ई॰ एम॰ एस॰ नंबूदिरीपाट

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ई. एम. एस. नंबूदिरीपाट
E. M. S. Namboodiripad.jpg

कार्यकाल
५ अप्रैल १९५७ – ३१ जुलाई १९५९

कार्यकाल
६ मार्च १९६७ – १ नवंबर १९६९

जन्म १३ जून १९०९
पेरिन्ताल्माणणा, Madras Presidency, British India
मृत्यु 19 मार्च १९९८(१९९८-03-19) (उम्र 88)
राजनैतिक पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)
जीवन संगी आर्या अन्तर्ज्जनम
संतान २ पुत्र एवं २ पुत्री
As of अक्टूबर ३०, २००७
Source: Government of Kerala

ईलमकुलम मनक्कल शंकरन नंबूदिरीपाट (१३ जून, १९०९- १९ मार्च, १९९८) १९५७ में केरल में विश्व की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री थे। उनहोंने वाम दल में लोकतांत्रिक हौसले को जिंदा रखा और उस आंदोलन को प्रेरित किया जिससे केरल भारत का पहला पूर्ण साक्षर राज्य बन गया।

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सर्वश्रेष्ठ नेताओं में से एक, देश के प्रमुख मार्क्सवादी चिंतक और आधुनिक केरल के निर्माता एलमकुलम मनक्कल शंकरन नम्बुदिरीपाद की शख्सियत उच्चस्तरीय सैद्धांतिक कौशल और सक्रियता के संयोग से बनी थी। दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, भाषाशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति जैसे विविध अनुशासनों में नब्बे से ज़्यादा उल्लेखनीय पुस्तकों का योगदान करने से लेकर आधी सदी तक कम्युनिस्ट पार्टी की दिशा तय करने वाले ईएमएस का नाम उनके जीवन में ही देश की राजधानी से लेकर केरल के किसी भी मामूली गाँव तक में प्रसिद्ध हो चुका था। उन्हीं के नेतृत्व में चली ‘एक्य केरल’ मुहिम के कारण आज़ादी के बाद भाषाई आधार पर केरल का गठन हुआ। वे केरल के पहले और देश के पहले ग़ैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। केरल को गठजोड़ राजनीति का अगुआ बनाने में नम्बूदिरीपाद की ही प्रमुख भूमिका थी। आज अगर केरल देश का सर्वाधिक साक्षर और जागरूक प्रांत है तो इसका श्रेय ईएमएस के कार्यकाल में किये गये रैडिकल भूमि और शिक्षा-सुधारों को ही जाता है। 1968 में प्रकाशित नम्बूदिरीपाद की रचना 'आत्मकथा' आधुनिक मलयालम की सबसे बेहतरीन गद्य-कृति मानी जाती है। केरल में प्रगतिशील साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की शुरुआत और विकास में उनकी प्रमुख भूमिका थी। मलयाली समाज और राजनीति का गहन अध्ययन करके उन्होंने जाति-समस्या के प्रति द्वंद्वात्मक रवैया अपनाते हुए एक ख़ास तरह की मार्क्सवादी राजनीति का विन्यास तैयार किया। परिणामस्वरूप न केवल कम्युनिस्ट पार्टी को केरल के समाज में अपने कदम जमाने का मौका मिला, बल्कि पूरे मलयाली समाज में ही आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चल निकली।

जीवन परिचय[संपादित करें]

ईएमएस नम्बूदिरीपाद जन्म आज के मल्लापुरम ज़िले में पेरिंथलामन्ना तालुक के एलमकुलम गाँव में हुआ था। उनके पिता परमेश्वरन बड़े जमींदार थे। युवावस्था में नम्बूदिरीपाद जाति प्रथा के ख़िलाफ़ चलने वाले सुधार आन्दोलन की तरफ आकर्षित हुए। प्रगतिशील नम्बूदिरी ने युवक संगठन 'वाल्लुवानाडु योगक्षेम सभा' के पदाधिकारी के रूप में जम कर काम किया। जिस काल में अधिकांश कम्युनिस्ट सिद्धान्तकार भारतीय इतिहास को किताबी मार्क्सवादी खाँचे (आदिम साम्यवाद-दास प्रथा-सामंतवाद-पूँजीवाद) में फ़िट करके देखने की कोशिश कर रहे थे, नम्बूदिरीपाद ने अनूठी मौलिकता का प्रदर्शन करते हुए केरल की सामाजिक संरचना का विश्लेषण ‘जाति-जनमी-नेदुवाझी मेधावितम’ के रूप में किया। अपनी पहली उल्लेखनीय रचना 'केरला : मलयालीकालुडे मातृभूमि' (1948) में ईएमएस ने दिखाया कि सामाजिक संबंधों पर ऊँची जातियाँ हावी हैं, उत्पादन संबंध जनमा यानी ज़मींदारों के हाथों में हैं और प्रशासन की बागडोर नेदुवाझियों यानी स्थानीय प्रभुओं के कब्ज़े में है। ईएमएस की निगाह में अधिकांश जनता की ग़रीबी और पिछड़ेपन का कारण यही समीकरण था। अपने इसी विश्लेषण को आधार बना कर नम्बूदिरीपाद ने 1952 में 'द नैशनल क्वेश्चन इन केरला', 1967 में 'केरला : यस्टरडे, टुडे ऐंड टुमारो' और 1984 में 'केरला सोसाइटी ऐंड पॉलिटिक्स : अ हिस्टोरिकल सर्वे' की रचना की। अपने इसी विश्लेषण के आधार पर ईएमएस ने केरल में 'जाति-जनमी-नेदुवाझी मेधावितम' का गठजोड़ तोड़ने के लिए वामपंथ का एजेंडा भी तैयार किया, जिसके केंद्र में समाज सुधार और जाति-विरोधी आंदोलन था। ईएमएस ने ज़ोर दे कर कहा कि जातिगत शोषण ने केरल की नम्बूदिरी जैसी शीर्ष ब्राह्मण जाति तक का अमानवीकरण कर दिया है। उन्होंने ‘नम्बूदिरी को इनसान बनाओ’ का नारा देते हुए ब्राह्मण समुदाय के लोकतंत्रीकरण की मुहिम चलाई। इसी दौरान प्रचलित राष्ट्रवादी रवैये से हटते हुए ईएमएस के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने एक तरफ़ तो जाति-सुधार आंदोलनों और सवर्ण विरोधी आंदोलन को समर्थन दिया, और दूसरी तरफ़ जातिगत दायरे से परे जाते हुए वर्गीय और जन-संगठन खड़े किये। इस तरह कम्युनिस्ट शब्दावली में सामंतवाद विरोधी लोकतांत्रिक जनसंघर्षों की ज़मीन तैयार हुई। ईएमएस ने दक्षिण केरल की ट्रावणकोर और कोचीन रियासतों में सामंतवाद विरोधी संघर्ष और ब्रिटिश शासित इलाकों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का संश्रय तैयार किया। जाति-सुधार आंदोलन जब अपनी रैडिकल धार खो कर संकीर्ण दलबंदियों में फँसने लगे तो नम्बूदिरीपाद ने जनांदोलनों और जातिआंदोलनों को अलग-अलग करके देखना शुरू किया। पचास के दशक में उन्होंने पिछड़ी जातियों की जनता और पिछड़े समुदायों से निकले पूँजीपति वर्ग के बीच फ़र्क करके ज़बरदस्त बहस छेड़ दी जिसमें अंततः उन्हीं के निष्कर्षों को मान्यता मिली।

1939 की मालाबार टेनेंसी रिफ़ॉर्म कमेटी की रपट के साथ असहमति जताते हुए ईएमएस ने केरल में कृषि प्रश्न की मौलिक व्याख्या की। परिणामस्वरूप काश्तकारी सुधार के केंद्र में खेतिहर मज़दूरों और छोटे बँटाईदारों को प्रमुखता मिली। इसी दौरान नम्बूदिरीपाद ने 'अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द पीज़ेंट मूवमेंट इन केरल' (1943) की रचना की। 1957 से 1971 के बीच चले कृषि सुधारों के प्रमुख सिद्धांतकार के रूप में नम्बूदिरीपाद को पारम्परिक जनमी प्रणाली (ज़मींदारी) के ख़ात्मे का श्रेय जाता है। भूमि सुधारों के कामयाब होने के बाद बाज़ार की ताकतों के विस्तार पर भी उनकी निगाह गयी। इसका नतीजा खाड़ी के देशों से भेजी गयी रकम के कारण ज़मीन की कीमतों में आये असाधारण उछाल की मार्क्सवादी व्याख्या में निकला।

कम्युनिस्ट आन्दोलन में नबूदरीपाद का पदार्पण कांग्रेस-समाजवादी आन्दोलन के रास्ते हुआ था। 1931 कॉलेज शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले सत्याग्रह में कूद पड़े और जेल-यात्रा की। केरल में कांग्रेस-सोसलिस्ट पार्टी की नींव रखने के बाद 1934 में उसके अखिल भारतीय संयुक्त सचिव बने। केरल प्रदेश कांग्रेस के महासचिव के रूप में काम करते समय उनका परिचय मार्क्सवाद से हुआ। 1936 में उन्होंने अपने चार साथियों के साथ मिल कर केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। जमींदार परिवार में पैदा होने के कारण नम्बूदिरीपाद ने उत्तराधिकार में मिली सारी सम्पत्ति पार्टी को सौंप दी।

आज़ादी मिलने से ठीक पहले 1945 में नम्बूदिरीपाद ने 'अ करोड़ ऐंड अ क्वार्टर मलयाली' शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी। उस समय तक केरल की जनता कोचीन, ट्रावणकोर और मालाबार इलाकों में बँटी हुई थी। यह पुस्तिका ‘एक्य केरलम’ का आधार बनी। 1952 में 'द नेशनल क्वेश्चन इन केरला' लिख कर नम्बूदिरीपाद ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस रचना के ज़रिये उन्होंने उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के दौर में पनपी मलयाली अस्मिता की लोकतांत्रिक दावेदारी पेश की। 1957 में हुए केरल विधान सभा के लिए पहले आम चुनाव में नम्बूदिरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने ज़बरदस्त जीत हासिल की। देश के पहले ग़ैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री की हैसियत से उन्होंने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को बदल डाला। उनके नेतृत्व में हुए भूमि सुधारों, भूमि सुधारों, जन-स्वास्थ्य और वितरण प्रणाली की पुनर्रचना, न्यूनतम वेतन के प्रावधान और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था ने केरल समाज की तस्वीर बदलने की शुरुआत कर दी।

1959 में नेहरू की केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का विवादास्पद इस्तेमाल करते हुए ईएमएस की सरकार को भंग कर दिया। लेकिन 1967 में सात पार्टियों के गठजोड़ के नेता के तौर पर ईएमएस दोबारा सत्तारूढ़ हुए। इसी के बाद केरल की राजनीति कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले दो गठजोड़ों की प्रतियोगिता बनती चली गयी। पहले मुख्यमंत्री और फिर करीब डेढ़ दशक तक विधान सभा में विपक्ष के नेता के रूप में नम्बूदिरीपाद ने गठजोड़ राजनीति के व्यवहार और सिद्धान्त का शास्त्र रचा। भारतीय संसदीय राजनीति में आम तौर पर और कम्युनिस्ट आंदोलन में ख़ास तौर पर संयुक्त मोर्चे की रणनीति विकसित करने का पहलू उनके प्रमुख योगदान के तौर पर याद रखा जाएगा। नम्बूदिरीपाद ने विचारधारात्मक रूप से नास्तिक होते हुए भी केरल के मुसलमान और ईसाई समुदायों के साथ जीवंत संवाद बनाये रखने की परम्परा डाली। उनके गठजोड़ में [[मुसलिम लीग]] की मौजूदगी इसकी व्यावहारिक परिणति थी। केरल के प्रमुख लिबरेशन थियोलोजिस्ट और सीरियन चर्च के बिशप के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। नम्बूदिरीपाद की विशद रचना 'अ हिस्ट्री ऑफ़ इण्डियन फ़्रीडम स्ट्रगल' (1986) धारावाहिक रूप से पार्टी के मुखपत्र में प्रकाशित हुई थी।

1939 में मद्रास प्रांतीय विधान परिषद् के सदस्य का चुनाव जीतने के बाद कम्युनिस्ट-सक्रियता के कारण उन्हें दो बार (1939-42 और 1948-50) भूमिगत जीवन व्यतीत करना पड़ा। नम्बूदिरीपाद 1941 में कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य चुने गये और 1950 में पोलित ब्यूरो के। पार्टी के भीतर होने वाली बहसों में भाग लेते हुए उन्होंने भारतीय समाज और राज्य के प्रति पार्टी के रवैये का सूत्रीकरण किया। 1962 में उन्हें पार्टी का महासचिव चुना गया। 1964 में पार्टी का विभाजन होने पर वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गये और सातवीं कांग्रेस में नये दल की केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो की सदस्यता ग्रहण की। 1966 में उन्होंने 'इकॉनॉमिक ऐंड पॉलिटिक्स ऑफ़ इण्डियाज़ सोशलिस्टिक पैटर्न' और 1967 में 'इण्डिया अंडर कांग्रेस रूल' की रचना की। 1977 में वे माकपा के महासचिव बने और 1992 की चौदहवीं कांग्रेस में ख़राब स्वास्थ्य के कारण पद छोड़ने से पहले लगातार इसी पद पर काम किया। नम्बूदिरीपाद की अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं : 'द महात्मा ऐण्द द इज्म' (1958), 'कान्फ्लिक्ट्स ऐंड क्राइसिस' (1974), 'इण्डियन प्लानिंग इन क्राइसिस' (1974), 'नेहरू : आइडियॉलॅजी ऐंड प्रेक्टिस' (1988) और अस्सी के दशक में चार खण्डों में प्रकाशित 'कम्युनिस्ट पार्टी केरालिथल' (केरल में कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास)। 1998 में देहांत के ठीक पहले ईएमएस 'अ हिस्ट्री ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया फ़्रॉम 1920 टू 1998' पूरी करने में व्यस्त थे। बाद में यह रचना पार्टी के पत्र 'देशाभिमानी' में धारावाहिक प्रकाशित हुई।

संदर्भ[संपादित करें]

1. गोविंद पिल्लै (सम्पा.) (प्रकाशन जारी), ई.एम.एस. सम्पूर्ण कृतिकल (34 खण्ड), चिंता पब्लिशर्स, ए.के.जी. सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऐंड स्टडीज़, तिरुवनंतपुरम.

2. आई.एस. गुलाटी ऐंड टी.एम. थॉमस इसाक (1998), ‘ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद रेवोल्यूशनरी इकॉनॉमिक पॉलिटिकल वीकली, खण्ड 33, अंक 13.

3. ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद (1984), केरला : सोसाइटी ऐंड पॉलिटिक्स, नैशनल बुक सेंटर, नयी दिल्ली.

4. ई.एम.एस. (1984), द क्वेश्चन केरला, पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस, मुम्बई.