इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन

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इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन (आईयूआई) तकनीक सहज शब्दों में कहे तो कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रिया के माध्यम से नि:संतान दंपति भी संतान प्राप्त कर सकते है। बांझपन की स्थिति के लिए पुरुषों की शारीरिक कमियां भी उत्तरदायी है। जैसे उनके वीर्य में शुक्राणु संख्या की कमी, शुक्राणु के बाहर निकलने में बाधा, वीर्य में संक्रमण, शुक्राणु की गति में कमी आदि। इसके विपरीत महिलाओं में गर्भाशय का अविकसित होना, अंडाशय में कमी जैसे अंडाणु का न बनना अथवा गाँठ, गर्भाशय के मुख से संबंधित रोग, योनि का छोटा होना कुछ प्रमुख कारण है।

उपचार[संपादित करें]

आईयूआई तकनीक में फैलोपियन ट्यूब का सामान्य होना जरूरी है। इस विधि के तहत महिला को पहले ऐसी दवाएं दी जाती है, जिनके असर से उसमें अंडाणु ज्यादा बनने लगें। इससे गर्भ ठहरने के अवसर बढ़ जाते है। इसके बाद अल्ट्रासाउन्ड के माध्यम से इस बात का पता लगाते है कि माह के किस दिन अंडाणु निकलता है और इसे भी नियंत्रित करने के लिए एक ऐसा इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे ठीक ३६ घंटे बाद ही अंडाणु निकलता है। इससे यह अनुमान लगाना आसान होता है कि किस समय शुक्राणु को गर्भ में प्रवेश कराया जाए। इस अंडाणु निर्गम की जांच विधि को फॉलिक्युलर मॉनीटरिंग कहते हैं।

इस बीच पुरुष के शुक्राणु को लेकर उसे सही तरह से साफ कर लिया जाता है और विशेष तकनीक से उसे गाढ़ा किया जाता है। इससे शुक्राणु की गुणवत्ता और गतिशीलता बढ़ जाती है। अंडाणु निकलने के समय इस शुक्राणु को गर्भ में डाला जाता है। ऐसे में गर्भ ठहरने के अवसर ४० से ६० प्रतिशत तक होते है। आईयूआई तकनीक का प्रयोग उस समय भी किया जाता है, जबकि पुरुष में शुक्राणु बिल्कुल नहीं होते अथवा दवा के प्रयोग करने के बाद भी उनकी संख्या नहीं बढ़ती। ऐसे में किसी डोनर के शुक्राणु का प्रयोग किया जाता है। शुक्राणु को अंदर डालने के बाद एक निश्चित अवधि के अंतराल पर बराबर देखना पड़ता है कि शुक्राणु से अंडाणु मिला या नहीं? अगर नहीं मिलता है तो फिर दोबारा इस प्रक्रिया को करना पड़ता है। शुक्राणु का गर्भाधान कराने के पश्चात 'ल्यूटीयल सपोर्ट' के लिये दवाएं दी जाती है और महिला को आराम करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया के १२ से १६ दिन के अंदर गर्भाधान को सुनिश्चित किया जाता है।

संदर्भ[संपादित करें]

बाहरी सूत्र[संपादित करें]