अशाब्दिक संप्रेषण

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अशाब्दिक संप्रेषण (non-verbal communication /NVC) से तात्पर्य सामान्यतः शब्द रहित संदेशों को भेजने एवं प्राप्त करने की संप्रेषण प्रक्रिया से है। अर्थात् भाषा ही संप्रेषण का एकमात्र माध्यम नहीं है, कुछ अन्य माध्यम भी हैं। इस प्रकार के संप्रेषण के लिए 'अवाचिक संप्रेषण', 'वाचेतर संपेष्रण'; 'अशाब्दिक संचार' आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है।

अशाब्दिक संप्रेषण को शारीरिक हाव-भाव एवं स्पर्श (हैपटिक संप्रेषण), शारीरिक भाषा एवं भावभंगिमा, चेहरे की अभिव्यक्ति या आँखों के संपर्क से भी संप्रेषित किया जा सकता है। एन वी सी (NVC) को वस्तु सामग्री संप्रेषण यथा - वस्त्र, बालों की स्टाइल या स्थापत्य, प्रतीकोंचित्रों के माध्यम से भी संप्रेषित किया जा सकता है। आवाज या वाणी में पैरालैग्वेज नामक अशाब्दिक तत्व सम्मिलित होते हैं जिनमें आवाज की गुणवत्ता, भावना, बोलने के तरीके के साथ-साथ ताल, लय, आलाप एवं तनाव जैसे छन्द शास्त्र संबंधी लक्षण भी सम्मिलित हैं। नृत्य को भी अशाब्दिक संप्रेषण माना जाता है। इसी तरह, लिखित पाठ में भी अशाब्दिक तत्व होते हैं जैसे - हस्तलेखन तरीका, शब्दों की स्थान संबंधी व्यवस्था या इमोटिकॉन (emoticons) का प्रयोग.

हालाकि, अशाब्दिक संप्रेषण का अधिकतर अध्ययन आमने-सामने की अंतःक्रिया (बातचीत) पर ध्यान केन्द्रित करता है, जहाँ इसे तीन प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है - वातावरणिक दशायें जहाँ संप्रेषण घटित होता है, संप्रेषण का शारीरिक चरित्रचित्रण एवं अंतःक्रिया (बातचीत) के दौरान संप्रेषकों का व्यवहार.[1]

अनुक्रम

शाब्दिक बनाम मौखिक संप्रेषण[संपादित करें]

इस क्षेत्र के विद्वान "शाब्दिक" शब्द के सख्त अर्थ का प्रयोग करते हैं, जिसका मतलब "शब्द से संबंधित या का" है तथा वे मौखिक या बोले गये संप्रेषण के पर्यायवाची के रूप में "मौखिक संप्रेषण" प्रयोग नहीं करते. अतएव, मौखिक ध्वनियाँ जो कि शब्द नहीं मानी जातीं, जैसे कि घुरघुराना या शब्द रहित गायन या गुनगुनाना आदि अशाब्दिक हैं। संकेत भाषा तथा लेखन को सामान्यतः शाब्दिक संप्रेषण का रूप माना जाता है क्योंकि दोनों में शब्दों का इस्तेमाल होता है - यद्यपि वाणी की तरह दोनों में पैराभाषीय तत्व हो सकते हैं एवं जो प्रायः अशाब्दिक संदेशों में दिखलायी देते हैं। अशाब्दिक संप्रेषण किसी भी < माध्यम द्वारा हो सकता है।

जब हम बोलते (या सुनते) हैं तो हमारा ध्यान शारीरिक भाषा की जगह शब्दों पर होता है। लेकिन हमारे बारे में कोई भी निर्णय उक्त दोनों पर निर्भर है। एक दर्शक शाब्दिक और गैर शाब्दिक, दोनों संकेतों पर एक साथ ध्यान देता है। शरीर संचलन स्वयं में सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होते, अपेक्षाकृत इसके, स्थिति एवं संदेश ही मूल्यांकन को तय करेंगे."

इतिहास[संपादित करें]

अशाब्दिक संप्रेषण का प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन चार्ल्स डार्विन की पुस्तक द एक्सप्रेसन ऑफ द इमोशन इन मैन एंड एनिमल (1872) थी। उन्होंने तर्क दिया कि सभी स्तनपायी अपने चेहरे पर भावाभिव्यक्ति दर्शाते हैं। अब भाषा विज्ञान, संकेत विज्ञान एवं सामाजिक मनोविज्ञान सहित कई क्षेत्रों पर अध्ययन हो रहे हैं।

अनियंत्रित[संपादित करें]

हालाकि ज्यादातर अशाब्दिक संप्रेक्षण अनियंत्रित संकेतों पर आधारित हैं, जो कि संस्कृतियों के अनुसार पृथक-पृथक हैं, ज्यादातर हिस्सा कुछ हद तक मूर्ति सदृश (आइकॉनिक) है एवं वैश्विक रूप से समझा जा सकता है। चेहरे की अभिव्यक्ति के संबंध में पॉल एकमैन का 1960 के दशक का प्रभावपूर्ण अध्ययन यह निर्धारित करता है कि गुस्सा, घृणा, भय, प्रसन्नता, उदासी एवं आश्चर्य की अभिव्यक्ति सार्वभौमिक होती है।

वस्त्र एवं शारीरिक लक्षण वर्णन[संपादित करें]

वर्दियों के कार्यात्मक और अभिव्यक्तिशील दोनों उद्देश्य है। आदमी के कपड़े उसे एक पुरुष और एक पुलिस अधिकारी के रूप में पहचान देते हैं, उसके बैज और कंधे आस्तीन का पट्टा उसके काम और रैंक के बारे में जानकारी देते हैं।

बातचीत के दौरान शरीर बनावट, ऊँचाई, वजन, बाल, त्वचा रंग, लिंग, गंध एवं वस्त्र अशाब्दिक संदेश भेजते हैं। उदाहरण के लये, वियना, ऑस्ट्रिया में डिस्कोथैक जाने वाली महिलाओं द्वारा पहने गये कपड़ों पर किया गया अध्ययन[2] यह दर्शाता है कि महिलाओं के निश्चित समूह वर्ग में (विशेष रूप से ऐसी महिलायें जो अपने साथी के बिना शहर में थीं) सैक्स हेतु प्रोत्साहन एवं सैक्स संबंधी हार्मोनों का उनके वस्त्रों से सीधे संबंध था, विशेषकर अंग प्रदर्शन एवं बाहों इत्यादि पर पतले वस्त्रों की उपस्थिति. अतएव, कुछ हद तक वस्त्र प्रणय निवेदन की इच्छा के संकेत भेजते हैं।

कद के संबंध में किये गये अनुसंधान में सामान्यतः यह पाया गया है कि लंबे व्यक्ति ज्यादा प्रभावशाली माने गये हैं। मेलामेड एण्ड बोज़ियोनीलोस (1992) द्वारा यूनाइटेड किंगडम में किये गये प्रबंधकों के नमूनों के एक अध्ययन में यह पाया गया कि पदोन्नति में कद एक महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ है। प्रायः व्यक्ति अपने कद को बढ़ाने का प्रयास करते हैं, उदाहरण के लिये, जबकि वे बोलकर प्रभाव डालना चाहते हों.

भौतिक वातावरण[संपादित करें]

फर्नीचर, स्थापत्य कला, आंतरिक साज-सज्जा, रोशनी की दशा, रंग, तापमान, शोरगुल एवं संगीत जैसे वातावरणीय कारक बातचीत के दौरान संप्रेषक के व्यवहार पर प्रभाव डालते हैं। फर्नीचर, स्वयं में, एक अशाब्दिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है।[1]

प्रॉक्सीमिक्स: संप्रेषण में भौतिक जगह[संपादित करें]

प्रॉक्सीमिक्स वह अध्ययन है जिसमें यह पता लगाया जाता है कि किस तरह व्यक्ति अपने आसपास मौजूद भौतिक जगह को ग्रहण एवं प्रयोग करते हैं। किसी संदेश के प्रेषक एवं प्राप्तकर्ता के मध्य का स्थान संदेश की विवेचना को प्रभावित करता है।

अलग-अलग संस्कृतियों एवं उनके विभिन्न ढ़ाँचों में जगह को ग्रहण एवं उसे प्रयोग करना प्रमुखता से भिन्न है[3] अशाब्दिक संप्रेषण को मुख्यतः चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है - अन्तरंग, सामाजिक, व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जगह.

प्रॉक्सीमिक्स के अध्ययन में अभी भी 'प्रादेशिकता या क्षेत्रीयता' शब्द का प्रयोग व्यक्तिगत जगह के बारे में मनुष्य के व्यवहार की व्याख्या हेतु होता है।[4] हर्जी एण्ड डिकसन (2004, पृ. 69) ऐसे 4 क्षेत्र चिन्हित करते हैं:

  1. प्राथमिक क्षेत्र: इससे तात्पर्य ऐसे क्षेत्र से है जो कि किसी व्यक्ति विशेष से सीधे संबद्ध है। उदाहरण के लिये, एक घर जहाँ उसके स्वामी की अनुमति के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता.
  2. माध्यमिक क्षेत्र: पहले प्रकार के विपरीत, इसमें अधिग्रहण का कोई "अधिकार" नहीं है परंतु व्यक्ति किसी विशेष जगह पर कुछ हद तक स्वामित्व महसूस कर सकते हैं। उदाहरण के लिये, कोई व्यक्ति रोजाना ट्रेन की एक ही सीट पर बैठता है एवं यदि कोई और बैठ जाये तो व्यथित होता है।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र: यह ऐसा क्षेत्र होता है जो सभी के लिये उपलब्ध है परंतु एक निर्धारित समय के लिये जैसे कि पार्किंग या पुस्तकालय की जगह. यद्यपि व्यक्तियों का उस जगह पर सीमित दावा होता है परंतु वे अक्सर अधिक दावा करते हैं। उदाहरण के लिये, जब कोई अन्य व्यक्ति पार्किंग जगह की प्रतीक्षा में हो तो व्यक्ति पार्किंग जगह छोड़ने में अधिक वक्त लेते हैं।
  4. बातचीत क्षेत्र: यह अन्य लोगों द्वारा सृजित क्षेत्र है जब वे बातचीत कर रहें हों. उदाहरण के लिये, जब कोई समूह फुटपाथ पर बातचीत में मशगूल हो तो अन्य व्यक्ति उन्हें टोकने के बजाए समूह के बगल से निकल जायेंगे.

क्रॉनेमिक्स: संप्रेषण में समय[संपादित करें]

क्रोनेमिक्स, अशाब्दिक संप्रेषण में समय के प्रयोग का अध्ययन है। जिस तरह हम समय को महसूस करते हैं, समय को ढ़ाँचा बद्ध करते एवं प्रतिक्रिया करते हैं, वह दमदार संप्रेषण तरीका है तथा संप्रेषण हेतु मंच तैयार करने में सहायता करता है। समय की अनुभूति में समयबद्धता, इंतजार हेतु इच्छा, वाणी की गति एवं कब तक व्यक्ति सुनना चाहते हैं, सम्मिलित होता है। किसी कार्य का समय एवं आवृति के साथ-साथ बातचीत के अंतर्गत संप्रेषण की चाल एवं लय अशाब्दिक संदेशों की विवेचना में योगदान देते हैं। गुडीकस्ट एण्ड टिंग-टूमे (1988) ने 2 प्रभावी समय तरीकों को चिन्हित किया है:

एकल कालिक (मोनोक्रॉनिक) समय

मोनोक्रॉनिक समय प्रणाली से तात्पर्य है कि चीजें एक ही समय में होती हैं एवं समय को संक्षिप्त छोटी इकाईयों में बाँटा जाता है। इस प्रणाली के तहत समय को समयबद्ध, व्यवस्थित एवं प्रबंधित किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ को एक मोनोक्रॉनिक सोसाइटी माना जाता है। समय की इस अनुभूति की जड़े एवं समझ औद्योगिक क्रांति में निहित है, जहाँ "कारखाना जीवन में श्रमिकों को एक निर्धारित घंटे में स्थान पर उपस्थित होना आवश्यक है" (ग्युरेरो, डी वीटो एवं हैच, 1999, पृ. 238). अमेरिकी लोगों के लिये समय एक बहुमूल्य स्त्रोत है जिससे व्यर्थ नहीं करना चाहिये तथा हल्के में नहीं लेना चाहिये. "हम समय को क्रय करते, बचाते, खर्च करते एवं बनाते हैं। हमारे समय को वर्षों, महीनों, दिनों, घंटों, मिनटों, सेकेण्डों एवं मिलीसेकेण्डों में बाँट सकते हैं। भविष्य की योजना हेतु समय का प्रयोग हम अपने रोजमर्रा के जीवन एवं घटनाओं दोनों के लिये करते हैं। हमारे पास समय सीमा होती है जिसका हमें पालन करना चाहिये : हमें एक निश्चित समय पर मुलाकात करनी होती है, कक्षायें निश्चित समय पर प्रारंभ एवं समाप्त होती हैं, कार्य समय सीमा निश्चित समय पर प्रारंभ एवं समाप्त होती है एवं यहाँ तक कि पसंदीदा टी वी शो एक निश्चित समय पर प्रारंभ एवं समाप्त होते हैं।" [1]

एक संप्रेषण विद्वान के रूप में एडवर्ड टी हॉल ने बिजनेस वर्ल्ड में समय के बारे में अमेरिकी लोगों के नजरिये के बारे में लिखा है, "समय सीमा पवित्र है।" हॉल कहते हैं कि अमेरिकी संस्कृति जैसी मोनोक्रॉनिक संस्कृतियों हेतु, "समय वास्तविक है " एवं सामग्री के रूप में देखा जाता है जहाँ "समय धन है" या "समय बर्बाद हो गया". इस अनुभूति का परिणाम यह है कि अमेरिकी एवं अन्य मोनोक्रॉनिक संस्कृतियाँ, जैसे कि जर्मन एवं स्विस संस्कृतियों में समय सीमा, कार्यों एवं "कार्य संपन्न करने" को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। ये संस्कृतियाँ कठोर अनुशासित समय सीमा के प्रति समर्पित हैं एवं वे उन्हें अनादर की दृष्टि से देख सकती हैं जिनकी अनुभूति समय के बारे में उनके जैसी नहीं है।

मोनोक्रॉनिक संस्कृतियों में जर्मनी, कनाडा, स्विट्जरलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं स्कैनडीनीविया सम्मिलित हैं। [संपादन करें] पॉलीक्रॉनिक समय मुख्य लेख - पॉलीक्रॉनिसिटी

पॉलीक्रॉनिक समय प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है जहाँ कई चीजें एक साथ की जा सकती हैं एवं समय सीमा निर्धारण में अधिक तरल तरीका प्रयोग होता है। अमेरिकी एवं ज्यादातर उत्तरी एवं पश्चिमी यूरोपीय संस्कृतियों के विपरीत लैटिन अमेरिकी एवं अरबी संस्कृतियाँ समय की पॉलीक्रॉनिक प्रणाली का प्रयोग करती हैं।

ये संस्कृतियाँ प्रत्येक क्षण एवं लम्हे के हिसाब-किताब की संक्षिप्तता पर कम ध्यान केन्द्रित करती हैं। पॉलीक्रॉनिक संस्कृतियाँ कार्य की बजाए परंपरा में अधिक गहरी ढली हुई हैं - जो कि उनके मोनोक्रॉनिक प्रतिरूपों से स्पष्ट रूप से विपरीत है। कोहेन टिप्पणी करते हैं कि, "विश्व में परंपरागत समाजों का पूर्ण समय होता है। घड़ी के चेहरे या समय के मनमाने बटवारे में ऐसी संस्कृतियों में थोड़ी प्रमुखता है जो कि मौसम के चक्रों में, ग्रामीण जीवन के अपरिवर्तनीय तौर-तरीकों एवं धार्मिक त्योहारों के कलेण्डर में बंधी हैं। " (कोहेन, 1997, पृ. 34).

इसके स्थान पर उनकी संस्कृति घड़ी को देखने के बजाए संबंधों पर अधिक केन्द्रित है। यदि वे अपने परिवार या मित्रों के साथ हैं तो उन्हें किसी कार्यक्रम में "देर" हो जाने की कोई समस्या नहीं है क्योंकि संबंध वास्तव में महत्व रखते हैं। परिणाम स्वरूप, पॉलीक्रॉनिक संस्कृतियों में समय के प्रति कम औपचारिक अनुभूति होती है। वे संक्षिप्त कलैण्डरों एवं समय सीमा द्वारा शासित नहीं होते. इसके विपरीत, "पॉलीक्रॉनिक समय प्रणाली का प्रयोग करने वाली संस्कृतियाँ प्रायः एक साथ एकाधिक मुलाकातें तय करती हैं अतः समय का पालन असंभव हो जाता है।" [2]

पॉलीक्रॉनिक संस्कृतियों में, सऊदी अरब, मिश्र, मैक्सिको, फिलीपींस, भारत एवं कई अफ्रीकी देश शामिल हैं।

संचलन एवं शरीर स्थिति[संपादित करें]

काइनेसिक्स[संपादित करें]

इन दो स्केटिंग करने वालों के संबंध और प्रभाव के बारे में जानकारी उनकी शरीर मुद्रा, निगाह और शारीरिक संपर्क द्वारा व्यक्त की जाती है।

इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग (वर्ष 1952 में) मानव विकास विज्ञानी रे बर्ड विहिस्टैल द्वारा किया गया था जो यह जानना चाहते थे कि व्यक्ति किस तरह मुद्राओं, भाव भंगिमाओं, तरीकों एवं संचलन के द्वारा संप्रेषण करते हैं। बर्ड विहिस्टैल के कार्य का कुछ अंश संप्रेषण के विभिन्न स्तरों को दर्शाने हेतु सामाजिक स्थितियों में व्यक्ति की फिल्म बनाने एवं विश्लेषण में संलग्न रहा है, जो कि अन्यथा स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं देगा. इस अध्ययन में मार्ग्रेट मीड एवं ग्रेगरी बेटसन सहित कुछ मानव विकास विज्ञानी भी शामिल हुये.

शारीरिक मुद्रा[संपादित करें]

शारीरिक मुद्रा का प्रयोग एक प्रतिभागी की तल्लीनता या संलिप्तता की मात्रा के निर्धारण, संप्रेषकों की स्थितियों के मध्य अंतर, अन्य संप्रेषक के प्रति एक व्यक्ति के मन में स्नेह के निर्धारण हेतु किया जा सकता है।[5] अंतर्वैयक्तिक संबंधों पर शारीरिक मुद्रा के प्रभाव के बारे में किये गये अध्ययन यह बताते हैं कि दर्पण छवि मुद्रा के समरूप होती है, जहाँ एक व्यक्ति का बाँया भाग अन्य व्यक्ति का दायां होता है, जिससे संप्रेषक एवं सकारात्मक वाणी की अनुकूल अनुभूति होती है ; एक व्यक्ति जो आगे की ओर झुकाव एवं पीछे की ओर झुकाव में कमी दर्शाता है, संप्रेषण के दौरान सकारात्मक भावनायें सूचित करता है।[6] मुद्रायें इन सूचकों द्वारा समझी जाती हैं - झुकाव की दिशा, शरीर उन्मुखीकरण, बाहों की स्थिति एवं शरीर का खुलापन.

हावभाव[संपादित करें]

एक झपकी एक तरह का इशारा होता है।

हावभाव से तात्पर्य गैर मौखिक शारीरिक संचलन से है जो कि अर्थ को अभिव्यक्त करता है। ये हाथ, भुजाओं या शरीर से जुड़े हो सकते हैं, एवं इनमें सिर, चेहरा तथा आँखों के संचलन भी शामिल होते हैं जैसे कि आँख मिचकाना, झपकाना एवं गोल करना. भाषा एवं हावभाव या शाब्दिक तथा अशाब्दिक संप्रेषण के मध्य की सीमा को चिन्हित करना कठिन हो सकता है।

यद्यपि हावभाव का अध्ययन अभी प्रांरभिक अवस्था में है, अनुसंधानकर्ताओं ने हावभावों की कुछ विस्तृत श्रेणियाँ चिन्हित की हैं। सर्वाधिक सुपरिचित तथा कथित प्रतीकात्मक या उद्धरण योग्य हावभाव हैं। ये परंपरागत एवं संस्कृति विशिष्ट हावभाव हैं जिनका प्रयोग शब्दों के स्थान पर किया जा सकता है जैसे कि "हलो" एवं "गुडबाय" के स्थान पर हाथ को हिलाना. एक अकेला प्रतीकात्मक हावभाव के विभिन्न सांस्कृतिक संदर्भों में प्रशंसा सूचक से लेकर अपमानजनक तक विभिन्न महत्व का हो सकता है। (9) हावभावों की पेज सूची में एक हाथ, दो हाथों, हाथ एवं शरीर के अन्य भागों, तथा शरीर एवं चेहरे के हावभावों द्वारा बने प्रतीकात्मक हावभावों की चर्चा की गयी है।

हावभावों की अन्य विस्तृत श्रेणी में वे हावभाव शामिल हैं जो हमारी बातचीत के दौरान सहसा प्रयोग होते हैं जो हमारी बातचीत के दौरान सहसा प्रयोग होते हैं। ये हावभाव, वाणी के साथ नजदीकी समन्वय रखते हैं। ये तथाकथित बीट हावभाव का प्रयोग वाणी के साथ किया जाता है एवं निश्चित शब्दों एवं मुहावरों पर जोर देने के लिये वाणी की गति के साथ समय बचाता है। इस तरह के हावभाव वाणी और चिंतन प्रक्रिया के साथ अभिन्न रूप से संबद्ध होते हैं।[10] अन्य सहसा हावभाव का प्रयोग तब होता है, जब हम ज्यादा सारगर्भित बोलते हैं एवं यह साथ ध्वनित होने वाली वाणी के अर्थ को ध्वनित या विस्तृत कर सकता है। उदाहरण के लिये, ऐसा हावभाव जो फेंकने के कार्य को चित्रित करता है, बोलचाल के साथ ही घटित हो सकता है, "उसने गेंद को सीधे खिड़की पर फेंका." [10]

हावभाव की भाषा जैसे कि अमेरिकी चिन्ह भाषा एवं इसके क्षेत्रीय रूप, एक पूर्ण प्राकृतिक भाषा के रूप में कार्य करते हैं, जो कि अपनी रीति में हावभाव की है। इन्हें अंगुली वर्तनी नहीं मान लेना चाहिये, जिसमें कि प्रतीकात्मक हावभावों का लिखी गयी वर्णमाला को दर्शाने के लिये प्रयोग होता है।

हावभावों को वाणी-स्वतंत्र एवं वाणी-संबद्ध के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। वाणी-स्वतंत्र हावभाव सांस्कृतिक रूप से स्वीकृत विवेचना पर निर्भर हैं तथा इनका प्रत्यक्ष शाब्दिक अनुवाद होता है।[7] हाथ हिलाते हुये हलो या शांति चिन्ह वाणी-स्वतंत्र हावभावों के उदाहरण हैं। वाणी संबद्ध हावभाव का प्रयोग शाब्दिक वाणी के साथ किया जाता है; अशाब्दिक संप्रेषण के इस रूप का प्रयोग कहे जा रहे संदेश पर जोर देने के लिये किया जाता है। वाणी-संबद्ध हावभावों का लक्ष्य एक शाब्दिक संदेश के बारे में अनुपूरक सूचना प्रदान करना होता है जैसे कि विचार विमर्श के लक्ष्य की ओर इशारा करना.

हावभाव जैसे कि मुद्रा (संस्कृत) नव शिक्षुओं के लिये परिष्कृत सूचना को कूट बद्ध करती है जो कि अपनी परंपरा में कूट बद्ध तत्वों की बारीकी के प्रति गुप्त हैं।

हैपटिक्स: संप्रेषण में स्पर्श[संपादित करें]

हैपटिक संप्रेषण वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य एवं अन्य जीव स्पर्श के द्वारा संप्रेषण करते हैं। मनुष्यों के लिये स्पर्श एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण इंद्रिय ज्ञान है; साथ ही साथ, सतहों तथा बनावट के बारे में सूचना उपलब्ध कराते हुये यह अंतर्वैयक्तिक संबंधों में अशाब्दिक संप्रेषण का एक अवयव है एवं शारीरिक नजदीकी को सूचित करने में महत्त्वपूर्ण है। यह यौन संबंधी (जैसे कि चुंबन) एवं कामवासना रहित (जैसे कि गले लगाना या गुदगुदाना) हो सकते हैं।

गर्भ में सबसे पहले स्पर्श इंद्रिय ज्ञान विकसित होता है। नवजात शिशु के हैपटिक इंद्रिय ज्ञान का विकास एवं यह कैसे दृष्टि जैसे अन्य इंद्रिय ज्ञानों के विकास से संबद्ध है, ज्यादातर अनुसंधानों का लक्ष्य रहा है। मनुष्य के बच्चों के द्वारा स्पर्श इंद्रिय ज्ञान न समझ पाने की स्थिति में उनके जीवित रहने में कठिनाई पायी गयी है, भले ही वे देख व सुन लेते हों. ऐसे बच्चे जो स्पर्श समझ लेते हैं, भले ही वे देख व सुन न पायें, कहीं बेहतर विकसित होते हैं। ज्यादातर जीवन स्वरूपों में स्पर्श को आधारभूत इंद्रिय ज्ञान माना जा सकता है, कुछेक में दृष्टि और श्रावण को. [आव्हान की आवश्यकता है]

चिंपाजियों में स्पर्श इंद्रिय ज्ञान अत्यधिक विकसित होता है। नवजात शिशु ठीक से देख और सुन नहीं पाते परंतु वे अपनी माँ से मजबूती से लिपटते हैं। हैरी हार्लो ने रीशस बंदरों को लेकर विवादास्पद अध्ययन किया एवं पाया कि बंदर एक "टैरी क्लॉथ मदर " के पीछे-पीछे चल दिये, जिसमें तार आपूर्ति करने वाले उपकरण के मुलायम वस्त्र में लपेटे गये थे जिसने एक स्तर तक स्पर्शनीय उत्तेजना एवं आराम प्रदान किया, केवल वायर मदर के साथ की तुलना से भावनात्मक रूप से वयस्कों की तरह अधिक स्थिर थे। हर्लो, 1958)

स्पर्श को अलग-अलग देशों में अलग नजरिये से देखा जाता है। हर संस्कृति में सामाजिक रूप से स्वीकृत स्पर्श की अलग सीमा है। थाई संस्कृति में, किसी का सिर स्पर्श करना अभद्र माना जा सकता है। रेमलैण्ड एवं जोन्स (1995) ने संप्रेषण करते हुये समूह का अध्ययन किया एवं पाया कि इंग्लैंड (8%), फ्राँस (5%) एवं नीदरलैंड (4%) में इटली (14%) तथा यूनान (12.5%) की तुलना में कम स्पर्श किया जाता है।[आव्हान की आवश्यकता है]

शारीरिक रूप से कष्ट पहुँचाने के संदर्भ में ठोकर मारना, धक्का देना, खींचना, चुभाना, पैर से मारना, गला दबाना एवं हाथों से लड़ना आदि स्पर्श के रूप हैं। "मैंने उसे कभी स्पर्श नहीं किया" या "उसे स्पर्श करने की हिम्मत नहीं करना" जैसे वाक्यों में स्पर्श शब्द का तात्पर्य शारीरिक रूप से कष्ट पहुँचाने या यौन संबंधी स्पर्श के लिये मधुरता से बोले गये शब्द मानना चाहिये. 'अपने आप को स्पर्श करना' हस्तमैथुन के लिये मधुरता से बोला गया वाक्य है।

स्पर्श शब्द के कई अन्य रूपक प्रयोग हैं। कोई भी व्यक्ति ऐसे कार्य या वस्तु को संदर्भित करते हुये भावुक हो सकता है जो भावनात्मक प्रतिक्रिया को उद्दीपित करती है। यह कहना कि "मैं तुम्हारे पत्र से भावुक हो गया", से तात्पर्य है कि पाठक को पत्र पढ़ते समय गहरी भावनाओं की अनुभूति हुई. सामान्यतः इसमें गुस्सा, घृणा या अन्य प्रकार की भावनात्मक अस्वीकृति शामिल नहीं होती जब तक कि व्यंग्यात्मक रूप में प्रयोग न किया गया हो.

स्टोइलजे (2003) ने लिखा है कि किस तरह अमेरिकी इस महत्त्वपूर्ण संप्रेषण कौशल से 'दूर' हो रहे हैं। मियामी विश्वविद्यालय, औषधि विद्यालय के स्पर्श अनुसंधान संस्थान द्वारा किये गये अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि खेल के मैदान में खेलते समय अमेरिकी बच्चे, फ्राँसीसी बच्चों की तुलना में अधिक आक्रामक थे। यह पाया गया कि फ्राँसीसी महिलायें अपने बच्चों को अधिक स्पर्श करती हैं।

पैरालेंग्वेज: आवाज के अशाब्दिक संकेत[संपादित करें]

पैरालेंग्वेज (कई बार वोकलिक्स कहलाता है) आवाज के अशाब्दिक संकेतों का अध्ययन है। वाणी की विभिन्न ध्वनिक विशेषताऐं जैसे कि सुर, स्वर मान तथा उच्चारण, जो सामुहिक रूप से छन्दशास्त्र के नाम से जाना जाता है, सभी अशाब्दिक संकेत छोड़ सकते हैं। पैरालेंग्वेज शब्दों का अर्थ बदल सकती है।

भाषाविद जार्ज एल. ट्रेगर ने वर्गीकरण प्रणाली का विकास किया है जिसमें आवाज सैट, आवाज गुणवत्ता तथा स्वरोच्चारण सम्मिलित है।[8]

  • आवाज या वॉईस सैट एक संदर्भ है जिसमें वक्ता बोल रहा है। इसमें स्थिति, लिंग, मनोदशा, आयु तथा एक व्यक्ति की संस्कृति सम्मिलित हो सकती है।
  • आवाज गुणवत्तायें, परिमाण, स्वरमान, लय, जोडबंदी, प्रतिध्वनि, अनुनासिकता तथा उच्चारण होती है। वे प्रत्येक व्यक्ति को अनूठा "वॉईस प्रिन्ट" देते हैं।
  • स्वरोच्चारण या वोकलाइजेशन में तीन उपखण्ड सम्मिलित होते हैं : विशेषक, योग्यकारक तथा पृथक्कारक. विशेषक, बोलते समय व्यक्त करने वाली भावनाऐं होती हैं जैसे कि हंसना, चिल्लाना तथा जम्हाई लेना. योग्यकारक संदेश देने का एक तरीका है - उदाहरण के लिये "हे स्टॉप देट" फुसफुसाने की जगह

"हे स्टॉप देट!" चिल्लाना. आवाज पृथक करती है, जैसे कि "उह-हुअ" वक्ता को सूचित करता है कि श्रोता सुन रहा है।))

अशाब्दिक संप्रेषण के कार्य[संपादित करें]

आर्गिल (1970)[9] ने परिकल्पना पेश की कि बोलचाल की भाषा सामान्यतया वक्ताओं के लिये बाहरी घटनाओं के संबंध में सूचना संप्रेषण के लिये प्रयोग की जाती है, अशाब्दिक कोड पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने तथा उन्हें बनाये रखने के लिये प्रयोग किये जाते हैं। शाब्दिक के स्थान पर अशाब्दिक संप्रेषण अन्य लोगों के प्रति अधिक सभ्य तथा अच्छा समझा जाता है, उदाहरण के लिये शर्मिन्दगी की स्थितियों को रोकने के लिये.[10]

आर्गिल (1988) ने निष्कर्ष किया कि मानव संप्रेषण में अशाब्दिक शारीरिक आचरण के पांच प्रमुख कार्य होते है:[11]

  • भावनाओं को व्यक्त करना
  • पारस्परिक रुख को व्यक्त करना
  • वक्ताओं तथा श्रोताओं के मध्य अंत:क्रियाओं के संकेतों का प्रबंध करने में वाणी के साथ होना
  • किसी के व्यक्तित्व का स्वप्रदर्शन
  • अनुष्ठान (अभिवादन)

धोखा छिपाना[संपादित करें]

अशाब्दिक संप्रेषण बगैर व्यक्त हुये झूठ बोलना आसान बनाता है। यह एक अध्ययन का निष्कर्ष है जिसमें लोगों ने पर्स चोरी के आरोपी व्यक्तियों के बनाये गये साक्षात्कार देखे. साक्षात्कार देने वाले व्यक्ति ने 50% मामलों में झूठ बोला. लोगों ने या तो साक्षात्कारों की लिखित प्रतिलिपि, अथवा ऑडियो टेप रिकार्डिंग अथवा वीडियो रिकार्डिंग देखी. इस प्रकार देखने में जो अधिक संकेत उपलब्ध होते हैं, उसमें सबसे बड़ी वह प्रवृत्ति होती है जिसमें साक्षात्कार देने वाला जो वास्तव में झूठ बोला है, उसे सच्चा साबित किया जाता है। इसलिये, वे लोग जो झूठ बोलने में चतुर होते हैं, अपने आप को सच्चा साबित करने के लिये आवाज ध्वनि या चेहरे की अभिव्यक्ति का प्रयोग कर सकते हैं।[12]

मौखिक तथा अशाब्दिक संप्रेषण के बीच संबंध[संपादित करें]

मौखिक तथा अशाब्दिक संप्रेषण का आपेक्षिक महत्व[संपादित करें]

एक दिलचस्प प्रश्न है कि : जब दो व्यक्ति आमने सामने संप्रेषण कर रहें हो, शाब्दिक रूप से कितना अर्थ संप्रेषण किया जाता है, तथा कितना अशाब्दिक रूप से संप्रेषित होता है। इस अल्बर्ट मेहराबियां ने अन्वेषित किया है तथा दो शोध पत्रों में प्रकाशित किया है[13],[14]. बाद के शोध पत्र में निष्कर्ष निकाला है कि : "यह सुझाव दिया गया है कि समकालिक शाब्दिक, मौखिक तथा चेहरे के मनोभाव संप्रेषण का संयुक्त प्रभाव उनके स्वतंत्र प्रभावों का क्रमशः .07, .38 तथा। 55 गणकों के साथ भारित योग होता है। बोले गये शब्दों, वॉइस टोन तथा चेहरे की अभिव्यक्ति से कुल अर्थ में क्रमशः 7%, 38% तथा 55% योगदान होता है, से प्राप्त यह "नियम" व्यापक रूप से उद्धत किया जाता है। इसे सभी प्रकार के लोकप्रिय पाठ्यक्रम में, "वैज्ञानिकों ने पाया है कि..." जैसे बयानों के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ". वास्तव में, यद्यपि, यह अत्यंत कमजोर रूप से स्थापित है। प्रथम, यह एकल टेपरिकार्डेड शब्दों के अर्थों के निष्कर्ष पर आधारित है, जैसे कि, एक बहुत ही कृत्रिम संदर्भ. दूसरा, आंकड़े दो विभिन्न अध्ययनों को मिलाकर प्राप्त किये जाते हैं जो कभी मिलाये नहीं जा सकते. तीसरा, यह केवल सकारात्मक बनाम नकारात्मक संप्रेषण से संबंधित होता है। चौथा, यह केवल महिलाओं से संबंधित होता है, क्योंकि पुरुष अध्ययन में भाग नहीं लेते.

तब से, अन्य अध्ययनों ने अधिक स्वाभाविक परिस्थितियों के अन्तर्गत शाब्दिक तथा अशाब्दिक संकेतों के आपेक्षिक योगदान का विश्लेषण किया है। विषयों को दिखाये गये वीडियो टेप्स का प्रयोग करते हुए आर्गिल[9] ने विनम्र/हावी रवैये के संप्रेषण का विश्लेषण किया है तथा पाया है कि अशाब्दिक संकेतों में शाब्दिक संकेतों का 4.3 गुना प्रभाव होता है। अत्यधिक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह था कि शरीर मुद्रा ने अत्याधिक कुशल तरीके से बेहतर स्थिति सम्प्रेषित की है। दूसरी ओर, हसी एट ऑल[15] ने एक व्यक्ति के सुखी/दुखी होने के आयाम पर अध्ययन किया तथा पाया कि आवाज के कम से कम उतार चढ़ाव के साथ बोले गये शब्दों में बगैर आवाज की फिल्म में देखी गई चेहरे की अभिव्यक्तियों की अपेक्षा 4 गुना अधिक प्रभाव होता है। इस प्रकार बोले गये शब्दों तथा चेहरे की अभिव्यक्तियों का आपेक्षित महत्व विभिन्न सेटअप का प्रयोग करते हुये अध्ययन में अत्यधिक अलग हो सकता है।

शाब्दिक तथा अशाब्दिक संप्रेषण की परस्पर क्रिया[संपादित करें]

सम्प्रेषण करते समय अशाब्दिक संदेश, शाब्दिक संदेशों के साथ 06 प्रकार से परस्पर क्रिया कर सकते हैं- दोहराकर, टकराव से, पूरक बनकर, स्थानापन्न कर, नियमित करके तथा उच्चारण/संयमित करके.

दोहराना[संपादित करें]

दोहराना में शाब्दिक संदेश को मजबूत करने के लिये हावभाव का प्रयोग सम्मिलित होता है, जैसे कि विचार-विमर्श के लक्ष्य को इंगित करना.[16]

टकराव[संपादित करें]

एक ही परस्पर क्रिया में शाब्दिक तथा अशाब्दिक संदेश कई बार परस्पर विरोधी अथवा टकराव के संदेश भेज सकते हैं। सत्य को अभिव्यक्त करते समय एक व्यक्ति आँख मिलाकर बात न करने के कारण बातचीत के दौरान संदेश प्राप्तकर्ता के मन में मिश्रित भाव पैदा कर सकता है। टकराव युक्त संदेश विभिन्न कारणों से घटित हो सकते हैं जो प्रायः अनिश्चितता, ढुलभुल रवैये अथवा कुंठा की अनुभूति से उत्पन्न होते हैं।[17] जब मिले जुले संदेश व्यक्त होते हैं तब अशाब्दिक संप्रेषण स्थिति को स्पष्ट करने के लिये अतिरिक्त सूचना प्राप्त करने के लिये व्यक्तियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला प्रमुख साधन है; शारीरिक संचलन तथा स्थिति पर अधिक ध्यान दिया जाता है जब बातचीत के दौरान व्यक्ति मिश्रित संदेश अनुभव करते हैं।

पूरक[संपादित करें]

जब शाब्दिक तथा अशाब्दिक सम्प्रेषण एक दूसरे के पूरक बनते हैं, तब संदेश की सटीक व्याख्या आसान बन जाती है। सम्प्रेषण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये प्रयास करते समय भेजी गई सूचना को सुदृढ़ करने के लिये शाब्दिक संदेशों को विस्तृत करने के लिये अशाब्दिक संकेतों का प्रयोग किया जा सकता है; जब अशाब्दिक संकेत शाब्दिक विनिमय की दृढ़ता से पुष्टि करते हैं, संदेशों को अच्छी तरह याद रखने के लिये दिखाया गया है।[18]

स्थानापन्न कर[संपादित करें]

अशाब्दिक आचरण कई बार संदेश के सम्प्रेषण के लिये एकमात्र चैनल के रूप में प्रयोग किया जाता है। व्यक्ति, चेहरे की अभिव्यक्ति, शारीरिक संचलन तथा शारीरिक स्थिति को उनके साथ जुड़ी विशिष्ट भावनाऐं तथा अभिप्राय के लिये पहचानना सीखते हैं। अशाब्दिक संकेतों को संदेश को व्यक्त करने के लिये बगैर शाब्दिक सम्प्रेषण के प्रयोग किया जा सकता है; जब अशाब्दिक आचरण संदेश को प्रभावी रूप से सम्प्रेषित नहीं करता, समझ को बढ़ाने के लिये शाब्दिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।[19]

नियमित करनाः[संपादित करें]

अशाब्दिक आचरण भी हमारे वार्तालाप को नियमित करता है। उदाहरण के लिये, किसी की भुजा को पकड़ने से यह संकेत मिलता है कि आप बात करना अथवा अवरोध करना चाहते हैं।[19]

उच्चारण/संयमित करना[संपादित करें]

अशाब्दिक संकेत शाब्दिक संदशों की व्याख्या को बदलने के लिये प्रयोग किये जाते हैं। स्पर्श, आवाज का स्वर या पिच तथा हावभाव आदि ऐसे साधन हैं, जो कि व्यक्तियों द्वारा भेजे गये संदेश का उच्चारण करने अथवा उसे बढ़ाने के लिये प्रयोग किए जाते हैं; अशाब्दिक आचरण को भी शाब्दिक संदेश के पहलुओं को भी संयमित करने अथवा कम करने के लिये प्रयोग किया जा सकता है।[20] उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो शाब्दिक रूप से गुस्सा अभिव्यक्त कर रहा है, शाब्दिक संदेश का उच्चारण मुट्ठी से धक्का देकर कर सकता है।

नृत्य तथा अशाब्दिक संप्रेषण[संपादित करें]

नृत्य अशाब्दिक संप्रेषण का एक प्रकार है जिसमें अवधारणा, रचनात्मकता तथा याददाश्त के लिये दिमाग में उसी आधारभूत संकाय की आवश्यकता होती है जैसे बोलने तथा लिखने के दौरान शाब्दिक भाषा में होता है। स्वअभिव्यक्ति का अर्थ, दोनों प्रकारों में शब्दावली (नृत्य में कदम तथा हावभाव), व्याकरण (शब्दावली को एक साथ रखने के नियम) तथा अर्थ होते हैं। नृत्य, यद्यपि इन तत्वों को इस प्रकार इकट्ठा (नृत्य निर्देशन करता है) करता है कि प्रायः कई बार अपनी अस्पष्टता तथा एकाधिक, सांकेतिक तथा आसानी से समझ न आने वाले अर्थ के कारण कविता से मेल खाता है।

अशाब्दिक संप्रेषण का नैदानिक अध्ययनः[संपादित करें]

1977 से 2004 तक, अशाब्दिक संप्रेषण पर रोग तथा दवाइयों के प्रभाव का समान नमूने का प्रयोग करते हुए अध्ययन तीन अलग-अलग चिकित्सीय स्कूलों में किया गया।[21].पीटसबर्ग विश्वविद्यालय, येल विश्वविद्यालय तथा ओहियों स्टेट विश्वविद्यालय शोधार्थियों के पास स्लॉट मशीन पर अदायगी का इंतजार करते हुए जुआरियों का निरीक्षण करने के लिए विषय थे। इस अदायगी की रकम सुदृढ़ीकरण के पूर्व अशाब्दिक प्रसारण द्वारा पढ़ी जाती थी। यह तकनीक मनोविज्ञानी डॉ॰ रॉबर्ट ई मिलर तथा मनोचिकित्सक डॉ॰ ए. जेम्स गियानिनी द्वारा विकसित तथा अध्ययन निर्देशित थी। इन समूहों ने हेरोइन के व्यसनियों[22] तथा फेन्सी क्लाइडाइन को कोसने वालों[23] में संकुचित होती ग्रहणशील क्षमता के विपरीत कोमीन व्यसनियों में बढ़ी हुई ग्रहणशीलता को रिपोर्ट किया अवसादग्रस्त[24] पुरुषों ने प्रसन्नचित्त पुरुषों की तुलना में अशाब्दिक संदेशों को पढ़ने में कम क्षमता को प्रदर्शित किया।

फ्रेटास-मेगलहेस ने अवसाद के उपचार में हँसने के प्रभाव का अध्ययन किया है तथा निष्कर्ष निकाला है कि जब आप अधिक हंसते हैं तो अवसाद की अवस्था में कमी आती है।[25]

मोटी महिलाओं[26] तथा पूर्व मासिक सिन्ड्रोम[27] वाली महिलाओं में भी इन संकेतों को पढ़ने की क्षमतओं का कम होना पाया गया है। इसके विपरीत, द्विध्रवी (बाई पोलर) विकारग्रस्त पुरूषों में बढ़ी हुई क्षमताऐं पायी जाती हैं।[28]. चेहरे के नसों के पूर्ण लकवे से ग्रसित महिला कोई अशाब्दिक चेहरे के संकेत को संचारित करने में असमर्थ होती हैं।[29]. अशाब्दिक ग्रहणशीलता के स्तरों की सटीकता में परिवर्तन के कारण अनुसंधान टीम के सदस्यों ने मस्तिष्क में एक जैव रसायन साइट की परिकल्पना की जो अशाब्दिक संकेतों को प्राप्त करने के लिए सक्रिय थी। चूंकि कई दवाइयाँ क्षमता में वृद्धि तथा कई कमी लाती हैं; न्यूरोट्रान्समीटर डोपामीन तथा एन्डोर्फीन संभावित इटियोलॉजिकल अभ्यर्थी गये हैं। उपलब्ध डाटा के आधार पर, यद्यपि, प्रयुक्त रूपावली के आधार पर प्रमुख कारण तथा प्रमुख प्रभावों का हल नहीं निकल सका.[30]

हीटरोसेक्सुअल नॉनडेट बलात्कार में चेहरे के अशाब्दिक संकेतों की भूमिका की जाँच करना पीटसबर्ग/येल/ओहियों स्टेट टीम के कार्य का प्रतिफल था। वयस्क महिलाओं के सीरियल बलात्कारी पुरुषों का उनकी अशाब्दिक ग्रहणशीलता की क्षमताओं के लिए अध्ययन किया गया। उनका स्कोर किसी भी उप समूह में उच्चतम था।[31] इसके बाद बलात्कार के शिकारों की जाँच की गयी। यह रिपोर्ट किया गया कि वह महिला जिसका विभिन्न अपराधियों द्वारा कम से कम दो बार बलात्कार किया गया, उनमें पुरुष या महिला संप्रेषकों के संकेतों को पढ़ने में अत्यंत उच्च क्षति पायी गयी।[32] प्रीडेटर-प्रे मॉडल को दर्शाते हुए यह निष्कर्ष चिंतित करने वाले थे। लेखकों ने नोट किया कि इन प्रारंभिक खोज की कुछ भी प्रकृति हो, बलात्कारी की जिम्मेदारी किसी प्रकार तथा स्तर पर कम नहीं होती.

इस समूह के लिए अध्ययन का अंतिम लक्ष्य वे चिकित्सा छात्र थे जिन्हें इन्होंने पढ़ाया था। ओहियो स्टेट विश्वविद्यालय, ओहियो विश्वविद्यालय तथा नॉर्थेस्ट ओहियो मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा छात्रों को विषय के रूप में प्रयोग करने के लिये आमंत्रित किया गया था। परिवार अभ्यास, मनोचिकित्सा, बाल चिकित्सा तथा महिला व प्रसूति शास्त्र में विशेषज्ञता हेतु प्राथमिकता सूचित करने वाले छात्रों ने सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट अथवा पेथोलॉजिस्ट के प्रशिक्षण की योजना बनाने वाले छात्रों की अपेक्षा सटीकता का महत्त्वपूर्ण उच्चतम स्तर प्राप्त किया। आंतरिक औषधि तथा प्लास्टिक सर्जरी के विद्यार्थियों ने भी इनके बीच का स्तर प्राप्त किया।[33]

अशाब्दिक संप्रेषण में कठिनाइयां[संपादित करें]

लोगों में अशाब्दिक संप्रेषण को भेजने तथा प्राप्त करने की क्षमता में भिन्नता होती है। अतएव, औसतन से सामान्य डिग्री तक महिलायें अशाब्दिक संप्रेषण में पुरुषों की अपेक्षा बेहतर हैं।[34][35][36][37]

अशाब्दिक रूप से सम्प्रेषण की योग्यताओं का परिमाप तथा सहानुभूति अनुभव करने की क्षमता ने दिखाया है कि दोनों योग्यताऐं एक दूसरे से स्वतंत्र हैं।[38]

ऐसे लोग जिनकों अशाब्दिक संप्रेषण में तुलनात्मक रूप से अधिक समस्या है, उनको ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर पारस्परिक संबंधों में. वहां पर संसाधन मौजूद हैं जो विशेष रूप से इन्हीं लोगों के लिए हैं तथा उन्हें अन्य लोगों की तरह आसानी से सूचनाओं को समझने में सहायता दी जाती है। विशिष्ट लोगों का समूह जो इन चुनौतियों का सामना करता है, वे एस्पर्गर सिन्ड्रोम सहित आटिस्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से ग्रेसित होता है।

पाद-टिप्पणियां[संपादित करें]

  1. नैप एंड हॉल, 2002, पृष्ठ.7
  2. ग्रेमर, कार्ल, रेनिंगर, लींन एंड फिस्चर, बेटिना (2004): डिस्को क्लोदिंग, फिमेल सेक्शुअल मोटिवेशन, एंड रिलेशनशिप स्टेटस: इज़ शी ड्रेस्ड टू इम्प्रेस? जर्नल ऑफ़ सेक्शुअल रिसर्च 41 (1): 66-74.
  3. सेगरस्टरल एंड मोलनर, 1997, पृष्ठ.235
  4. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.8
  5. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.9
  6. बुल, 1987, पृष्ठ. 17-25
  7. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.9
  8. फ्लोयड एंड ग्युरेरो, 2006
  9. अर्गिल, माइकल वेरोनिका साल्टर, हिलेरी निकोलसन, मार्लिन विलियम्स और फिलिप बर्गेस (1970): द कम्युनिकेशन ऑफ़ इन्फ़िरिअर एंड सुपिरिअर एटीट्युडज़ बाय वर्बल एंड नॉनवर्बल सिग्नलज़. ब्रिटिश जर्नल ऑफ़ सोशल एंड क्लिनिकल साईकलोजी 9: 222-231.
  10. रोसेंथल, रॉबर्ट एंड बेला एम. डेपाउलो (1979): सेक्स डिफ्रेंसिज़ इन अकोमोडेशन इन नॉनवर्बल कम्युनिकेशन. पृष्ठ. 68-103 आई आर. रोसेंथल (इडी.): स्किल इन नॉनवर्बल कम्युनिकेशन: इंडिविजुअल डिफ्रेंसिज़. ओएलगेस्च्लागेर, गन एंड हैन.
  11. अर्गिल, 1988, पृष्ठ.5
  12. बुर्गून, जे.के., जे.पे. ब्लेयर और आर.इ. स्ट्रोम (2008): कोगनिटिव बिअसिज़ एंड नॉनवर्बल क्यू अवेलेबिलिटी इन डिटेकटिंग डिसेप्शन. ह्यूमन कम्युनिकेशन रिसर्च 34: 572-599.
  13. मेहराबियां अल्बर्ट एंड मोर्टन वीनर (1967): डिकोडिंग ऑफ़ इन्कंसिसटेंट कम्युनिकेशनस. जर्नल ऑफ़ सोशल एंड क्लिनिकल साईकलोजी 6(1): 109-114.
  14. मेहराबियां, अल्बर्ट एंड सुज़न आर. फेरिस (1967): इनफरेंस ऑफ़ एटीटयूडज़ फ्रॉम नॉनवर्बल कम्युनिकेशन इन टू चेनल्ज़. जर्नल ऑफ़ कंसल्टिंग साईकलोजी 31 (3): 248-252.
  15. क्रिस्टोफर के. हसी, ऐलेन हाटफील्ड और क्लाउड चेमटोब (1992): असेसमेंटस ऑफ़ द इमोशनल स्टेट्स ऑफ़ अदर्ज़: कोंशिअस जज्मेंट्स वर्सिस इमोशनल कोंटेगिओन. जर्नल ऑफ़ सोशल एंड क्लिनिकल साईकलोजी 14 (2): 119-128.
  16. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.12
  17. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.13
  18. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.14
  19. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.16
  20. नैप एंड हॉल, 2007, पृष्ठ.17
  21. आरई मिलर, एजी गिआन्निनी, जेएम लेविन. नॉनवर्बल कम्युनिकेशन इन मेन विद अ कोरपोरेटिव कंडिशनिंग टास्क. जर्नल ऑफ़ सोशल साईकलोजी. 103:101-108, 1977
  22. ए जी गिआन्निनी, बी टी जोन्स. डिक्रीज़ड रिसेप्शन ऑफ़ नॉनवर्बल क्यूज़ इन हिरोइन एडिक्ट्स. जर्नल ऑफ़ साईकलोजी. 119(5):455-459, 1985.
  23. ए जी गिआन्निनी आर के बोमन, जेडी गिआन्निनी. परसेपशन ऑफ़ नॉनवर्बल फेशिअल क्यूज़ इन क्रोनिक फेनसिसलीडाइन अब्यूज़र्ज़. परसेप्चुअल एंड मोटर स्किल्ज़. 89:72-76, 1999
  24. ए जी गिआन्निनी, डी जे फोल्ट्स, एस एम मेलेमिस आर एच लोइसेल्ले. डिप्रेस्ड मेन'ज़ लोअर्ड एबिलिटी टू इन्टरप्रेट नॉनवर्बल क्यूज़. परसेप्चुअल एंड मोटर स्किल्ज़. 81:555-559, 1995.
  25. फ्रेटास-मेगलहेस (Freitas-Magalhães), ए. एंड केस्ट्रो, ई. (2009). फेशिअल एक्सप्रेशन: द इफेक्ट ऑफ़ द स्माइल इन द ट्रीटमेंट ऑफ़ डिप्रेशन. एम्पिरिकल स्टडी विद पोर्टुगीज़ सब्जेक्ट्स. इन ए. फ्रेटास-मेगलहेस (Freitas-Magalhães)(ईडी.), इमोशनल एक्सप्रेशन: द ब्रेन एंड द फेस (27-140). पोर्टो: विश्वविद्यालय फरनेंडो पेस्सोया (Fernando Pessoa) प्रेस. आई एस बी एन (ISBN) 978-989-643-034-4.
  26. ए जे गिआन्निनी, एल डीरूसो, डी जे फोल्ट्स, जी सरिमेल नॉनवर्बल कम्युनिकेशन इन मोडरेटली ओबीस फिमेलज़. एक प्रायोगिक अध्ययन. अन्नाल्स ऑफ़ क्लिनिकल साईकेटरी. 2:111-1115, 1990.
  27. ए जे गिआन्निनी, एलएम सोर्गर, डीएम मार्टिन, एल बैट्स. जर्नल ऑफ़ साईकलोजी. 122:591-594, 1988.
  28. ए जे गिआन्निनी, डी जे फोल्ट्स, एल फिडलर. एन्हेंसड एन्कोडिंग ऑफ़ नॉनवर्बल क्यूज़ इन मेल बाईपोलर्ज़. जर्नल ऑफ़ साईकलोजी. 124:557-561, 1990.
  29. ए जे गिआन्निनी, डी टामुलोनिस एम सी गिआन्निनी, आर एच लोइसेल्ले, जी स्पिर्टोस. डिफेकटिव रिस्पोंस टू सोशल क्यूज़ इन मोबिअस सिंड्रोम. जर्नल ऑफ़ नर्वस एंड मेंटल डिसऑर्डरज़. 172174-175, 1984.
  30. ए जे गिआन्निनी. सजेशंज़ फॉर फ्यूचर स्टडीज़ ऑफ़ नॉनवर्बल फेशिअल क्यूज़. परसेप्चुअल एंड मोटर स्किल्ज़. 81:555-558,1995
  31. ए जे गिआन्निनी, के डबल्यू फेलोज़. एन्हेंसड इन्टरप्रेटेशन ऑफ़ नॉनवर्बल क्यूज़ इन मेल रेपिस्ट्स. आर्काइव्ज़ ऑफ़ सेक्शुअल बिहेविअर. 15:153-158,1986.
  32. ए जे गिआन्निनी, डबल्यू ए प्राइज़, जे एल निएप्ल. डिक्रीज़ड इन्टरप्रेटेशन ऑफ़ नॉनवर्बल क्यूज़ इन रेप विक्टिमज़. इंटरनैशनल जर्नल ऑफ़ साईकेटरी इन मेडिसिन. 16:389-394,1986.
  33. ए जे गिआन्निनी, जे डी गिआन्निनी, आर के बोमन. मेज़रमेंट ऑफ़ नॉनवर्बल रिसेप्टिव एबिलिटीज़ इन मेडिकल स्टुडेंट्स. परसेप्चुअल एंड मोटर स्किल्ज़. 90:1145-1150, 2000
  34. जुडिथ ए. हॉल (1978): जेंडर अफेक्ट्स इन डीकोडिंग नॉनवर्बल क्यूज़. साईकलोजिकल बुलेटिन 85: 845-857.
  35. जुडिथ ए. हॉल (1984): नॉनवर्बल सेक्स डिफ्रेंसिज़. कम्युनिकेशन एक्यूरेसी एंड एक्सप्रेसिव स्टाइल. 207 पृष्ठ. जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी प्रेस.
  36. जुडिथ ए. हॉल, जेसन डी. कार्टर एंड टिरेंस जी. होर्गन (2000): जेंडर डिफ्रेंसिज़ इन नॉनवर्बल कम्युनिकेशन ऑफ़ इमोशन. पृष्ठ. 97-117 आई ए.एच. फिस्चर (इडी.): जेंडर एंड इमोशन: सोशल साईकलोजिकल पर्सपेकटिव्ज़. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस.
  37. एग्नेटा एच. फिस्चर एंड एंथनी एस.आर. मैनस्टीड (2000): द रिलेशन बिटवीन जेंडर एंड इमोशनज़ इन डिफरेंट कल्चरज़. पृष्ठ. 71-94 आई ए.एच. फिस्चर (इडी.): जेंडर एंड इमोशन: सोशल साईकलोजिकल पर्सपेकटिव्ज़. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस.
  38. जुडिथ ए. हॉल (1979): जेंडर, जेंडर रोल्ज़, एंड नॉनवर्बल कम्युनिकेशन स्किल्ज़. आर. रोसेंथल (इडी.) में पृष्ठ 32-67: स्किल इन नॉनवर्बल कम्युनिकेशन: इंडिविजुअल डिफ्रेंसिज़. ओएलगेस्च्लागेर, गन एंड हैन.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  • एण्डरसन, पीटर. (2007). नॉनवर्बल कम्युनिकेशन: फोर्म्ज़ एंड फंक्शंज़ (2 इडी.) Waveland प्रेस.
  • एण्डरसन, पीटर. (2004). द कम्प्लीट ईडीअट'स गाइड टू बोडी लेंगुएज. अल्फा प्रकाशन.
  • अर्गिल, माइकल. (1988). बोडिली कम्युनिकेशन (2 इडी.) मैडिसन: अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रेस. आई एस बी एन (ISBN) 0-416-38140-5
  • बुल, पीटर ई. (1987). पोसचर एंड जेस्चर (खंड. 16). ऑक्सफोर्ड: परगामोन प्रेस. आई एस बी एन (ISBN) 0-08-031332-9
  • बुर्गून, जे.के. बुलर, डी.बी. और वुडआल डबल्यू.जी. (1996), नॉनवर्बल कम्युनिकेशन: द अन्स्पोकन डायलोग (2 इडी.), न्यू यार्क: मकग्रा-हिल.
  • फ्लोयड, के., ग्युरेरो, एल. के. (2006), नॉनवर्बल कम्युनिकेशन इन क्लोज़ रिलेशनशिपस, माहवा, न्यू जर्सी: लॉरेंस एर्लबौम एसोसिएट्स
  • फ्रेटास मेगलहेस (Freitas-Magalhães), ए. (2006). द साईकलोजी ऑफ़ ह्यूमन स्माइल. ओपोर्टो: विश्वविद्यालय फरनेंडो पेस्सोया (Fernando Pessoa) प्रेस. आई एस बी एन (ISBN) 972-8830-59-9
  • गिवनज़, डी.बी. (2000) बोडी स्पीक: वट आर यू सेइंग? सक्सेसफुल मीटिंग्स (अक्टूबर) 51
  • ग्युरेरो, एल.के., डेविटो, जे.ए., हेक्ट, एम. एल. (इडीएस.) (1999). द नॉनवर्बल कम्युनिकेशन रीडर. (2 इडी.), लोन ग्रूव, इलिनोइस: वेवलैंड प्रेस. [1]
  • गुडीकस्ट, डबल्यू.बी. एंड टिंग-टोमी, एस. (1988) कल्चर एंड इंटरपर्सनल कम्युनिकेशन. कैलिफोर्निया: स्टेज प्रकाशन इंक.
  • हाना, जुडिथ एल. (1987). टू डेंस इज़ ह्यूमन: अ थ्योरी ऑफ़ नॉनवर्बल कम्युनिकेशन. शिकागो: यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो प्रेस.
  • हारजी, ओ. एंड डिक्सन, डी. (2004) स्किल्ड इंटरपर्सनल कम्युनिकेशन: रिसर्च, थ्योरी एंड प्रैकटिस. होव: राउटलेज.
  • नैप, मार्क एल. और हॉल, जुडिथ ए. (2007) नॉनवर्बल कम्युनिकेशन इन ह्यूमन इंटरेक्शन. (5वां इडी.) वड्सवर्थ: थॉमस लर्निंग. आई एस बी एन (ISBN) 0-15-506372-3
  • मेलामेड, जे. एंड बोज़ियोनीलोस, एन. (1992) मेनेजिरिअल प्रोमोशन एंड हाईट. मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट, 71 पृष्ठ. 587-593.
  • ओटनहेइमर, एच.जे. (2007), द एन्थ्रोपोलोजी ऑफ़ लेंगुएज: एन इंट्रोडकशन टू लिंगुईसट एन्थ्रोपोलोजी, केन्सास स्टेट: थॉमसन वड्सवर्थ.
  • सेगरस्टरल, युलिका., एंड मोलनर, पीटर (इडीएस.). (1997). नॉनवर्बल कम्युनिकेशन: वेयर नेचर मीट्स कल्चर. माहवा, एनजे: लॉरेंस एर्लबौम एसोसिएट्स. आई एस बी एन (ISBN) 0-8058-2179-1

बाहरी लिंक[संपादित करें]