अहंकार

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अहंकार या गर्व है अधिक महत्वपूर्ण होने की इच्छा।

अहं भाव का आत्मरूप ही देवत्व[संपादित करें]

अहंकार है‘‘अंतश्चतुष्ट्य’’मन, चित्त, बुद्धि के मध्यस्थ का अवयव जो करता है अंतश्शत्रु का मुकाबला

रामायण काल में दो बलिष्ट पात्र हनुमान और रावण हैं, रावणं अहंकारी है- ‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है, दानव मय इंद्र कुबेर बरुण इन बाणों से थर्राया है।’ यानी सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान जी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते हैं-‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन वधि विपिन उजारा, सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुताई।’ निमित्तमात्र जीव अहंकार में जो सोचता है, बोलता है, जो करता है, यानी मनसा वाचा कर्मणा जो भी है वह स्वयं के अस्तित्व मंे ईश्वरीय सत्ता के महत्व को नहीं समझता। वास्तव में ‘मैं’ यानी देह में देही यानी आत्मा की सत्ता है। अहं (मेैं) को आत्मतत्व में विलीन करना होगा। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार अंतश्चतुष्ट्य में क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आते हैं। ‘अहं’ मन, बुद्धि और चित्त से ऊपर है। फिर उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। जैनदर्शन मन को नियंत्रित कर इंद्रियों को जीतने की बात करता है। यानी मन रूपी अरि का हनन की आध्यात्मिक दृष्टि में अरिहंत कहा गया। बौद्धदर्शन बुद्धि के अस्तित्व को श्रेष्ठता प्रदान कर नित्यानित्य का भेद करने वाले विवेक से काम लेता है, बुद्धि से ही जरा मरण से अलग हो सकते हैं। ये दोनों दर्शन कर्मसिद्धांत के आधार पर क्रमशः मन-बुद्धि पर नियंत्रण को तत्वज्ञान मानते हैं, जबकि योग दर्शन चित्त पर अंकुश लगाता है। ‘‘योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः’’ चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण की योग है। यहां भी कर्म सिद्धांत ही है- ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्।’’ चैथा निर्गुण तत्व अहंकार है। जिस पर सभी दर्शन मन, बुद्धि और चित्त से अलग सोच न रखकर सिर्फ अहंकार से आच्छादित मन को जीतने में विश्वास रखते हैं, यदि मन से अहं निकल जाये तो समझो हम जिन हो गये यानी जीत गये। इसी तरह बुद्धि और चित्त से अहं को मिटाकर निरहंकार कर्म की कुशलता का पाठ पढ़ाया जाता है। क्या अहंकार मिट सकता है? मन बुद्धि चित्त जितने महत्वपूर्ण हैं। उतना ही महत्वपूर्ण अहं है। अहं यानी मैं जब तक ‘नाम-रूप’ यानी देह है, तब तक अहं के तत्व को नहीं समझा जा सकता। मैं देह नहीं, देही हूं। आत्मतत्व में अहं का एकात्म ही अहंकार का मूलतत्व है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ वह आत्मा ही मैं हूं। यानी वह परमात्मा मैं (जीवात्मा) हूं। सहज रूप में देही की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, कह रहा है या विचार कर रहा है वह अहं (मैं) कर रहा हूं। यानी ईश्वर कर रहा है अर्थात् ईश्वरीय सत्ता से हो रहा है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ जब तक मैं को शरीर तक सीमित माना गया। तब तक अहं रावण की तरह शक्ति को क्षीर्ण करने तत्व रहा। जब वही अहं आत्मतत्व में समाहित हुुआ तो हनुमानजी के लिए शक्ति संबर्द्धक हो गया और अहं ही देवत्व हो गया। -देवेश शास्त्री