अपमान की सदी

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अपमान की सदी (चीनी: 百年国耻 (सरलीकृत), 百年國恥 (पारम्परिक)), को राष्ट्रीय अपमान की सदी, अपमान के सौ वर्ष और अन्य समान नामों से भी जाना जाता है। १९२० के दशक से चीन में राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही गुओमिन्दाङ्ग और साम्यवादी दुष्प्रचारकों और इतिहासकारों द्वारा इन अवधारणाओं का उपयोग किया गया जिसमें पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों और जापानी उपनिवेशवाद के अधीन रहकर चीन के दमन को चित्रित किया गया।[1]

इतिहास[संपादित करें]

इस सदी का आरम्भ आमतौर पर उन्नीसवी सदी के मध्य से, प्रथम अफ़ीम युद्ध[2] के ठीक-पूर्वकाल और अफ़ीम की व्यापक लत और चीन की राजनीतिक विवृत्ति से माना जाता है जो इसके बाद आरम्भ हुई।[3]

अन्य प्रमुख घटनाएँ जिन्हें अपमान की सदी का भाग समझा जाता है वे हैं, व्हाम्पोआ और एइगुन की असमान सन्धियाँ, ताइपिङ्ग विद्रोह, द्वितीय अफ़ीम युद्ध और पुराने ग्रीष्मकालीन महल की पदच्युति, चीनी-फ़्रान्सीसी युद्ध और प्रथम चीन-जापान युद्ध और तिब्बत पर ब्रिटेन का आक्रमण[4]। इस काल के दौरान, चीन ने वह सभी युद्ध हारे जिसमें उसने भाग लिया और इन युद्धों के पश्चात हुई सन्धियों में उसे औपनिवेशिक शक्तियों को बहुत अधिक रियायतें देनी पड़ी।[5]

और यह सदी प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात जापान की इक्कीस माँगों और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान द्वितीय चीन-जापान युद्ध के साथ बीसवीं सदी में भी जारी रही।

इसका अन्त माना जाता है जब द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात मुख्यभूमि चीन से विदेशी शक्तियों का निष्कासन किया गया[6] और १९४९ में आधुनिक चीन की स्थापना हुई। कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि इस सदी का समापन हाँगकाँग और मकाउ के चीन में विलय के साथ हुआ, जब चीनी भूमि से सभी विदेशी शक्तियों का निष्कासन पूर्ण हुआ[7]। वहीं कुछ अन्य का मानना है कि अपमान की सदी का समापन ताइवान के चीन में विलय होने तक अधूरा है[8]। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कुछ विदेशी "अपमान" जैसे अमुर समामेलन, अभी तक अकृत है, पर इन्हें चीनी लोगों द्वारा आमतौर पर स्वीकृत किया जाता है।

विवक्षा[संपादित करें]

अपमान की सदी और चीनी साम्यवादी दल के इतिहासचित्रण[9] "चीनी राज्यक्षेत्र की सम्प्रभुता और समग्रता" के परिणामस्वरूप ये चीनी राष्ट्रवाद की प्रमुख शक्तियाँ रहे हैं। इसने चीनी लोगों के बेल्ग्रेड में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा चीनी दूतावास की बमबारी, हैनान द्वीप की घटना और २००८ बीजिंग ओलम्पिक के मशाल रिले के दौरान तिब्बत की स्वतन्त्रता के लिए यूरोपीय और अमेरिकी विरोध-प्रदर्शनों की धारणाओं को रंगने में प्रमुखता निभाई है।[10]

यह भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Alison Adcock Kaufman, "The “Century of Humiliation,” Then and Now: Chinese Perceptions of the International Order," Pacific Focus 25.1 (2010): 1-33.
  2. Paul A Cohen (2003). China Unbound. London: Routledge. प॰ 148. 
  3. Chang, Maria Hsia (2001). Return of the dragon: China's wounded nationalism. Westview Press. pp. 69–70. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780813338569. http://books.google.com/books?id=KYmiafRQP10C&pg=PA69. 
  4. "China Seizes on a Dark Chapter for Tibet", by Edward Wong, The New York Times, 9 अगस्त 2010 (10 अगस्त 2010 p. A6 of NY ed.). Retrieved 10-08-2010.
  5. Nike, Lan (20-11-2003). "Poisoned path to openness". Shanghai Star. http://app1.chinadaily.com.cn/star/2003/1120/cu18-1.html. अभिगमन तिथि: 14-08-2010. 
  6. A L Friedberg. "The Future of U.S.-China Relations: Is Conflict Inevitable?". International Security 2 (Fall 2005): pp 7–45, p 20. 
  7. Dong Wang (2005). China's unequal treaties: narrating national history. Lanham, MD: Lexington Books. प॰ 78. 
  8. Muthiah Alagappa (2001). Taiwan's Presidential Politics. New York City: M. E. Sharpe. प॰ 33. 
  9. W A Callahan. "National Insecurities: Humiliation, Salvation and Chinese Nationalism". Alternatives 20 (2004): pp 199–218, p 199. http://www.humiliationstudies.org/documents/CallahanChina.pdf. 
  10. Jayshree Bajoria (23 अप्रैल 2008). "Nationalism in China". Council on Foreign Relations. http://www.cfr.org/publication/16079/nationalism_in_china.html. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]