

सन् ७४२ ई में उइग़ुर, क़ारलूक़ और बसमिल क़बीले गोएकतुर्क ख़ागानत के विरुद्ध बग़ावत में उठे। ७४४ में बसमिलों ने गोएकतुर्क राजधानी ओतुगेन (Ötügen) और राजा ओज़मिश ख़ान (Özmish Khan) पर क़ब्ज़ा कर लिया। लेकिन उसी साल उइग़ुरों और क़ारलूक़ों ने आपसी सांठगांठ कर ली और मिलकर बसमिलों पर हमला कर दिया। बसमिलों के राजा का सिर क़लम कर दिया गया और पूरे क़बीले के लोगों को ग़ुलाम बनाकर या तो अन्य क़बीलों में बाँट दिया गया या चीनियों को बेच दिया गया। उइग़ुर सरदार अब इस नई ख़ागानत का ख़ागान बना और क़ारलूक़ उसके अधीन राज्यपाल बना। एक साल के अन्दर-अन्दर उइग़ुरों और क़ारलूक़ों में झड़पें शुरू हो गई और क़ारलूक़ों को मजबूरन अपनी ज़मीनें छोड़कर पश्चिम की ओर जाना पड़ा।[1]

समय के साथ-साथ चीन के तंग राजवंश को अपने क्षेत्र के अन्दर हो रहे विद्रोहों को कुचलने के लिए और दक्षिण से आक्रमण कर रही एक तिब्बती फ़ौज से बचने के लिए सन् ७५५ में उइग़ुरों की मदद मांगनी पड़ी। इस समझौते में एक चीनी राजकुमारी विवाह में उइग़ुरों को और एक उइग़ुर राजकुमारी विवाह में चीनियों को दी गई। चीन ने सन् ७५७ में उइग़ुरों को नजराने के तौर पर २०,००० रेशम के थान दिए, जो उस ज़माने में भारी क़ीमत रखते थे।[2]

सन् ७५८ में उइग़ुरों के ख़ागान, बयनचुर ख़ान, ने उत्तर में बसे किरगिज़ों के ख़िलाफ़ अभियान में उनके बहुत से व्यापारिक क़स्बे ध्वस्त किये और उनके ख़ान को मार दिया लेकिन उन्हें अपने अधीन न कर पाया। ७५९ में एक समारोह में अत्याधिक शराब पीने से बयनचुर ख़ान की मौत हो गई और उसका बेटा तेन्ग्री बोगु (Tengri Bögü) ख़ागान बना। वह चीन की विद्रोह कुचलने में मदद करता रहा और ७६२ में उइग़ुरों की सहायता से चीनी सफल हो गए। उइग़ुर-चीनी मित्रता संधि हुई। एक अभियान के दौरान तेन्ग्री बोगु ईरान से आये कुछ मानी धर्म के पुजारियों से मिला और उसने मानी धर्म अपनाकर उसे पूरी उइग़ुर ख़ागानत का राजकीय धर्म बना दिया। इस धर्म-परिवर्तन से राजदरबार में सोग़दाईयों का प्रभाव बढ़ गया। ७७९ में चीन में तंग राजवंश का एक नया सम्राट गद्दी पर बैठा। तेन्ग्री बोगु के सोग़दाई सलाहकारों ने उसे इस शासन-परिवर्तन का फ़ायदा उठाकर चीन पर आक्रमण करने के लिए उकसाया। कहा जाता है कि चीन के राजदूत ने फिर तेन्ग्री बोगु के चाचा तुन बग़ा तरख़ान (Tun Bagha Tarkhan) को विद्रोह के लिए भड़काया। उसने तेन्ग्री बोगु को मार डाला और उसके परिवारजन और सोग़दाई सलाहकारों समेत २,००० लोगों को मौत के घात उतार दिया। तुन बग़ा तरख़ान नया ख़ागान बना। उसने फिर से उत्तर के किरगिज़ों पर हमले कर के उन्हें अधीनता स्वीकारने पर मजबूर कर दिया।[3]

पतन[संपादित करें]

तुन बग़ा तरख़ान की मृत्यु ७८९ में हुई और उसके बाद उईग़ुर ख़ागानत कमज़ोर पड़ने लगी। उनपर तिब्बती और क़ारलूक़ दबाव डालने लगे और कुछ क्षेत्र हथिया लिया। दो-तीन ख़ागान आये इन्होने साम्राज्य ख़त्म होने से बचाया। उईग़ुर ख़ागानत के अंतिम शक्तिशाली ख़ागान का नाम तो पता नहीं लेकिन उसका राजसी नाम 'कुन तेंग्रिदे उलुग बुल्मीश अल्प कुचलुग बिलगे' था, जिसका मतलब 'सूर्य स्वर्ग में पैदा हुआ महान, विजयी, शक्तिशाली और विवेकशील' था। उसने ८२१ में हुए तिब्बती हमले को खदेड़ दिया और सोग़दा तक के व्यापार मार्ग सुव्यवस्थित करे। ८२४ में उसकी मृत्यु हुई और अस्थिरता का दौर आया। ८३९ में उस समय के ख़ागान को आत्म-ह्त्या करने पर मजबूर किया गया और कुरेबीर नामक एक मंत्री ने गद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया। ऊपर से एक सूखा आया, बीमारियाँ फैलीं और उस साल हुई भयंकर सर्दी में बहुत से मवेशी मारे गए जिनपर उईग़ुर अर्थव्यवस्था टिकी हुई थी। उत्तर से किरगिज़ों हमला कर दिया और उईग़ुर राजधानी जला डाली। उईग़ुर ख़ागानत ध्वस्त हो गई और उईग़ुर लोग मध्य एशिया में तित्तर बित्तर हो गए।

तोक़ुज़ ओग़ुज़[संपादित करें]

उईग़ुर ख़ागानत को बाद के मुस्लिम इतिहासकार तुर्की में 'तोक़ुज़ ओग़ुज़' (Toquz Oghuz) का नाम देते थे, जिसका मतलब 'नौ क़बीले' है। चीनी स्रोत भी 'जिउ शिंग' (jiu xing) बुलाते थे जिसका मतलब 'नौ (पारिवारिक) नाम' है। हो सकता है यह तिएले के मूल नौ क़बीलों की तरफ़ इशारा हो। लेकिन यह भी संभव है कि 'तोक़ुज़ ओग़ुज़' सिर्फ़ तिएले या उईग़ुर ही नहीं बल्कि सभी तुर्कों के लिए एक नाम रहा हो।[4]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. The Tibetan Empire in Central Asia: A History of the Struggle for Great Power Among Tibetans, Turks, Arabs, and Chinese During the Early Middle Ages, Christopher I. Beckwith, Princeton University Press, 1993, ISBN 978-0-691-02469-1, ... The Basmïl qaghan began his regime by decapitating the last qaghan of the Türk dynasty. The situation changed, however, when the Uyghurs and Qarluqs, along with Wang Chung-ssu, the T'ang Military Governor of Shuo-fang, killed the Basmïl qaghan and enslaved his people toward the end of 744. The Uyghurs then made their own leader qaghan over the Eastern Turks, and began oppressing the Qarluqs. As a result, the 'three-surnamed' Qarluq tribes migrated in 745 into the lands of the Western Turks ...
  2. The Turks in World History, Carter V. Findley, Oxford University Press, 2005, ISBN 978-0-19-517726-8, ... Women played critical roles in maintaining the Tang-Uyghur alliance at several critical moments. In 758, Princess Ningguo (Ningkuo) was married to El-Etmish Bilge Kaghan (747–59) ...
  3. History of civilizations of Central Asia: A.D. 750 to the End of the Fifteenth Century, M. S. Asimov, Motilal Banarsidass Publishers, 1999, ISBN 978-81-208-1595-7, ... Tun Bagha became annoyed and attacked and killed him and, at the same time, massacred nearly two thousand people from among the kaghan's family, his clique and the Sogdians ...
  4. Eurasian Crossroads: A History of Xinjiang, James A. Millward, Columbia University Press, 2007, ISBN 978-0-231-13924-3, ... The Goache or Gaoju people, ancestors of the Uyghurs ... were part of a confederation of many tribes known by the name Tiele ... Chinese sources have called this confederation jiu xing or 'Nine Surnames', which corresponds with the Turkic term 'Toqquz Oghuz' adopted by Muslim sources ... In the eighth-century Orkhon Inscriptions of the Eastern Turk khaghans, 'Toqquz Oghuz' is used in a way that suggests it meant the Turkic peple in a tribal sense broader than the political scope of Kok Turk - there were Toqquz Oghuz tribes that did not accept the political rule of the Turk khaghans ...