अंग्रेजी साहित्य

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अंग्रेजी साहित्य के प्राचीन एवं अर्वाचीन काल कई आयामों में विभक्त किए जा सकते हैं। यह विभाजन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए किया जाता है; इससे अंग्रेजी साहित्य प्रवाह को अक्षुण्णता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। प्राचीन युग के अंग्रेजी साहित्य के तीन स्पष्ट आयाम है: ऐंग्लो-सैक्सन; नार्मन विजय से चॉसर तक; चॉसर से पुनर्जागरण काल तक।

ऐंग्लो-सैक्सन[संपादित करें]

इंग्लैंड में बसने के समय ऐंग्लो-सैक्सन कबीले बर्बरता और सभ्यता के बीच की स्थिति में थे। आखेट, समुद्र और युद्ध के अतिरिक्त उन्हे कृषि जीवन का भी अनुभव था। अपने साथ वे अपने वीरों की कथाएँ भी लेते आए। ट्यूटन जाति के सारे कबीलों में ये कथाएँ सामान्य रूप से प्रचलित थीं। वे देशों की सीमाओं में नहीं बँधी थीं। इन्हीं भाषाओं से सातवीं शताब्दी में कविता के रूप में अंग्रेजी साहित्य का प्रारंभ हुआ। इसलिए डब्ल्यू.पी. कर के शब्दों में ऐंग्लो-सैक्सन साहित्य पुरानी दुनिया का साहित्य है। लेकिन इस समय तक ऐंग्लो-सैक्सन लोग ईसाई बन चुके थे। इन भाषाओं के रचयिता भी आम तौर से पुरोहित हुआ करते थे। इसलिए इन भाषाओं में वर्णित शौर्य और पराक्रम पर धार्मिक रहस्य, विनय, करुणा, सेवा इत्यादि के भाव भी आरोपित हुए। ऐंग्लो-सैक्सन कविता का शुद्ध धर्मविषयक अंश भी इन गाथाओं के रूप से प्रभावित है

इन गाथाओं में शौर्य के साथ शैली का भी अतिरंजन है। ऐंग्लो-सैक्सन भाषा काफी अनगढ़ थी। गाथाओं में कवि उसे अत्यंत कृत्रिम बना देते थे। छंद के आनुप्रासिक आधार के कारण भरती के शब्दों का आ जाना अनिवार्य था। मुखर व्यंजनों की प्रचुरता से संगीत या लय में कठोरता है। विषयों और शैली को संकीर्णंता के बीच अंग्रेजी कविता का विकास असंभव था। नार्मन विजय के बाद इसका ऐसा कायाकल्प हुआ कि अनेक विद्वानों ने इसमें और बाद की कविता में वंशगत संबंध जोड़ना अनुचित कहा है।

दूसरी ओर अंग्रेजी गद्य में, जिसका उदय कविता के बाद हुआ, विकास की क्रमिक और अटूट परंपरा है। ईसाई संसार की भाषा लातीनी थी और इस काल का प्रसिद्ध गद्य लेखक बीड इसी भाषा में लिखता था। ऐंग्लो-सैक्सन में गद्य का प्रारंभ अलफ्रेड के जमाने में लातीनी के अनुवादों तथा उपदेशों और वार्ताओं की रचना से हुआ। गद्य की रचना शिक्षा और ज्ञान के लिए हुई थी। इसलिए इसमें ऐंग्लो-सैक्सन कविता की कृत्रिमता और अन्य शैलीगत दोष नहीं हैं। उनकी भाषा लोकभाषा के अधिक समीप थी। ऐंग्लो-सैक्सन कविता की तरह बाद वाले युगों में उसका संबंध विच्छेद करना असंभव है। लेकिन इस युग के पूरे साहित्य में लालित्य का अभाव है

नार्मन विजय से चॉसर तक[संपादित करें]

चॉसर पूर्व मध्यदेशीय अंग्रेजी काल न केवल इंग्लैंड में ही बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी फ्रांस के साहित्यिक नेतृत्व का काल है। 12वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक फ्रांस ने इन देशों को विचार, संस्कृति, कल्पना, कथाएँ और कविता के रूप दिए। धर्मयुद्धों के इस युग में सारे ईसाई देशों को बौद्धिक एकता स्थापित हुई। यह सामंती व्यवस्था तता शौर्य और औदार्य की केंद्रीय मान्यताओं के विकास का युग है। नारी के प्रति प्रेम और पूजाभाव, साहस और पराक्रम, धर्म के लिए प्राणोत्सर्ग, असहायों के प्रति करुणा, विनय आदि ईसाई नाइटों (सूरमाओं) के जीवन के अभिन्न अंग माने गए। इसी समय फ्रांस के चारणों ने प्राचीनकालीन पराक्रम गाथाओं (chanson dageste) और प्रेम गीतों की रचना की, तथा लातीनी, ट्यूटनों, केल्टी, आयरी, कार्नी और फ्रेंच गाथाओं का व्यापक उपयोग हुआ। फ्रांस की गाथाओं में कर्म की, ब्रिटेन की गाथाओं में भावुकता और शृंगार की ओर लातीनी गाथाओं में इन सभी तत्वों की प्रधानता थी। साहित्य में कोमलता, माधुर्य और गीतों पर जोर दिया जाने लगा।

इस युग में अंग्रेजी भाषा ने अपना रूप संवारा। उसमें रोमांस भाषाओं, विशेषत; फ्रेंच के शब्द आए, उसने कविता में कर्णकटु आनुप्रासिक छंद रचना की जगह तुर्कों को अपनाया, उसके विषय व्यापक हुए-संक्षेप में, उसने चॉसर युग की पूर्वपीठिका तैयार की।

गद्य के लिए भाषा के मँजे-मँजाए और स्थिर रूप की आवश्यकता होती है। पुरानी अंग्रेजी के रूप में विघटन के कारण इस युग का गद्य पुराने गद्य जैसा संतुलित और स्वस्थ नहीं है। लेकिन रूपगत अस्थिरता के बावजूद इस युग के धार्मिक और रोमानी गद्य में विचारों की दृष्टि से ऐंग्लो-सैक्सन गद्य की परंपरा को विकसित किया। un

चॉसर से पुनर्जागरण तक[संपादित करें]

चॉसर ने इस युग की काव्य परंपरा को आधुनिक युग से समन्वित किया। उसने फ्रेंच कविता से लालित्य और इटली की समकालीन कविता से ‘आधुनिक बोध’ लिया। कविता में यथार्थवाद को जन्म देकर उसने अंग्रेजी कविता को यूरोप की कविता से भी आगे कर दिया। इसलिए उसे समझने के लिए पुरानी ऐंग्लो-सैक्सन दुनिया और उसकी कविता की जगह मध्ययुगीन फ्रांस और आधुनिक इटली की साहित्यिक हलचल को जान लेना जरूरी है। उसके बाद और एलिजाबेथ युग से पहले कोई बड़ा कवि नहीं हुआ।

इस युग में लातीनी और फ्रेंच साहित्य के अनुवादों और मौलिक रचनाओं के माध्यम से गद्य का रूप निखर चला। लेखकों ने लातीनी और फ्रेंच गद्य की वाक्य रचना और लय को अंग्रेजी रूप में उतारा। 1350 में अंग्रेजी को राजभाषा का सम्मान मिला और धर्म के घेरे को तोड़कर गद्य का रूप आम लोगों की ओर हुआ। गद्य ने विज्ञान, दर्शन, धर्म, इतिहास, राजनीति, कथा और यात्रा वर्णन के द्वारा विविधता प्राप्त की। 15वीं शताब्दी के अंत तक आते-आते मैंडेविल, चॉसर, विकलिफ, फार्टेस्क्यू, कैक्स्टन और मैलोरी जैसे प्रसिद्ध गद्य निर्माताओं ने अंग्रेजी गद्य की नींव मजबूत बना दी।

15वीं शताब्दी अंग्रेजी नाटक का शैशव काल है। धर्मोपदेश और सदाचार शिक्षा की आवश्यकता, नगरों के विकास और शक्तिशाली श्रेणियों (शिल्ड) के उदय के साथ नाटक गिरजाघर के प्राचीरों से निकलकर जनपथ पर आ खड़ा हुआ। इन नाटकों का संबंध बाइबिल की कथाओं (मिस्ट्रीज़), कुमारी मेरी और संतों की जीवनियों (मिरैकिल्स), सदाचार (मोरैलिटीज़) और मनोरंजक प्रहसनों (इंटरल्यूड्स) से है। धर्म के संकुचित क्षेत्र में रहने वाले और रूप में अनगढ़ इन नाटकों को एलिज़ाबेथ युग के महान नाटकों का पूर्वज कहा जा सकता है।

पुनर्जागरण[संपादित करें]

विचारों और कल्पना के अविराम मंथन, विधाओं में प्रयोगों की विविधता और कृतित्व की प्रौढ़ता की दृष्टि से पुनर्जागरण काल अंग्रेजी साहित्य का स्वर्ण युग है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह युग आधि भौतिकता के विरुद्ध भौतिकता, मध्ययुगीन सामंती अंकुशों के विरुद्ध मननशील व्यक्तिवाद, अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान के संघर्ष का युग है। पुनर्जागरण ने इंग्लैंड को इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के काफी बाद आंदोलित किया। 1500 से 1580 तक का समय मानवतावाद के विकास और प्राचीन यूनान तथा इटली के साहित्यिक आदर्शों को आत्मसात करने का है। लेकिन 1580 और 1660 के बीच कविता, नाटक और गद्य में अद्भुत उत्कर्ष हुआ। 1580 के पूर्व महान व्यक्तित्व केवल चॉसर का है। 1580 के बाद स्पेंसर, शेक्सपियर, बेकन और मिल्टन की महान प्रतिभाओं से कुछ ही नीचे स्तर पर नाटक में मार्लो, बेन जॉन्सन और बेब्स्टर, गद्य में हूकर, बर्टेन और टॉमस ब्राउन, कविता में बेन जॉन्सन और डन हैं। शैली और वस्तु में चित्र-विचित्रता की दृष्टि से नाटकों में लिली, पील और ग्रीन की ‘दरबारी कामेडी’, शेक्सपियर की ‘रोमानी कामेडी’, बोमांट और फ्लेचर की ‘ट्रैजी कामेडी’ और बेन जॉन्सन की ‘यथार्थवादी कामेडी’, कविता में अनेक कवियों के प्रेम संबंधों कथाबद्ध सॉनेट, स्पेंसर की रोमानी कविता, डन और अन्य आध्यात्मिक (मेटाफिजिकल) कवियों की दुरूह कल्पनापूर्ण कविताएँ, बेन जॉन्सन और दरबारी कवियों के प्रांजल गीत तथा मिल्टन के भव्य और उदात्त महाकाव्य, गद्य में इटली और स्पेन से प्रभावित लिलो और सिडनी को अलंकृत शैली की रोमानी कथाएँ तथा नैश और डेलोनी के साहसिकतापूर्ण यथार्थवादी उपन्यास, बेकन के निबंध (एसे), बाइबिल का महान अनुवाद, बर्टन का मनोवैज्ञानिक, सूक्ष्म किंतु सुहृद सा अंतरंग गद्य, सिडनी और बेन जॉन्सन की गद्य आलोचनाएँ, मिल्टन का ओजपूर्ण और आक्रोशपूर्ण प्रलंबित वाक्यों का भव्य गद्य, टॉमस ब्राउन का चिंतनपूर्ण किंतु संगीत तरल गद्य इस युग की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मानव बुद्धि और कल्पना की तरह ही यह युग अभिव्यक्ति के महत्वाकांक्षी प्रसार का युग है।

1660 और 1700 ई. के अंत तक[संपादित करें]

1660 और 1700 ई. के अंत के बीच वाले वर्ष बुद्धिवाद के अंकुरण के हैं। परंतु पुनर्जागरण का प्रभाव शेष रहता है; उसके अंतिम और महान कवि मिल्टन के महाकाव्य 1660 के बाद ही लिखे गए; स्वयं ड्राइडन में मानवतावादी प्रवृत्तियाँ हैं। लेकिन एक नया मोड़ सामने है। बुद्धिवाद के अतिरिक्त यह चार्ल्स द्वितीय के पुनर्राज्यारोहण के बाद फ्रेंच रीतिवाद के उदय का युग है। फ्रेंच रीतिवाद तथा ‘प्रेम और सम्मान’ (लव ऐंड ऑनर) के दरबारी मूल्यों से प्रभावित इस युग का नाटक अनुभूति और अभिव्यक्ति में निर्जीव है। दूसरी ओर मध्यवर्गीय यथार्थवाद से प्रभावित विकर्ली और कांग्रोव के सामाजिक प्रहसन अपनी सजीवता, परिष्कृत किंतु पैनी भाषा और तीखे व्यंग्य में अद्वितीय है। ऊँचे मध्यवर्ग के यांत्रिक बुद्धिवाद और अनैतिकता के विरूद्ध निम्न मध्यवर्गीय नैतिकता और आदर्श का प्रतीक जॉन वन्यन का रूपक उपन्यास ‘दि पिल्ग्रिम्स प्रोसेस’ है। आलोचना में रीतिवाद का प्रभाव शेक्सपियर के रोमानी नाटकों के विरूद्ध राइमर की आलोचना से स्पष्ट है। उस युग की सबसे महत्त्वपूर्ण आलोचनाकृति मानवतावादी स्वतंत्रता और रीतिवाद के समन्वय पर आधारित ड्राइडन का नाटक-काव्य-संबंधी निबंध है। वर्णन में यथार्थवादी गद्य के विकास में सैमुएल पेपीज़ की डायरी की भूमिका भी स्मरणीय है। संक्षेप में, 17वीं शताब्दी के इन अंतिम वर्षों के गद्य और पद्य में स्वच्छता और संतुलन है, लेकिन कुल मिलाकर यह महत्ता-विरल-युग है।

18वीं शताब्दी[संपादित करें]

रीतिवादी युग–यह शताब्दी तर्क और रीति का उत्कर्षकाल है। लायबनीज़, दकार्त और न्यूटन ने कार्य कारण की पद्धति द्वारा तर्कवाद और यांत्रिक भौतिकवाद का विकास किया था। उनके अनुसार सृष्टि और मनुष्य नियमानुशासित थे। इस दृष्टिकोण में व्यक्तिगत रुचि के प्रदर्शन के लिए कम जगह थी। इस युग पर हावी फ्रैंच रीतिकारों ने भी साहित्यिक प्रक्रिया को रीतिबद्ध कर दिया था।

इस युग ने धर्म की जगह रखा और मनुष्य के साधारण सामाजिक जीवन, राजनीति, व्यावहारिक नैतिकता इत्यादि पर जोर दिया। इसलिए इसका साहित्य काम की बात का साहित्य है। इस युग ने बात को साफ-सुथरे, सीधे, नपे-तुले, पैने शब्दों में कहना अधिक पसंद किया। कविता में यह पोप और प्रायर के व्यंग्य का युग है।

तर्क की प्रधानता के कारण 18वीं शताब्दी को गद्ययुग कहा जाता है। सचमुच यह आधुनिक गद्य के विकास का युग है। दलगत संघर्षों, कॉफीहाउसों और क्लबों में अपनी शक्ति के प्रति जागरूक मध्यवर्ग की नैतिकता ने इस युग में पत्रकारिता को जन्म दिया। साहित्य और पत्रकारिता के समन्वय में एडिसन, स्टील, डिफो, स्विफ्ट, फील्डिंग, स्मालेट, जॉनसन और गोल्डस्मिथ की शैली का निर्माण किया। इससे कविता के व्यामोह से मुक्त, रचना के नियमों में दृढ़, बातचीत की आत्मीयता लिए हुए छोटे-छोटे वाक्यों के प्रवाहमय गद्य का जन्म हुआ। जहर में बुझे तीर की तरह स्विफ्ट के गद्य को छोड़कर अधिकांश लेखकों में व्यंग्य की उदार शैली है।

आलोचना में पहली बार चॉसर, स्पेंसर, शेक्सपियर, मिल्टन इत्यादि को विवेक की कसौटी पर कसा गया। रीति और तर्क की पद्धति रोमैंटिक साहित्यकारों के प्रति अनुदार हो जाया करती थी, लेकिन आज भी एडिसन, पोप और जॉन्सन की आलोचनाओं का महत्व है। गद्य में शैली की अनेकरूपता की दृष्टि से इस युग ने ललित पत्रलेखन में चेस्टरफील्ड और वालपोल, संस्मरणों में गिबन, फैनी बर्नी और बॉज़वेल, इतिहास में गिबन, दर्शन में बर्कले और ह्यूम, राजनीति में बर्क और धर्म में बटलर जैसे शैलीकार पैदा हुए

यथार्थवादी दृष्टिकोण के विकास ने आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासों की चार प्रसिद्ध धुरियाँ दीं डिफो, रिचर्ड्सन, फोल्डिंग और स्मॉलेट। उपन्यास में यही युग स्विफ्ट, स्टर्न और गोल्डस्मिथ का भी है। अंग्रेजी कथा साहित्य को यथार्थवाद ने ही, गोल्डस्मिथ और शेरिडन के माध्यम से, कृत्रिम भावुकता के दलदल से उबारा। किंतु यह युग मध्यवर्गीय भावुक नैतिकता से भी अछूता न था। इसके स्पष्ट लक्षण भावुक कामेडी और स्टर्न, रिचर्ड्सन इत्यादि के उपन्यासों में मौजूद है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में रोमैंटिक कविता की जमीन तैयार थी। ब्लेक और बर्न्स इस युग की स्थिरता में आँधी की तरह आए।

19वीं शताब्दी[संपादित करें]

रोमैंटिक युग–पुनर्जागरण के बाद रोमैंटिक युग में फिर व्यक्ति की आत्मा का उन्मेषपूर्ण और उल्लसित स्वर सुन पड़ता है। प्राय: रोमैंटिक साहित्य को रीतियुग (क्लासिसिज़्म) की प्रतिक्रिया कहा जाता है और उसकी विशेषताओं का इस प्रकार उल्लेख किया जाता है- तर्क की जगह सहज गीतिमय अनुभूति और कल्पना; अभिव्यक्ति में साधारणीकरण की जगह व्यक्ति निष्ठता; नगरों के कृत्रिम जीवन से प्रकृति और एकांत की ओर मुड़ना; स्थूलता की जगह सूक्ष्म आदर्श और स्वप्न; मध्ययुग और प्राचीन इतिहास का आकर्षण; मनुष्य में आस्था; ललित भाषा की जगह साधारण भाषा का प्रयोग; इत्यादि। निश्चय ही इनमें से अनेक तत्व रोमानी कवियों में मिलते हैं, लेकिन उनकी महान् सांस्कृतिक भूमिका को समझने के लिए आवश्यक है कि 19वीं शताब्दी में जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली, इंग्लैंड, रूस और पोलैंड में जनवादी विचारों के उभार को ध्यान में रखा जाए। इस उभार ने सामाजिक और साहित्यिक रूढ़ियों के विरुद्ध व्यक्ति स्वातंत्र्य का नारा लगाया। रूसी और फ्रांसीसी क्रांति उसकी केंद्रीय प्रेरणा थे। इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के कवि-- वर्ड्स्वर्थ, कोलरिज, शेली, कीट्स और बायरन—इसी नए उन्मेष के कवि हैं। लैंब, हंट और हैज़लिट के निबंधों, कीट्स के प्रेमपत्रों, स्कॉट के उपन्यासों, डी क्विंसी के ‘कन्फेशंस ऑव ऐन ओपियम’ ईटर में गद्य की भी अनुभूति, कल्पना और अभिव्यक्ति का वही उल्लास प्राप्त हुआ। आलोचना में कोलरिज, लैंब, हैज़लिट और डी क्विंसी ने रीति से मुक्त होकर शेक्सपियर और उसके चरित्रों की आत्मा का उद्घाटन किया। लेकिन व्यक्तित्व आरोपित करने के स्वभाव ने नाटक के विकास में बाधा पहुँचाई।

विक्टोरिया के युग में जहाँ एक ओर जनवादी विचारों और विज्ञान का अटूट विकास हो रहा था, वहाँ अभिजात वर्ग क्रांतिभीरु भी हो उठा। इसलिए इस युग में कुछ साहित्यकारों में यदि स्वस्थ सामाजिक चेतना है तो कुछ में निराशा, संशय, अनास्था, समन्वय, कलावाद, वायवी आशावाद की प्रवृत्तियाँ भी हैं। व्यक्तिवाद शताब्दी के अंतिम दशक तक पहुँचते-पहुँचते कैथालिक धर्म, रहस्यवाद, आत्मरति या आत्मपीड़न में इस तरह लिप्त हो गया कि इस दशक को खल दशक भी कहते हैं। जनवादी, यथार्थवादी और वैज्ञानिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व मॉरिस ने कविता में, रस्किन ने गद्य में और ब्रांटे बहनों, थैकरे, डिकेन्स, किंग्सली, रीड, जॉर्ज इलियट, टॉमस हार्डी, बटलर आदि ने उपन्यास में किया। निराशा और पीड़ा के बीच में इनमें मानव के प्रति गहरी सहानुभूति और विश्वास है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में विक्टोरिया युग के रिक्त आदर्शों के विरुद्ध अनेक स्वर उठने लगे थे।

20वीं शताब्दी[संपादित करें]

19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के उभरते हुए अंतर्विरोध 20वीं शताब्दी में संकट की स्थिति में पहुँच गए। यह इस शताब्दी के साहित्य का केंद्रीय तथ्य है। इस शताब्दी के साहित्य को समझने के लिए उसके विचारों, भावों और रूपों को प्रभावित करने वाली शक्तियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। वे शक्तियाँ हैं नीत्शे, शॉपेनआवर, स्पिनोज़ा, कर्कगार्ड, फ्रायड और मार्क्स; इब्सन, चेखव, फ्रेंच अभिव्यंजनावादी और प्रतीकवादी, गोर्की, सार्त्र और इलियट; दो हो चुके युद्ध और तीसरे की आशंका, फासिज्म, रूस की समाजवादी क्रांति, गए देशों में समाजवाद की स्थापना और पराधीन देशों के स्वातंत्र्य संग्राम; प्रकृति पर विज्ञान की विजय से सामाजिक विकास की अमित संभावनाएँ और उनके साथ व्यक्ति की संगति की समस्या।

20वीं शताब्दी में व्यक्तिवादी आदर्श का विघटन तेजी से हुआ है। शा, वेल्स और गार्ल्सवर्दी ने शताब्दी के प्रारंभ में विक्टोरिया युग के व्यक्तिवादी आदर्शों के प्रति संदेह प्रकट किया और सामाजिक समाधानों पर जोर दिया। हार्डी की कविता में भी उसके विघटन का चित्र है। लेकिन किसी तरह पहले युद्ध के पहले कविता ने विक्टोरिया युग के पैस्टरल आदर्शों को जीवित रखा। जो युद्धों में व्यक्तिवाद समाज से बिल्कुल टूटकर अ्लग हो गया। अपनी ही सीमाओं में संकुचित साहित्यिक ने प्रयोगों का सहारा लिया। टी.एस. इलियट के ‘वेस्टलैंड’में व्यक्ति की कुंठा और दीक्षागम्य कविता का जन्म हुआ और आज भी व्यक्तिवाद से प्रभावित अंग्रेजी कवि उसका नेतृत्व स्वीकार करते हैं। 1930 के बाद मार्क्सवादी विचारधारा और स्पेन के गृहयुद्ध ने अंग्रेजी कविता की नई स्फूर्ति दी। लेकिन दूसरे युद्ध के बाद तीव्र सामाजिक संघर्षों के बीच इस काल के अनेक कवि फिर व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के उपासक हो गए। साथ ही, ऐसे कवियों का भी उदय हुआ जो अपनी व्यक्तिगत मानसिक उलझनों के बावजूद युग की मानव आस्था को व्यक्त करते रहे।

आदर्शवाद के टूटने के साथ ही उपन्यासों में व्यक्ति की मानसिक गुत्थियों, विशेषत: यौन कुंठाओं के विरुद्ध भी आवाज उठी। लॉरेंस, जेम्स, ज्वॉयस और वर्जीनिया वुल्फ इसी धारा की प्रतिनिधि हैं। नाटकों के क्षेत्र में भी यथार्थवादी प्रवृत्तियों का विकास हुआ है। नाटकों में काव्य और रोमानी क्रांतिकारी विचारों को व्यक्त करने में सबसे अधिक सफलता अंग्रेजी में लिखने वाले आयरलैंड के नाटककारों को मिली है। आलोचना में शोध से लेकर व्याख्या तक का बहुत बड़ा कार्य हुआ। प्रयोगवादी साहित्यकारों के प्रधान शिक्षक टी.एस. इलियट, रिचर्डर््स, एम्पसन और लिविस है। इन्होंने जीवन के मूल्यों से अधिक महत्व कविता की रचना प्रक्रिया को दिया है। साधारणत: कहा जा सकता है कि 20वीं शताब्दी के साहित्य में विचारों की दृष्टि से चिंता, भय और दिशाहीनता की और रूप की दृष्टि से विघटन की प्रधानता है। उसमें स्वस्थ तत्व भी है और उन्हीं पर उसका आगे का विकास निर्भर है।

गद्य[संपादित करें]

उपन्यास[संपादित करें]

कहानी[संपादित करें]

कविता[संपादित करें]

नाटक[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]