आँगन के पार द्वार
| आँगन के पार द्वार | |
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| लेखक | अज्ञेय |
| देश | भारत |
| भाषा | हिंदी |
| विषय | साहित्य |
| प्रकाषक | भारतीय ज्ञानपीठ |
| प्रकाषन कि तिथी | |
| पन्नें | ७९ |
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार अज्ञेय के अपने इस संग्रह आँगन के पार द्वार तक आते-आते उनका काव्य निखार और गहराई के ऐसे उत्कर्ष तक पहुँचा है, जिसमें भारतीय चिन्तन-परम्परा की विश्व से संयोजन की क्षमता साकार हो उठी है। इस दृष्टि से यह संग्रह हिन्दी-काव्य की अद्वितीय उपलब्धि है। इस कृति ने यह सिद्ध कर दिया है कि अज्ञेय प्रश्न छेड़ने में नहीं, उत्तर पाने में भी कुशल हैं। यह जरूर है कि ये उत्तर उन्होंने बाहर से नहीं भीतर से पाये हैं। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से अलंकृत आँगन के पार द्वार नयी कविता की ही नहीं, आधुनिक हिन्दी कविता की अत्यन्त प्रांजल और प्रौढ़ उपलब्धि है।[1]
आँगन के पार द्वार’ भीतर की ओर जितना खुलता है, उतना ही बाहर की ओर। अज्ञेय की अन्तःसलिला का यह सबसे स्फीत और श्रद्धापूत प्रवाह है। पर इसमें केवल उछली मछली की जिजीविषा भर नहीं, इसमें है दाता सागर का, धरती का, और है उस दाता का खुलापन। इस संग्रह की अन्तिम कविता असाध्य वीणा इस अन्तस और बाह्य जगत की एकाकारता का सबसे सजीव चित्र है। यदि चक्रान्त शिला की पन्द्रह कविताओं में मौन के माध्यम से विराट से जुड़ने की प्रक्रिया है और वात्सल्य भाव से सहलाती एक दीठ है तो उसके बाद वाली कविताओं में परिपक्व और परिष्कृत चित्र का विनय और अर्पण का उत्कर्ष भी। इस संग्रह तक आते-आते अज्ञेय का काव्य निखार और गहराई के ऐसे उत्कर्ष पर पहुँचा है, जिसमें भारतीय चिन्तन परम्परा की विश्व से संयोजन क्षमता साकार हो उठी है। इस दृष्टि से यह संग्रह हिन्दी काव्य की अद्वितीय उपलब्धि है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आँगन के पार द्वार नयी कविता की ही नहीं, आधुनिक हिन्दी कविता की अत्यन्त प्रांजल और प्रौढ़ उपलब्धि है।
[संपादित करें] संदर्भ
- ↑ अज्ञेय (१९९८). आँगन के पार द्वार. दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन. प॰ ४.
