अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय

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'संयुक्त राष्ट्र'
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय
संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय
संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय
मुख्यालय शांति महल (पीस पैलस), नीदरलैंड्स
सदस्य वर्ग 192 सदस्य देश
अधिकारी भाषाएं अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी
अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय अध्यक्ष रोज़लिन हिग्गिंस
जालस्थल http://www.un.org

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रधान न्यायिक अंग है, और इस संघ के पांच मुख्य अंगों मे से एक है। इस न्यायालय ने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय की जगह ले ली थी।

1980 तक अंतर्राष्ट्रीय समाज इस न्यायालय का ज़्यादा प्रयोग नहीं करती थी, पर तब से अधिक देशों ने, विशेषतः विकासशील देशों ने, न्यायालय का प्रयोग करना शुरू किया है। फ़िर भी, कुछ अहम राष्ट्रों ने, जैसे कि संयुक्त राज्य, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों को निभाना नहीं समझा हुआ है। ऐसे देश हर निर्णय को निभाने का खुद निर्णय लेते है।

सदस्य[संपादित करें]

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में समान्य सभा द्वारा 15 न्यायाधीश चुने चाते है। यह न्यायाधीश नौ साल के लिए चुने जाते है, और फ़िर से चुने जा सकते है। हर तीसरे साल इन 15 न्यायाधीशों में से पांच चुने जा सकत्ते है। इनकी सेवानिव्रति की आयु, कोई भी दो न्यायाधीश एक ही राष्ट्र के नहीं हो सकते है, और किसी न्यायाधीश की मौत पर उनकी जगह किसी समदेशी को दी जाती है। इन न्यायाधीशों को किसी और ओहदा रखना मना है। किसी एक न्यायाधीश को हताने के लिए बाकी के न्यायाधीशों का सर्वसम्मत निर्णय जरूरी है।

निर्णय बहुमत निर्णय के अनुसार लिए जाते है। बहुमत से सहमती न्यायाधीश मिलकर एक विचार लिख सकते है, या अपने विचार अलग से लिख सकते है। बहुमत से विरुद्ध न्यायाधीश भी अपने खुद के विचार लिख सकते है।

तदर्थ न्यायाधीश[संपादित करें]

जब किसी दो राष्ट्रों के बीच का संघर्ष अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के सामने आता है, वे राष्ट्र चाहे तो किसी समदेशी तदर्थ न्यायाधीश को नामजद कर सक्ती हैं। इस प्रक्रिया का कारण था कि वह देश जो न्यायालय में प्रतिनिधित्व नहीं है भी अपने संधर्षों के निर्णय अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को लेने दे।

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अधिकार-क्षेत्र[संपादित करें]

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अभियोग दो तरह के होते है ः विवादास्पद विषय तथा परामर्शी विचार।

विवादास्पद विषय[संपादित करें]

इस तरह के मुकदमों में दोनो राज्य के लिए न्यायालय का निर्णय निभाना आवश्यक होता है। केवल राज्य ही विवादास्पद विषयों में शामिल हो सक्ते हैं ः व्यक्यियां, गैर सरकारी संस्थाएं, आदि ऐसे मुकदमों के हिस्से नहीं हो सकते हैं। ऐसे अभियोगों का निर्णय अंतराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा तब ही हो सकता है जब दोनो देश सहमत हो। इस सहमति को जताने के चार तरीके हैं ः


1. विशेष संचिद ः ऐसे मुकदमों में दोनो देश अपने आप निर्णय लेना अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को सौंपते हैं।

2. माध्यमार्ग ः आज-कल की संधियों में अक्सर एक शर्त डाली जाती है जिसके अनुसार, अगर उस संधि के बारे में कोई संघर्ष उठे, तो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को निर्णय लेने का अधिकार है।

3. ऐच्छिक घोषणा ः राज्यों को अधिकार है कि वे चाहे तो न्यायालय के हर निर्णय को पहले से ही स्वीकृत करें।

4. अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय का अधिकार ः क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय की जगह ली थी, जो भी मुकदमें अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में थे, वे सब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में भी हैं।

परामर्शी विचार[संपादित करें]

परामर्शी विचार दूसरा तरीका है किसी मुकदमें को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंचाना का। यह निर्णय सिर्फ न्यायालय की राय होते है, पर इन विचारों के सम्मान के कारण वह बहुत प्रभावशाली होते हैं।

प्रवर्तन[संपादित करें]

संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का धर्म है कि वे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय के अनुसार आगे बढें। अगर कोई देश इन निर्णयों को स्वीकृत न करे, तो प्रवर्तन की ज़िम्मिदारी सुरक्षा परिषद पर पड़ती है। फ़िर सुरक्षा परिषद जैसे चाहे वैसे निर्णय या सिफ़ारिश घोषित कर सकता है।