अरुण गवली

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

साँचा:Infobox politician अरुण गुलाब गवली , को उनके समर्थकों के बीच "डेडी" के नाम से जाना जाता है, वह एक कुख्यात अपराधी था जो भारत के मुंबई से राजनीतीज्ञ बन गया. वे सात रास्ता, मुंबई के बाइकुला में दाग्दी चॉल में रहते हैं. 2004 में, उन्हें अखिल भारतीय सेना उम्मीदवार के रूप में मुंबई चिंचपोकली संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से एक एमएलए चुना गया.


ऐसा माना जाता है कि एक स्थानीय बालक के रूप में उनकी "देसी जड़ों" के यंही बसे होने के कारण ही गवली का महत्त्व इस क्षेत्र में इतना बढ़ गया है, यही विशेषता उन्हें अधिकांश अन्य गैर-मराठी-भाषी सरगनाओं (डोन) से विभेदित करती है. गवली इस दृष्टि से भी अलग हैं कि वे हिन्दू हैं (उनकी पत्नी, आशाताई [पुणे के वदगांव-पांचपीर जिले के मोहम्मद शेख लाल मुजावर "नान्हुभाई" की बेटी उर्फ मम्मी, एक मुस्लिम थीं) एक बिंदु पर गवली को बाल ठाकरे का सक्रिय समर्थन प्राप्त हुआ, परन्तु बाद में ठाकरे और शिवसेना के साथ उनके सम्बन्ध टूट गए जब गवली के लड़कों ने निर्दयता से कई शिवसेना विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को मारा.

अब तक निडर रहने वाले शिवसेना के सदस्य बहुत डर गए, उन्होंने अपने आप को अपनी स्वयं की आतंक रणनीति के अंत में पाया. मुंबई (उस समय बोम्बे) अंडरवर्ल्ड में, गवली ने सक्रियता से अपहरण और गैर क़ानूनी काम किये और माना जाता था कि मुंबई से दाऊद इब्राहिम की उड़ान के द्वारा निर्मित निर्वात के बाद कुछ शक्तिशाली राजनेताओं और नौकरशाहों से उन्हें समर्थन प्राप्त हुआ. धीरे धीरे वे प्रासंगिकता खोने लगे, गवली ने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखा, अपने पुराने आकाओं के साथ सम्बन्ध ख़त्म करने शुरू कर दिए.

जाने माने अपराधी या "गुंडे"- जैसे अरुण गवली, रामभाई नायक, बाबुभाई रेशीम, गुरु सतम उर्फ़ मामा, अशोक चौधरी उर्फ़ छोटा बाबू, अनिभाई परब और तान्या कोहली- 1970 में मुंबई की कुख्यात कॉटन टेक्सटाइल मिल की हड़ताल के बाद सामने आये, जिसमें लाखों मजदूर बेरोजगार हो गए थे. केवल गवली को छोड़कर उपरोक्त सभी की उनके माफिया प्रतिद्वंद्वियों के द्वारा क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गयी. बेरोजगारी और भुखमरी से पीड़ित, ये मजदूर गरीबी से जकड़े हुए थे, और बाद में इनके बच्चे भी अपराधी बन गए. दाग्दी चॉल सिंडिकेट मूल रूप से डी-कंपनी के साथ गठबंधित थी लेकिन बाद में अंदरूनी झगड़ों के बाद इनमें विभाजन हो गया. किसी समय बाइकुला-महालक्ष्मी-अग्रीपाड़ा-परेल/नईगांव-चिंचपोकली क्षेत्र में एक छोटे समय के लिए चार्ज-शीटर (आरोपी) रहा, अल्पार्थक गवली अव दाग्दी चॉल का निर्विवाद डोन है और मुंबई के कुछ भागों में उसके कहे शब्द ही कानून हैं.

[1]

गवली को स्वर्गीय रामभाई नायक के द्वारा आश्रय दिया गया था, जिसने 1986 में सुपारी-किंग करीम लाला के भतीजे, खूंखार समद खान को बंदूक की नोक पर मार गिराया, और दाऊद इब्राहिम के लिए मुंबई अंडरवर्ल्ड का निर्विवादित डोन बनने का रास्ता खोल दिया. इसके कुछ ही समय बाद रामनायक खुद भी 1988 में नागपाड़ा पुलिस के पीएसआई राजन कटधरे के साथ एक 'मुठभेड़ (एनकाउन्टर)' में मारा गया, कथित तौर पर यह दाऊद इब्राहिम के कहने पर हुआ था, लेकिन आज भी गवली और उसके गुर्गे बाइकुला के दाग्दी चॉल के मूल गोडफादर (गुरु) के रूप में उसकी पूजा करते हैं.


==शुरूआती कैरियर ==अरुण गवली मराठा हैं

मिल में काम करने वाले इस मजदूर के बेटे ने एक कारखाने में काम करने की कोशिश की, लेकिन वह धैर्य नहीं रख पाया. इसके बाद वह एक छोटे किले में स्थित अपने दाग्दी चॉल वाले घर में लौट आया और दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन के साथ सम्बन्ध बनाने शुरू किये. जब पापा गवली को उसके पूर्व सहयोगियों ने मार डाला, उसने गवली गिरोह शुरू कर लिया, जिसने संपत्ति के विवादों और ख़त्म होती हुई मिलों में मजदूर संघों पर फसाद खड़े किये. यहां तक कि जब 1990 के दशक में उसने अपना जेल का कार्यकाल पूरा किया- आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधि अधिनियम के तहत 1993 उस पर आरोप लगाये गए और चार साल की सज़ा सुनाई गयी-उसे मुंबई के केन्द्रीय जेल में रखा गया. बम विस्फोटों के बाद, गवली अचानक हिन्दू डोन बन गया जिसे शिव सेना अपना सकती थी.

वरिष्ठ ठाकरे ने एक बार कहा था: "अगर उनके पास दाऊद है, तो हमारे पास गवली है".

गवली 1997 में जेल से मुक्त हो गया, और उसने शिव सेना से नाता तोड़ कर अखिल भारतीय सेना बनायी. 1997 और 2004 के बीच, गवली को 15 से अधिक मामलों में गिरफ्तार किया गया है-लेकिन इनमें से किसी में भी उसे दोषी नहीं ठहराया गया. जाहिर तौर पर उसने अपराध को छोड़ दिया है, फिर भी वह मुंबई में रहने वाला एकमात्र डोन है.[2]

[संपादित करें] राजनीति और जेल

"डेडी" कई बार जेल में आता जाता रहा है और उसने 10 साल से ज्यादा समय न्यायिक हिरासत में बिताया है, परन्तु वास्तव में उसे कभी भी दोषी नहीं ठहराया गया है. मोबाइल फोन और अपनी इच्छुक जेल और पुलिस अधिकारियों की मदद के साथ, गवली नासिक, पुणे और येरावाडा में जेल में से ही अपहरण, जबरन वसूली और हत्या के आपराधिक साम्राज्य को बड़ी कुशलता और बेरहमी के साथ चलाता रहा. यहीं पर, अन्य दलों से आये अपराधियों और असंतुष्ट नेताओं से उसका राजनीतिक दल, अखिल भारतीय सेना तैयार हो गया. जेल भी उसके लिए एक सुरक्षित अड्डा था, जहां से उसे अपने प्रतिद्वंदियों दाऊद इब्राहिम/ छोटा शकील और छोटा राजन गिरोहों के द्वारा किये गए हत्या के प्रयासों को रोकने में मदद मिली. राजनीती में प्रवेश करने और महाराष्ट्र विधान सभा में सदस्य बनने के उसके फैसले ने सुनिश्चित किया कि अब उसे पुलिस के द्वारा "एनकाउन्टर या मुठभेड़" में मारा नहीं जा सकता.


गवली ने "मम्मी" आशा गवली के साथ विवाह किया और उसके दो बच्चे हैं. गवली के राजनीतिक डिजाइन को एक झटके का सामना करना पड़ा जब उसका भतीजा और पार्टी का विधायक, सचिनभाऊ अहीर, खुले तौर पर उसके विरोध में खडा हो गया और शरद पवार की एनसीपी में शामिल हो गया. उसके बाद उसने एनसीपी टिकेट पर लोक सभा चुनाव में गवली के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें दोनों की हार हुई, लेकिन सेना के एमपी मोहन रावले की जीत हुई. उसकी बेटी को हाल ही में बृहन्मुंबई नगर निगम का पार्षद चुना गया है.

इन सभी आरोपों के बावजूद, गवाहों की कमी के कारण, आज भी गवली एक आज़ाद व्यक्ति है.

गवली को कमलाकर जमसंदेकर (शिवसेना) की हत्या के मामले में जेल हुई थी.

[संपादित करें] संदर्भ

  1. Najm, Quaied, “Reporters' Diary: In the don's lair”, The Week, Malayala Manorama Group, 2003-03-16। अभिगमन तिथि: 2006-10-19।
  2. http://cities.expressindia.com/fullstory.php?newsid=91939
वैयक्तिक औज़ार
नामस्थान

संस्करण
क्रियाएं
परिभ्रमण
योगदान
सहायता
उपकरण
मुद्रण/निर्यात
अन्य भाषाएँ