आज़ादी बचाओ आन्दोलन

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आजादी बचाओ आन्दोलन की मानव शृंखला

आजादी बचाओ आन्दोलन भारत का एक सामाजिक-आर्थिक आन्दोलन है। यह भारत विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उपभोक्ता सामग्री के क्षेत्र में प्रवेश का विरोध करता है। इसके अलावा भारत में पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभावों के प्रति भी लोगों को सचेत करता है।

यह नई आजादी उद्घोष नामक एक पत्रिका भी निकालता है। श्री राजीव दिक्षित, डा॰ बनवारी लाल शर्मा आदि इसके प्रखर वक्ता हैं जो देश भर में भ्रमण करते हैं और विभिन्न आर्थिक-सामाजिक विषयों पर भाषण देते हैं। इसके अतिरिक्त यह संस्था आम लोगों एवं विद्यार्थियों के साथ मिलकर बहुराष्ट्रिय कम्पनियों के विरुद्ध आन्दोलन एवं विरोध प्रदर्शन भी करती है| इसने विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियोंके विरुद्ध विभिन्न न्यायालयों में कई याचिकायें दायर की जिसमें कई में इनके पक्ष में निर्णय भी आये।

पेप्सी एवं कोक का यह विशेष विरोध करते हैं।

स्थापना[संपादित करें]

8 जनवरी 1992 को महाराष्ट्र के वर्धा नामक शहर में हुई एक बैठक से 'आजादी बचाओ आंदोलन' का सूत्रपात हुआ। आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार श्री बनवारी लाल शर्मा और श्री राजीव दीक्षित इससे पहले भोपाल गैस त्रासदी की जिम्मेदार अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के विरूद्ध लोक स्वराज अभियान चला रहे थे। आजादी अर्थात् आर्थिक व सांस्कृतिक आजादी और इसको बचाने के लिए विभिन्न गतिविधियां प्रारंभ की गईं।

कार्य[संपादित करें]

सबसे प्रमुख काम जन प्रबोधन का था और इसके लिए विपुल साहित्य और आडियो विडियो कैसेट बनाए गए। विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान, प्रशिक्षण शिविर आदि शुरू किए गए। स्थानीय स्तर पर स्वदेशी वस्तुएं मिल सकें, इसके लिए स्वदेशी भंडार खोलने के प्रयत्न प्रारंभ हुए। धीरे-धीरे आजादी बचाओ आंदोलन का काम भी बढ़ा और लोगों में ग्राह्यता भी। आज देश के 12 प्रदेशों में 1500 तहसील स्तरीय और 300 जिलास्तरीय इकाइयां हैं। 118 गांवों को पूरी तरह स्वदेशी गांव के रूप में विकसित किया गया है जहां न केवल पेप्सी कोला, कोलगेट जैसी विदेशी कंपनियों के उत्पाद ही बिकने बंद हैं, बल्कि खेती भी देशी पद्धति से और रासायनिक खादों व संकर बीजों के बिना की जाती है। साथ ही आंदोलन ने गुणवत्ता के लिए आई। एस.आई। के समान अपना एक ब्रांड विकसित किया है – स्वानंद। स्वानंद अर्थात् स्व (स्वदेशी) का आनंद। आंदोलन द्वारा चलाए जा रहे स्वदेशी भंडारों को भी स्वानंद भंडार ही कहा जाता है। प्रतिवर्ष आंदोलन द्वारा 4-5 बड़े प्रशिक्षण वर्ग लगाए जाते हैं। आजादी बचाओ आंदोलन समाचार नामक एक साप्ताहिक का भी प्रकाशन किया जाता है।

चूंकि भारत कृषि आधारित देश है, इसलिए आंदोलन ने भी कृषि को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता माना है। इसके तहत किसानों को देशी पद्धति से खेती करने की प्रेरणा दी जाती है। रासायनिक खादों की बजाय जैविक खाद, केंचुआ और गोबर खाद आदि का उपयोग करने, खेती के साथ पशुपालन को जोड़ने पर आंदोलन विशेष जोर देता है। आंदोलन की दूसरी प्राथमिकता है, गांव-गांव में स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन। इसके तहत आंदोलन ने बिना सरकारी अनुदान के ही उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली और सस्ती खादी बनाने में सफलता पाई है। स्वदेशी उत्पादों का वितरण तीसरी प्राथमिकता है। आंदोलन की चौथी प्राथमिकता है, देशी चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देना।

इस प्रकार गत 13 वर्षों में आंदोलन ने जन प्रबोधन के विपुल प्रयत्न किए हैं, वहीं स्वदेशी उत्पादों के निमार्ण और वितरण हेतु भी काफी काम खड़ा किया है। स्वदेशी उत्पाद की उपलब्धता के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री राजीव दीक्षित से भारतीय पक्ष की वार्ता के संपादित अंश।

उपलब्धियाँ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]