अर्ध कुंभ

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‘अर्ध’ शब्द का अर्थ होता है आधा। और इसी कारण बारह वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाले पूर्ण कुंभ के बीच अर्थात पूर्ण कुंभ के छ: वर्ष बाद अर्ध कुंभ आयोजित होता है। हरिद्वार में पिछला कुंभ 1998 में हुआ था।

हरिद्वार में 26 जनवरी से 14 मई 2004 तक चलने वाला अर्ध कुंभ मेला, उत्तरांचल राज्य के गठन के पश्चात ऐसा प्रथम अवसर है। इस दौरान 14 अप्रैल 2004 पवित्र स्नान के लिए सर्वोत्तम दिवस है।

अर्ध कुंभ मेले का पौराणिक महत्त्व: पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देव-दानवों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया था। जब दैव चिकित्सक धन्वंतरी अमृत कुंभ लेकर बाहर आए तब अमृत कुंभ की प्राप्ति के लिए देवों तथा दानवों में भयानक युद्ध हुआ। आकाश में चल रहे विनाशकारी युद्ध के दौरान अमृत की कुछ बूंदें चार विभिन्न स्थानों- प्रयाग, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन में गिरीं। तभी से इस घटना की पुण्य स्मृति में इन चार स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।

अर्ध कुंभ मेला – ज्योतिषीय महत्व: पौराणिक विश्वास जो कुछ भी हो, ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुंभ के काल मे ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।

हालाँकि सभी हिंदू त्योहार समान श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते है, पर यहाँ अर्ध कुंभ तथा कुंभ मेले के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है।